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(₹15 लाख करोड़) का फ्रोड और दांव पर लगी LIC में आम आदमी की गाढ़ी कमाई।
दुनिया की सबसे बड़ी गोल्ड रिफाइनरी कंपनियों में शुमार Rajesh Exports ने अपने निवेशकों को गुमराह करते हुए 5 साल (2020-2025) में करीब ₹15.15 लाख करोड़ का फ्रोड किया है.
इस कंपनी ने करीब ₹15 लाख करोड़ का एक्सपोर्ट सिर्फ कागजों पर दिखाया। हकीकत में न तो कोई सोना बेचा गया, न कोई गहना.
ये कम्पनी शेयर बाज़ार में कंपनी लिस्ट है.
SEBI का आरोप है कि कंपनी के पैसे का इस्तेमाल प्रमोटर ने निजी ट्रेडिंग के लिए भी किया। इसके बाद SEBI ने राजेश मेहता की बाजार में ट्रेडिंग पर रोक लगा दी है।
अब बात आती है आम आदमी की -
इस महाघोटाले की सीधी मार देश के आम आदमी पर पड़ी है, क्योंकि LIC, जिसमें करोड़ों भारतीयों की गाढ़ी कमाई और पॉलिसीधारकों का पैसा लगा है
उसके पास राजेश एक्सपोर्ट्स में 10.80% हिस्सेदारी है। मार्च 2026 तक LIC के पास कंपनी के लगभग 3,18,75,887 शेयर थे।
SEBI की कार्रवाई के बाद राजेश एक्सपोर्ट्स का शेयर 80% तक टूट गया । इसका असर LIC पर भी दिखा और LIC के शेयर में 1% से अधिक की गिरावट दर्ज हुई।
SEBI की कार्रवाई के बाद 4 जून 2026 को Rajesh Exports का शेयर लगभग ₹104–₹105 तक आ गया था।
एलआईसी की वर्तमान होल्डिंग्स का मूल्य 347 करोड़ रुपये है, जबकि 2026 की शुरुआत में यह 637 करोड़ रुपये था।
यानी 6 महीने में ही LIC को 290 करोड़ (45 %) का घाटा हो गया है।
LIC की यह होल्डिंग सितंबर 2023 से अपरिवर्तित रही है।
दिलचस्प बात यह है कि कंपनी के शेयरों में पिछले कई महीनों से भारी गिरावट आने के बावजूद LIC ने अपनी बड़ी हिस्सेदारी बनाए रखी।
एक समय कंपनी के शेयर अपने High Level से लगभग 70% तक टूट चुके थे, फिर भी LIC कंपनी में प्रमुख निवेशक बनी रही।
जबकि राजेश एक्सपोर्ट्स कम्पनी लंबे समय से कई विवादों और कॉरपोरेट गवर्नेंस से जुड़े सवालों का सामना करती रही है।
कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन में भी कमजोरी देखने को मिली थी और राजस्व में गिरावट दर्ज की गई थी।
इसके बावजूद LIC की हिस्सेदारी लगभग 10.8% के आसपास बनी रही।
जबकि पिछले 3 साल में विदेशी इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स ने राजेश एक्सपोर्ट्स में अपनी होल्डिंग कम कर दी है,
कुल FII ओनरशिप मार्च 2023 में 17.60% से गिरकर मार्च 2026 तक 14.26% हो गई।
मतलब विदेशी निवेशकों ने यह खतरा भांप लिया, लेकिन मिडल क्लास के पैसे से चलने वाली LIC आँख मूंदकर सो रही थी ?
कर्ज अमीर ले और डकार जाए, फ्रॉड बड़ी कंपनियां करे और प्रमोटर्स ऐश फरमाएं... मगर उसकी कीमत देश का वो ईमानदार मिडिल क्लास चुकाए, जो पेट काटकर हर महीने LIC की किश्त भरता है।
अब सवाल यह है कि ऐसी कंपनी में निवेश की मंजूरी किस आधार पर दी गई थी?
क्या संभावित जोखिमों का पर्याप्त आकलन किया गया था ?
क्या आम लोगों की गाढ़ी कमाई को निवेश करते समय पर्याप्त जांच-पड़ताल की गई थी?
क्या LIC ने जानबूझकर ऐसा किया ताकि कम्पनी को सपोर्ट मिलता रहे ? (जैसे अडानी केस में किया था)
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