- अडाणी डिफेंस ने Prime Aero Services LLP के साथ मिलकर FSTC में **72.8% बहुमत हिस्सेदारी** ₹820 करोड़ में खरीदी। अब पायलट ट्रेनिंग की भारत की सबसे बड़ी इंडिपेंडेंट कंपनी भी अडाणी के पास – पहले से एयरपोर्ट्स, Air Works और Indamer जैसी MRO कंपनियां हैं। क्या एविएशन का पूरा इकोसिस्टम एक ही ग्रुप के हाथ में जाना ठीक है?
- भारत में अगले 10 साल में **20,000 नए पायलट्स** की जरूरत पड़ेगी (एयरलाइंस 1500 नए विमान ला रही हैं)। ट्रेनिंग में कॉम्पिटिशन कम होने से फीस बढ़ सकती हैं, स्लॉट्स मिलना मुश्किल हो सकता है – मिडिल क्लास का पायलट बनने का सपना और महंगा हो जाएगा?
- अभी भी कुछ बड़े प्लेयर्स बचे हैं जैसे CAE-IndiGo का जॉइंट वेंचर, लेकिन FSTC सबसे बड़ी इंडिपेंडेंट थी। मोनोपॉली नहीं बनेगी तो भी अडाणी का दबदबा बहुत बढ़ जाएगा – ट्रेनिंग क्वालिटी, सिलेबस, सिमुलेटर बुकिंग सब एक ही ग्रुप की मर्जी पर?
- अडाणी के पास अब **ट्रेनिंग MRO (मेंटेनेंस) कई बड़े एयरपोर्ट्स** तक पूरा चेन है। नई पायलट्स या छोटी एविएशन कंपनियां अडाणी पर पूरी तरह निर्भर हो जाएंगी? क्या इससे निष्पक्ष कॉम्पिटिशन खत्म हो रहा है?
- यह डील आत्मनिर्भरता और डिफेंस पायलट ट्रेनिंग को बूस्ट देगी (अडाणी का दावा), लेकिन क्या एक प्राइवेट ग्रुप का इतना कंट्रोल स्ट्रैटेजिक सेक्टर में सुरक्षित है? दूसरे निवेशकों को मौका क्यों कम हो रहा है?
- CCI (Competition Commission of India) ने इस डील की गहराई से जांच की क्या? एविएशन जैसे महत्वपूर्ण सेक्टर में मोनोपॉली की आशंका पर सरकार को पारदर्शी जवाब देना चाहिए।
- अगर फीस या सीटें कंट्रोल हो गईं तो पायलट की कमी और बढ़ेगी – अभी भी इंडियन एयरलाइंस को विदेशी पायलट्स हायर करने पड़ते हैं। क्या यह देशहित में है या एक ग्रुप की मोनोपॉली?
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