तुम बारहमासा वीर सावरकर को "माफ़ीवीर" कहते रहो, नफ़रत नहीं फैलती. गोलवालकर, हेडगेवार से लेकर श्री राम-कृष्ण तक पर अनाप-शनाप बोलते हो, समाज में नफ़रत फैलने का डर आपको तनिक भी नहीं रहता मगर औरंगजेब की आलोचना नफ़रत का कारण बन जाती है, आख़िर कैसे?
भाईज़ान ज़रा गिरेबान में झॉंको!