कंपनियों की मनमानी, सरकार की खामोशी: आखिर कब तक मरते रहेंगे संविदा वाले 'दीपक' ?
जयपुर में संविदाकर्मी दीपक चरवाल की मौत पर शोक जताने वाले बहुत मिल जाएंगे, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या सरकार और सिस्टम उन कारणों पर भी बात करेगा जिन्होंने एक युवक को इस कदर तोड़ दिया कि उसे जीवन से हार माननी पड़ी?
प्रदेश में लाखों संविदा कर्मचारी आज भय, असुरक्षा और शोषण के साये में काम कर रहे हैं। निजी कंपनियों को भर्ती का ठेका दे दिया गया, लेकिन उनकी जवाबदेही तय करने वाला कोई मजबूत तंत्र खड़ा नहीं किया गया। न नौकरी की सुरक्षा, न समय पर वेतन की गारंटी, न शिकायतों के निस्तारण की व्यवस्था। कंपनियां मनमानी करें, कर्मचारियों को महीनों वेतन न दें, रातों-रात बाहर का रास्ता दिखा दें, और सरकार सिर्फ तमाशा देखती रहे?
आखिर सरकार बताए कि संविदा कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए उसका रोडमैप क्या है?
क्या कारण है कि कर्मचारियों को एक व्हाट्सएप मैसेज भेजकर नौकरी से हटाया जा सकता है?
क्या कारण है कि महीनों तक वेतन नहीं मिलने के बावजूद कंपनियों पर सख्त कार्रवाई नहीं होती?
क्या कारण है कि बार-बार शिकायतों के बाद भी पीड़ित कर्मचारी को न्याय नहीं मिलता?
और सबसे बड़ा सवाल—जब सरकार के विभागों में काम करवाना है तो कर्मचारियों की जिम्मेदारी लेने से सरकार पीछे क्यों हटती है?
सच यह है कि संविदा कर्मचारियों का इस्तेमाल सस्ते श्रम की तरह किया जा रहा है। काम नियमित कर्मचारी जितना लिया जाता है, लेकिन अधिकार देने की बात आती है तो उन्हें ठेकेदारों और कंपनियों के भरोसे छोड़ दिया जाता है। यही मॉडल हजारों परिवारों को असुरक्षा और मानसिक तनाव में धकेल रहा है।
आज जरूरत केवल दीपक चरवाल को श्रद्धांजलि देने की नहीं है। जरूरत है ऐसी व्यवस्था बनाने की जिसमें कोई कर्मचारी सिर्फ इसलिए अवसाद और चिंता में न डूबे क्योंकि उसे नहीं पता कि कल उसकी नौकरी रहेगी या नहीं।
सरकार को तत्काल एक ऐसी नीति लानी चाहिए जिसमें—
संविदा कर्मचारियों की सेवा सुरक्षा सुनिश्चित हो। बिना कारण नौकरी से हटाने पर रोक लगे। समय पर वेतन भुगतान की कानूनी गारंटी हो। कंपनियों की मनमानी पर कठोर दंड तय हो। कर्मचारियों की शिकायतों के लिए स्वतंत्र और प्रभावी तंत्र बनाया जाए। वरना हर घटना के बाद दो मिनट का मौन और कुछ संवेदनाएं व्यक्त कर देने से कुछ नहीं बदलेगा।
कड़वा सच यह है कि यदि संविदा कर्मचारियों के शोषण पर लगाम नहीं लगी, यदि कंपनियों की मनमानी नहीं रुकी, यदि सरकार ने जवाबदेही तय नहीं की, तो दीपक चरवाल आखिरी नाम नहीं होगा।
फिर हर कुछ महीनों में हम एक और दीपक को खो देंगे, और सिस्टम हमेशा की तरह कह देगा—"यह एक व्यक्तिगत मामला था।
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