एक और राज्यसभा होगी WASTE ? नीरज डांगी की क्या उपयोगिता ?
चर्चा चल पड़ी है कि राजस्थान के आगामी राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस नीरज डांगी को दुबारा उम्मीदवार बना सकती है। डांगी मौजूदा वक्त में भी सदस्य हैं और उनकी ही सीट खाली होने वाली है। सोचने वाली बात है कि जब राहुल गांधी रेस के घोड़ों की बात कर रहे हैं तो डांगी, बचे हुए बरात और लंगड़े घोड़े में से किस प्रणाली में गिने जाएंगे। उनकी क्या उपयोगिता है?
दलित समुदाय से आने वाले नीरज डांगी के राज्यसभा जाने से कांग्रेस को शायद ही कुछ फायदा पहुंचा होगा। जिस विधानसभा रेवदर से उन्होंने चुनाव लड़ा, वहां दलितों को पूछेंगे तो वही नीरज डांगी को वोट नहीं देना चाहते। डांगी के पिता स्व दिनेश डांगी विधायक और मंत्री रहे। उनके लगाए हुए पेड़ का फल अभी तक नीरज खा रहे हैं।
2020 में नीरज डांगी को राज्यसभा भेजा गया लेकिन इन 6 सालों में उनके नाम पर कांग्रेस को 600 वोट नहीं मिलेगा। रेवदर विधानसभा से वे कई बार चुनाव लड़ चुके हैं और हर बार निराशा ही हाथ लगी है।
2008 में बीजेपी प्रत्याशी से 3,238 वोट से हारे और 2018 में हार का मार्जिन चार गुना बढ़ गया। 14,604 वोट से 2018 का चुनाव भी हारे।
दिल्ली लॉबी में चर्चा होती है कि नीरज डांगी कांग्रेस आलाकमान के एक बड़े नेता के भरोसे अपनी राजनीति चला रहे हैं। अक्सर आप मीडिया बाईट्स में उन्हें उन बड़े नेता के आसपास ही पाएंगे। दलित समाज के उत्थान के लिए उनके पास गिनाने के 4 काम नहीं है लेकिन जाति ही वह तमगा है जिसके चलते वह सफलता पाते हैं।
6 साल के MP Lad फंड से ऐसा कोई ऐतिहासिक काम नहीं है जिसकी बिनाह पर नीरज डांगी अपने कार्यकाल का औचित्य समझा पाएं। राजस्थान कांग्रेस और जनता को भी यह सोचना होगा की राज्यसभा में जाने वाले नेताओं से उन्हें कोई विकास का फायदा हो रहा है?
वहीं, सबसे बड़ी बात की कांग्रेस को राज्यसभा में जिन अटैकिंग प्रवृति के लोगों की जरूरत है, उस कैटेगरी में वे फिट नहीं होते हैं। भंवर जितेंद्र सिंह भले ही बतौर प्रभारी फेल रहे हो लेकिन वे पार्टी के लिए काम करने में झिझकते नहीं है। इससे बेहतर तो भंवर जितेंद्र सिंह, साफिया ज़ुबैर या कोई अन्य व्यक्ति राज्यसभा चले जाए।
बाकी होइहि सोई जो जो राहुल रचि राखा..!
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