वह बौखला कर चिल्लाने लगी कि मैंने उस पर केस किया है। 2019 में यह अंग्रेज़ी में छपा था, फिर 2020 में हिंदी में भी प्रकाशित हुआ। आज तक वह लेख उपलब्ध है। अगर वह गलत था तो उसे हटवाया क्यों नहीं गया?
असल में वह गलत था ही नहीं। कारवां के पास इसके सबूत थे। वह कुछ नहीं कर सकती। घमंड, अहंकार, बदतमीज़ी, जातिगत अहंकार और पद का दुरुपयोग करके वह किसी को बहस से बाहर कर सकती हैं, लेकिन आरक्षण-विरोधी चेहरा कहाँ छुपाएँगी?
कारवां मैगजीन और उसके रिपोर्टरों की विश्वसनीयता किसी भी दिन इंडिया टूडे, आजतक और वहां काम करनेवालों/वालियों से ज्यादा है. अगर इस सवर्ण महिला को 'मिसकोट' किया गया है तो उसे खुद को सही साबित करने के लिए कांरवा मैगजीन पर मुकदमा करना चाहिए था, कम से कम ऑफिसियली लिखकर विरोध करना था!