नई दिल्ली में बायोलॉजिकल एग्री सॉल्यूशन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (BASAI) द्वारा अपने सातवें स्थापना दिवस के अवसर पर “महिला किसानों का अंतरराष्ट्रीय वर्ष” मनाया गया। इस विशेष कार्यक्रम में सम्मिलित होने का अवसर मुझे प्राप्त हुआ। इस अवसर पर संस्था के अध्यक्ष श्रीमती संदीपा कानिटकर सहित कृषि क्षेत्र से जुड़े अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।
इस अवसर पर मैंने कहा:
यदि कृषि भारत की backbone है, तो
#महिला_किसान उसकी life force हैं। महिला किसान केवल खेतों में श्रम नहीं करतीं, बल्कि वे भविष्य की बुनियाद तैयार करती हैं। वे केवल फसलें नहीं उगातीं, बल्कि परिवारों का पोषण करती हैं। वे केवल अन्न उत्पादन नहीं करतीं, बल्कि भारत की समग्र प्रगति, खाद्य सुरक्षा और आत्मनिर्भरता की आधारशिला भी है।
आज भारत के लाखों गांवों में महिलाएँ खेती, बागवानी, पशुपालन, डेयरी प्रबंधन, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन, खाद्य प्रसंस्करण, बीज संरक्षण और कृषि उद्यमिता जैसे अनेक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने में उनका योगदान अमूल्य है।
इसके बावजूद, आज भी उनकी पहचान स्वतंत्र “किसान” के रूप में नहीं, बल्कि अक्सर “किसान की पत्नी” के रूप में की जाती है। यह वही सोच है जिसे बदलने की आवश्यकता है। महिला किसान किसी की सहायक मात्र नहीं हैं, बल्कि कृषि व्यवस्था की समान भागीदार हैं। वे उत्पादक हैं। वे उद्यमी हैं। वे नवप्रवर्तक हैं। वे निर्णय लेने वाली हैं और सबसे महत्वपूर्ण, वे भारत की खाद्य सुरक्षा की संरक्षक हैं।
आज आवश्यकता है कि महिला किसानों को Recognition, Representation, Resources और Respect — ये चारों समान रूप से प्राप्त हों। हमें ऐसा सशक्त और समावेशी वातावरण तैयार करना होगा, जहाँ कोई महिला केवल श्रमिक के रूप में नहीं, बल्कि मालिक, नेता, नवप्रवर्तक और परिवर्तन की अग्रदूत के रूप में पहचानी जाए।
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