यह मामला सिर्फ एक कर्मचारी के बयान तक सीमित मान लेना जल्दबाजी होगी। राम मंदिर दान घोटाले की असली परतें तभी खुलेंगी, जब अयोध्या में पिछले वर्षों में हुए जमीन सौदों, दान के लेनदेन और उनसे जुड़े नेताओं, अफसरों व प्रभावशाली लोगों की भूमिका की निष्पक्ष जांच हो। सवाल यह भी है कि अगर किसी कर्मचारी को वर्षों से गड़बड़ी की जानकारी थी, तो उसने उसी समय आवाज क्यों नहीं उठाई। कहीं ऐसा तो नहीं कि हिस्सेदारी, कमीशन या किसी डील में कम-ज्यादा बंटवारे को लेकर मतभेद हुए और मामला बाहर आ गया। अगर जांच सिर्फ ड्राइवर, स्वीपर या निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित रही, तो बड़े नाम बच जाएंगे और मामला दब जाएगा। असली खेल सामने लाने के लिए जमीन खरीद-फरोख्त, भुगतान, दान की रकम और उससे जुड़े सभी लोगों की भूमिका की व्यापक जांच जरूरी है।
कोई अखबार ऐसी List बनाए की मंदिर बनने के समय से कौन कौन नेता और अफसरों ने जमीन खरीदी. खैर यह होना नहीं.
क्योंकि सबसे पहले अखिलेश यादव ने इस घोटाले की आवाज उठाई थी. उनको कोई ड्राइवर चपरासी तो call करके बोल नहीं सकता, कोई ऐसा बड़ा नेता या अफसर ही होगा जिसने कहा और उसकी बात पर AY को यकीन होगा.
अपराध की दुनिया में सबसे बड़ा खतरा पुलिस नहीं, बल्कि हिसाब-किताब होता है। कई चोरी, लूट और डकैती के राज इसलिए खुल जाते हैं क्योंकि माल बंटवारे की बैठक में गणित कमजोर पड़ जाता है। किसी को लगता है उसका प्रतिशत कम है, किसी को लगता है दूसरे ने ज्यादा दबा लिया। फिर शुरू होता है 'न्याय का संघर्ष' और मामला सीधे थाने तक पहुंच जाता है। फिल्मों में भी बरसों से यही दिखाते रहे हैं कि गैंग पुलिस से नहीं, अपने ही साझेदारों की लालच से टूटती है। अपराध सफल हो जाए, उसके बाद सबसे कठिन काम होता है , मुनाफे का समान वितरण
राम राम ऐसा भी होता है.