जनता से बड़ी कोई पीआर एजेंसी नहीं है सर 🙏
मुझे पता नहीं, यह सच है या झूठ; लेकिन यह बताया गया कि कुछ रोजनेताओं ने भारी भरकम पैसा देकर मुंबई की पीआर एजेंसीज को हायर किया हुआ है और वे जिस तरह कह रही हैं, उस तरह राजनेता कर रहे हैं।
हमारी राजनीति और हमारे राजनेताओं का अपने संकीर्ण लाभों के लिए पीआर एजेंसियों वाले और इवेंट वाले किस तरह सत्यनाश कर रहे हैं, यह एक भयावह खेल हो गया है। उन्होंने दुनिया के संचार सिद्धांतों का कुछ पता नहीं है कि वे पत्रकारिता में कैसे काम करते हैं और राजनीति में कैसे। सोशल मीडिया में उनका क्या प्रभाव रहता है और आम जीवन में क्या।
इस हम कल या आज ही उदाहरण से समझ सकते हैं।
जब कोई बड़ा और बुजुर्ग नेता किसी युवा नेता पर वार करे तो उस बारे में पब्लिक मनोविज्ञान क्या कहता है?
राजनीति में शब्द केवल विचार नहीं होते। वे संकेत होते हैं। और संकेत अक्सर वह कह देते हैं, जो वक्ता कहना नहीं चाहता।
कोई दो दशक पहले चुनाव विश्लेषक वाली योनि में रहते हुए योगेंद्र यादव ने दॅ हिन्दू में लिखा था कि चुनाव में जो हाेता है, वह दिखता नहीं और जो दिखता है, वह होता नहीं। इसे मैं नाना प्रकार के लोगों के यहाँ कल से 57 बार पढ़ चुका हूँ। बड़े-बड़े लोगों के पास मौलिक सोच नहीं है और वे एक बंजर दृष्टि के शिकार हैं।
तो अब मूल बात पर।
कोई वरिष्ठ, अनुभवी और स्थापित नेता किसी युवा पर सार्वजनिक रूप से सीधा प्रहार करता है तो वह युवा को नहीं, स्वयं को परिभाषित कर रहा होता है। क्योंकि शक्ति का पहला नियम यह है कि जो वास्तव में शक्तिशाली होता है; वह प्रतिक्रिया नहीं देता, वह दिशा देता है।
तीन बार के मुख्यमंत्री, दशकों का राजनीतिक अनुभव, लाखों कार्यकर्ताओं का विश्वास और इतने तपेतपाए इनसान यानी यह सब लिए हुए कोई नेता जब किसी युवा के नाम पर बेचैन होता है तो जनमानस में एक ही प्रश्न जन्म लेता है, "इतने बड़े नेता को इस युवा से क्या भय है?"
यह प्रश्न ही युवा की सबसे बड़ी राजनीतिक पूँजी बन जाता है। वरिष्ठ नेता ने कुछ कहा, पर जनता ने कुछ और सुना। और जनता जो सुनती है, वही सत्य बन जाता है।
हम लोग पत्रकारिता के विद्यार्थियों को संचार सिद्धांत सिखाते हैं तो उन्हें बताते हैं कि मनोविज्ञान में psychological reactance का सिद्धांत राजनीति के बारे में क्या कहता है। यह सिद्धांत कहता है कि जब किसी को सार्वजनिक रूप से दबाया जाता है तो दर्शक स्वतः उसके प्रति झुकने लगते हैं।
यह कोई सोची-समझी सहानुभूति नहीं। यह मानवीय स्वभाव की सहज और अनायास प्रतिक्रिया है।
प्रहार जितना बड़े मंच से हो, सहानुभूति उतनी गहरी और व्यापक होती है। युवा नेता बिना कुछ किए, केवल निशाने पर रहकर एक ऐसी छवि अर्जित कर लेता है, जो वर्षों की मेहनत से भी शायद न बनती। यानी हमला किस पर हो रहा है? और क्यों हो रहा है? क्योंकि वह इतना ताक़तवर है कि इतने बड़े व्यक्ति का हमला उस पर ज़रूरी हो जाता है।
पत्रकारिता में हम विद्यार्थियों को यह भी सिखाते हैं कि social proof का वह सिद्धांत क्या है, जो राजनीति में सबसे निर्मम सत्य की तरह काम करता है। जनता यह नहीं देखती कि कौन क्या कह रहा है; जनता यह देखती है कि कौन किसके बारे में बात करने पर विवश है। जिस युवा का नाम वरिष्ठ नेता बार-बार लेते हैं, वह युवा जनता की दृष्टि में relevant, significant और inevitable हो जाता है।
वरिष्ठ नेता सोचते हैं कि वह युवा को छोटा कर रहा है; वास्तव में वह हर बार उसे स्थापित कर रहा होता है। यह राजनीतिक आत्मघात है। धीमा, अदृश्य, पर निश्चित।
इससे भी गहरी बात यह है कि जिस क्षण वरिष्ठता प्रतिक्रिया में उतरती है; वह अपना स्तर स्वयं तय कर देती है।
दो नेता जब एक ही मैदान में खड़े दिखते हैं तो जनता उन्हें बराबर मानने लगती है। और जब मैदान बराबर हो तो वह युवा का होता है। क्योंकि युवा के पास खोने को कुछ नहीं और पाने को सब कुछ है। वरिष्ठ के पास खोने को प्रतिष्ठा है; जिसे उसने जाने कैसे-कैसे त्याग करके, कैसे काम करके, कैसी-कैसी ज़हरीली अनुभूतियों को आत्मसात करके अर्जित किया है और एक बार खोई प्रतिष्ठा लौटती नहीं।
इतिहास में जो नेता अमर हुए; वे इसलिए नहीं कि उन्होंने हर प्रहार का उत्तर दिया, इसलिए कि उन्होंने जाना कि कौन से प्रहार का उत्तर न देना ही सबसे बड़ा उत्तर है।
मौन केवल चुप्पी नहीं; वह एक रणनीति है और प्रायः सबसे शक्तिशाली।
जो सच में अप्रासंगिक होता है, उसका नाम नहीं लिया जाता। वरिष्ठ नेता का हर सार्वजनिक प्रहार युवा का वह परिचय लिखता है जो युवा स्वयं कभी न लिख पाता। राजनीति की यही सबसे बड़ी विडंबना है; और यही उसका सबसे निर्मम और शाश्वत सत्य भी। और यह वही ग़लती है, जो देश के शीर्षस्थ राजनेता और भाजपा के शिखर पुरुष राहुल गांधी के बारे में करते रहते थे।