किताब ‘राहुल गांधी; साम्प्रदायिकता, दुष्प्रचार और तानाशाही से ऐतिहासिक संघर्ष’ को दो साल हो गए । नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर किताब लिखना, कितना ख़तरनाक हो सकता है, यह किताब लिखकर,छापकर ही सही मायनों में समझ में आया!
किताब लिखते वक़्त तो लोकतंत्र पर ख़तरा मंडरा रहा था, अब लोकतंत्र आभासी बन गया है । इसे नोम चोम्स्की प्रबंधित लोकतंत्र ( managed democracy) कहते हैं।
राहुल गांधी की चेतावनी एक- एक करके सच साबित हो रही है। लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने-हारने का काम नहीं है। लोकतंत्र, कोरा मुहावरा नहीं है । लोकतंत्र; जनता को अधिकार, गरिमा और वैज्ञानिक सोच देने का नाम है ।
संविधान ; गांधी, नेहरू और अंबेडकर की साझी विरासत है। इस विरासत पर हो रहे हमले का प्रबल प्रतिवाद राहुल गांधी कर रहे हैं ।
समकालीन राजनीति में RSS का स्पष्ट, प्रखर विरोध करने वाले राहुल गांधी पहले नेता हैं । RSS, हेडगेवार, सावरकर,हिन्दुत्व को आराध्य बनाए जाने की कोशिशों के बीच राहुल गांधी निरंतर पूरी शक्ति से जवाब दे रहे हैं ।
राहुल गांधी का आकलन अविश्वसनीय, ‘सरकारी’चुनाव आयोग और चुनाव के दौरान ‘कैश ट्रांसफ़र’ के नतीजों से मत कीजिए। वोट चोरी, मज़ाक नहीं, लोकतंत्र पर डाका है ।
यह किताब राहुल गांधी की राजनीति और विचारधारा को सरल भाषा में जनता तक ले जाने की विनम्र कोशिश है।
इस पर गोदी मीडिया और IT सेल लगातार हमला कर रहे हैं।
मैं पुनः दोहराता हूँ ; भारत का मीडिया IT सेल का एक्सटेंशन है। इस किताब के प्रकाशन के साथ भारत की सबसे बड़ी मीडिया कम्पनी के हमले और बीजेपी IT सेल के दुष्प्रचार अभियान ने इस अवधारणा को उदाहरण सहित पुष्ट किया है। इस किताब के रूप में दुर्लभ अनुभव हुआ; किसी किताब को पाठक पढ़ना भी चाहते हैं तो भी IT सेल किताब ग़ायब कर सकता है। ‘डिजिटल इंडिया’ के शोर में किताब को गुम किया जा सकता है।
देश के किसी अख़बार, मीडिया चैनल, बेबसाइट ने आज तक इस किताब पर एक लाइन नहीं लिखी, इसकी स्पष्ट वज़ह ‘मिस्टर J & A’ का स्पष्ट आदेश है! वरना कैसे संभव है ; साहस की पत्रकारिता का ‘पुरस्कार’ बटोरने और बाँटने वाला अख़बार इस्तीफ़ा देकर लिखी गई किताब पर भी एक लाइन लिखता !
मैं आप सभी का हृदय की गहराइयों से धन्यवाद कहना चाहता हूँ ; जो दुष्प्रचार के चक्रव्यूह के बीच भी किताब के साथ खड़े रहे।
आपने आगे बढ़कर, किताब का हाथ थामा।
एक अनाम, अपरिचित लेखक के संघर्ष को अपना वक़्त और साथ दिया। किताब ने मीडिया कंपनियों को दुश्मन बना दिया तो दूसरी तरफ़ देश भर के दूर दराज़ के नागरिकों ने अपना दोस्त बना लिया।
देश के कोने-कोने से सुधी-सजग नागरिकों के रूप में पाठकों से परिचय हुआ।
दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, बिहार, पंजाब, मध्य प्रदेश, राजस्थान,छत्तीसगढ़, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश से होते हुए्, महाराष्ट्र, गुजरात, ओडिशा, असम, बंगाल, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मिज़ोरम, त्रिपुरा, मेघालय, तमिलनाडु, कर्नाटक, आँध्र प्रदेश, तेलंगाना, केरल तक हिंदी की 750 पेज़ और 749 रुपए की किताब पहुँची।
भारत जैसे बहु भाषी देश में बिना प्रकाशक के एक अनाम लेखक की किताब को जनता तक पहुँचाने में स्वतंत्र पत्रकारिता ने भरपूर साथ दिया।
मुश्किलें कम नहीं हुईं, साथ बढ़ता गया।
अमेज़न पर किताब की आँख मिचौली जारी रही। अब किताब अमेज़न पर उपलब्ध है। यहाँ मिल जाएगी ; Amazon
rb.gy/h8fj99 इसके साथ ही किताब 7879928528 पर वाट्सएप पर संदेश भेज कर सीधे लेखक से भी प्राप्त की जा सकती है ।
एक बार फिर आप सभी का दिल से शुक्रिया !
•अगली किताब के साथ जल्द हाज़िर होता हूँ…
•• दयाशंकर मिश्र