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बोध प्रत्युषा ताओ ते चिंग, अध्याय 15 14,6,26 🌺 मिट्टी का काम हैं बैठना और जल का काम है बहना। 🌺 क्या हम मिट्टी के बैठने और जल के बहने तक रुक सकते है? 🌺 प्रकृति,प्रकृति को गंदा नहीं करती है गंदा सिर्फ अहंकार(मनुष्य) करता है 🌺 दूर दराज के नदी या जलाशय जिसमें मानव हस्तक्षेप नहीं होता है वह कितना साफ होता है जबकि उसमें कई प्रकार के जीव भी निवास करते है जो मल आदि विसर्जित करते है फिर भी वह साफ रहती है । 🌺 अहंकार जब प्रकृति का विनाश करती है तो वह स्वयं का भी विनाश करती जाती हैं। 🌺 पृथ्वी के नीचे मौजूद जीवाश्म ईंधन (कोयला , पैट्रोल) आदि होते है यह स्वयं प्रकृति को प्रदूषित नहीं करती ना,जब तक मानव हस्तक्षेप न करे 🌺 सड़क गंदी है यह वाक्य ही ग़लत है क्योंकि हम गंदे है 🌺 अहंकार सिर्फ एक ही दिशा में सही हो सकता हैं जब वह घट रहा हो। 🌺 तुम अविचल रहो,सही काम अपने आप ही जाएगा।बिना इच्छाशक्ति और जोर के। 🌺 हमारी लोकभाषा में भी कही घटने का शिक्षा नहीं होता , सिर्फ बढ़ने की होती हैं जैसे 👉 खूब तरक्की करो 👉 हमेशा खुश रहो 🌺 नयापन जैसा कुछ नहीं होता है बल्कि पुराना को देखना ही नया है 🌺 परेशान मस्तिष्क नहीं बल्कि अहंकार होता हैं 🌺 कुछ काम जो हमे जरूरी लगते है उसे करने के बाद और बिगड़ जाता है अतः स्वतः होने दे। 🌺 जो परवाह सच की करता है न कि कल की वही आध्यात्मिक है 🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔 अंत मैं कहना चाहूंगी कि संस्था को हर बार आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ता है जिससे काम की गति प्रभावित होती हैं 100 ,200 कुछ नहीं होता है कम से कम 1000 तक डोनेशन करने की सामर्थ्यता होनी चाहिए। हम दुसरे कामों के लिए बिना सोचे पैसा लगा देते है कि आगे चलकर मुनाफा देगा ।लेकिन जो हमे दर्पण दिखाने का काम करता है उनका मूल्य क्यों नहीं करते? अतः ज़्यादा सोचे नहीं सही काम को बहुत बल की जरूरत होती हैं आज ही योगदान करे 🙏🏻 #AcharyaPrashant #EnvironmentAndClimate #Operation2030 @Advait_Prashant @Prashant_Advait Posted by Muskan Kashyap on Acharya Prashant's Gita Mission App. Download Now - app.acharyaprashant.org/?id=…
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💭 *विषय— विश्व दर्शन* *──────────* ⚔️ *द कॉन्क्वेस्ट ऑफ़ नेचर: अगर मैं अविचल रहूँ तो यह सब कौन करेगा?* _क्या आप तब तक अविचल रह सकते हैं, जब तक सही कर्म स्वतः ही प्रकट न हो जाए?_ 🤔 *झुन्नु:* "अगर मैं अविचल रहूँगा, तो यह सब कौन करेगा? नदियों की धारा सीधी कौन करेगा, उन पर बाँध कौन बनाएगा, जलविद्युत शक्ति का दोहन कौन करेगा, तेल कौन निकालेगा, खनन कौन करेगा, शहर कौन बसाएगा और रहने की नई जगहों का उपनिवेशीकरण कौन करेगा?" ⚙️ यहीं से जन्म लेती है *प्रकृति पर विजय* (The Conquest of Nature) की मानसिकता, अर्थात अहंकार का वहाँ भी जबरदस्ती हस्तक्षेप करना, जहाँ उसकी कोई आवश्यकता नहीं है। 📚 *डेविड ब्लैकबॉर्न* की पुस्तक _The Conquest of Nature_ बताती है कि पिछले लगभग 250 वर्षों में जर्मन समाज ने किस प्रकार अपने प्राकृतिक परिवेश को अपनी इच्छानुसार ढालने का प्रयास किया और कैसे इन बदले हुए परिदृश्यों ने जर्मन कल्पना और राष्ट्रीय चेतना पर गहरा प्रभाव डाला। 🏗️ प्रशिया के *फ़्रेडरिक द ग्रेट* से लेकर *योहान गॉटफ़्रीड टुला, ओटो इंट्से* और यहाँ तक कि नाज़ी शासन तक, अनेक शासकों और योजनाकारों ने प्रकृति को वश में करने और उस पर नियंत्रण स्थापित करने की इसी विचारधारा को आगे बढ़ाया। 🧠 ब्लैकबॉर्न दिखाते हैं कि इन परियोजनाओं के पीछे प्रबोधन काल (Enlightenment) का आशावाद और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक साम्राज्यवादी विचार काम कर रहे थे। उसमें प्रकृति को एक ऐसे प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा जाता था जिसे वश में करना और जीत लेना आवश्यक समझा गया। ⚠️ यह अध्ययन यह भी स्पष्ट करता है कि यद्यपि प्रकृति पर नियंत्रण से कुछ निर्विवाद लाभ मिले, लेकिन इसकी कीमत पर्यावरण और मानव समाज, दोनों को भारी रूप से चुकानी पड़ी। 🌍 नदियों को मोड़ने और विशाल बाँध बनाने जैसी परियोजनाओं ने जैव विविधता को क्षति पहुँचाई, तेज़ औद्योगिकीकरण ने जल और वायु प्रदूषण बढ़ाया, विकास के नाम पर अनेक समुदायों का विस्थापन हुआ, और तकनीकी प्रभुत्व की दौड़ ने बेरोज़गारी, सामाजिक विकृतियों तथा ऐसी आर्थिक जटिलताओं को जन्म दिया जिन पर मनुष्य का नियंत्रण लगातार कठिन होता गया। ❓*झुन्नु का सवाल*, "अगर मैं अविचल रहूँ तो यह सब कौन करेगा?" अहंकार की सबसे गहरी धारणा को प्रकट करता है, कि कार्य अहंकार की इच्छा से ही होते हैं और बिना अहंकार के हस्तक्षेप के कुछ भी नहीं होगा। ✅ फ्रेमवर्क का उत्तर सीधा है: यह धारणा ही गलत है। 🌱 जब अहंकार अविचल रहता है, तब भी कार्य होते हैं। शरीर काम करता है। बुद्धि काम करती है। लेकिन कार्य की गुणवत्ता बदल जाती है। वह कार्य जो "मैं यह करूँ" की इच्छा से नहीं, बल्कि "मैं हूँ" से उत्पन्न होता है, वह भिन्न होता है। 🌊 प्रकृति पर विजय की पूरी परियोजना अहंकार की एक विशेष गलतफहमी पर खड़ी है। अहंकार सोचता है, "मैं प्रकृति को नियंत्रित करूँ, तो सब ठीक होगा। मैं नदी को सीधा करूँ, तो शक्ति मिलेगी। मैं जंगल को काटूँ, तो खेत बनेगा।" 🏃 यह क्षैतिज अक्ष पर सबसे ज़ोरदार दौड़ है। और यह दौड़ जितनी तेज़ होती है, उतना ही विनाश होता है, क्योंकि अहंकार जो भी छूता है, उसे विकृत कर देता है। 🕊️ झुन्नु का अविचलता का सवाल वास्तव में यह पूछ रहा है, क्या मैं अपनी इच्छा को छोड़ सकता हूँ? और उत्तर है, हाँ। जब तुम छोड़ते हो, तब भी कार्य होते हैं। लेकिन वे कार्य प्रकृति को नष्ट नहीं करते। 🌿 Conquest of Nature की पूरी परियोजना अहंकार की एक ही गलतफहमी का विस्तार है, कि मेरी इच्छा ही सत्य है, और प्रकृति को उसी के अनुसार ढालना चाहिए। 🔗*स्रोत:* *Ap फ्रेमवर्क:* acharyaprashant.org/hi/ap-fr… *The Conquest of Nature:* penguin.co.uk/books/362178/t… #AcharyaPrashant #APF #EnvironmentAndClimate #Operation2030 #WorldPhilosophy Posted by Vidya-Avidya on Acharya Prashant's Gita Mission App. Download Now - app.acharyaprashant.org/?id=…
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*💭 विषय - पर्यावरण एवं जलवायु* *──────────* *🌍 धरती जल रही और हम ईंधन डाल रहे हैं* 🥵 दिल्ली में अधिकतम तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुँच गया, अस्पताल हीटस्ट्रोक, हृदय संबंधी समस्याओं और निर्जलीकरण के मरीजों से भरने लगे। सबसे अधिक प्रभावित निर्माण मज़दूर, बाहर काम करने वाले श्रमिक और बुज़ुर्ग रहे। 📊 लैंसेट काउंटडाउन ऑन हेल्थ एंड क्लाइमेट चेंज 2025 के अनुसार, 1990 के दशक की तुलना में गर्मी से होने वाली मृत्यु दर में 23 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। हर वर्ष औसतन 5,46,000 लोग अत्यधिक गर्मी के कारण जान गंवाते हैं। इसका अर्थ है कि लगभग हर मिनट एक व्यक्ति की मृत्यु होती है। 🌡️ 2024 में जलवायु परिवर्तन के कारण औसत व्यक्ति को 16 अतिरिक्त खतरनाक गर्मी वाले दिन झेलने पड़े। 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों और शिशुओं के लिए यह संख्या 20 से भी अधिक रही। 2023 में सूखे और लू के कारण 12.4 करोड़ अतिरिक्त लोग खाद्य असुरक्षा की स्थिति में पहुँचे। 💰 आर्थिक नुकसान भी बहुत बड़ा है। 2024 में दुनिया भर में गर्मी के कारण 640 अरब संभावित कार्य-घंटों का नुकसान हुआ। इसकी अनुमानित आर्थिक कीमत 1.09 ट्रिलियन डॉलर रही, जो वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 1 प्रतिशत है। 👷 भारत जैसे देशों में, जहाँ बड़ी संख्या में लोग कृषि, निर्माण, परिवहन और भट्टों जैसे क्षेत्रों में बाहर काम करते हैं, इसका प्रभाव और अधिक दिखाई देता है। अल्पविकसित देशों ने 2024 में गर्मी के कारण श्रम हानि से अपने सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 6 प्रतिशत खो दिया। ⛽ इसके बावजूद 2023 में वैश्विक जीवाश्म ईंधन सब्सिडी 956 अरब डॉलर तक पहुँच गई। यह राशि कुल जलवायु वित्त से भी अधिक थी। 87 देशों में से 15 देशों में यह सब्सिडी उनके राष्ट्रीय स्वास्थ्य बजट से भी बड़ी रही। भारत में रसोई गैस, केरोसीन और पेट्रोलियम क्षेत्र से जुड़ी रियायतों का बोझ स्वास्थ्य बजट से कई गुना अधिक है। 🌱 दूसरी ओर, कोयले पर निर्भरता घटने से 2010 से 2022 के बीच हर वर्ष अनुमानित 1,60,000 असमय मौतों को रोका जा सका। नवीकरणीय ऊर्जा ने 2024 में वैश्विक बिजली उत्पादन में 12 प्रतिशत योगदान दिया और लगभग 1.6 करोड़ लोगों को रोजगार दिया। समाधान के रास्ते मौजूद हैं। 🔄 जिस चीज़ से समस्या पैदा हो रही है, उसी के दुष्प्रभावों से निपटने पर भी भारी खर्च किया जा रहा है। यह केवल विडंबना नहीं, बल्कि एक ऐसा निर्णय है जिसे बार-बार जानबूझकर लिया जा रहा है। ⚖️ जब जीवाश्म ईंधन को 956 अरब डॉलर की सहायता मिलती है और जलवायु सुधार के लिए उससे कम धन उपलब्ध कराया जाता है, तो यह केवल गलती नहीं कहलाती। यह उस सोच का परिणाम है जो अपने लाभ और निरंतरता को सत्य और व्यापक हित से ऊपर रखती है। 🏛️ सरकारों और उद्योगों को यह जानकारी उपलब्ध है कि तापमान बढ़ रहा है। शोध, आँकड़े और चेतावनियाँ सबके सामने हैं। फिर भी प्राथमिकताएँ नहीं बदलतीं। कारण यह है कि जब व्यक्ति या संस्था अपने सीमित हित को सबसे ऊपर रखती है, तो दूसरों का नुकसान उसे उतना महत्वपूर्ण नहीं लगता। 🚶ध्यान देने वाली बात यह भी है कि इस संकट का सबसे अधिक बोझ अक्सर उन लोगों पर पड़ता है जिन्होंने इसके लिए सबसे कम योगदान दिया है। निर्माण मज़दूर, खेतों में काम करने वाले श्रमिक और गरीब परिवार सबसे पहले और सबसे अधिक प्रभावित होते हैं, जबकि उनका कार्बन उत्सर्जन अपेक्षाकृत बहुत कम होता है। 💡 व्यावहारिक स्तर पर समाधान स्पष्ट हैं। जीवाश्म ईंधन सब्सिडी में कमी, नवीकरणीय ऊर्जा में अधिक निवेश, श्रमिकों के लिए गर्मी से सुरक्षा संबंधी कानून और जलवायु वित्त का न्यायपूर्ण वितरण यह सब क्षैतिज स्तर पर आवश्यक कदम हैं। कोयले पर निर्भरता कम होने से लाखों जीवन बच सकते हैं। लेकिन केवल नीतियां बदलना पर्याप्त नहीं होगा। 🧠 पर्यावरणीय संकट अहंकार की संरचना का ही विस्तार है। अहंकार एक अपूर्णता है जो खुद को बाहरी वस्तुओं से भरने का प्रयास करता है। जब तक मनुष्य इस मूल संरचना को नहीं देखता, तब तक नीतियाँ बदलना निरर्थक है। हमें इस खोखलेपन को ईमानदार इरादे के साथ देखना होगा कि इसकी मांगे उठ कहाँ से रही है और फिर जो परिवर्तन होना होगा वो हो जाएगा और वो कोई अद्वितीय घटना नहीं होगी, बस उस खोखलेपन की क्षणिक अनुपस्थिति होगी। #AcharyaPrashant #EnvironmentAndClimate #Operation2030 Posted by Vidya-Avidya on Acharya Prashant's Gita Mission App. Download Now - app.acharyaprashant.org/?id=…
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🌿 "प्रकृति को प्रकृति गंदा नहीं कर सकती, केवल मनुष्य का अहंकार ही उसे प्रदूषित करता है।" 🍃🌎 #AcharyaPrashant #EnvironmentAndClimate #Operation2030 @Advait_Prashant @Prashant_Advait Posted by Pankaj peswani on Acharya Prashant's Gita Mission App. Download Now - app.acharyaprashant.org/?id=…
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*प्रकृति को दोष नहीं दे सकते जहाँ कहीं भी गंदगी नज़र आ रही है। गंदगी तो सिर्फ इंसान या अहंकार करता है।* *अहंकार प्रदूषण और प्रदूषक दोनों है।* ~~आचार्य जी💯🙏🏼🙏🏼 ....चल रहे बोध प्रत्यूषा सत्र से🪔 #AcharyaPrashant #EnvironmentAndClimate #Operation2030 @Advait_Prashant @Prashant_Advait Posted by Ashish Tripathi on Acharya Prashant's Gita Mission App. Download Now - app.acharyaprashant.org/?id=…
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इस चित्र में प्रकृति माँ, एक बच्चे को गोद में उठाए हैं (जो कि मानवता को चित्रित करता है)। पर वह बच्चा ऐसा है, जो एक हाथ से माँग रहा है और माँगता ही रहता है, वह कभी माँगना छोड़ता ही नहीं। और वहीं दूसरे हाथ से माँ के साथ हिंसा भी करता जाता है। शायद इसे बनाने वाले ने, इस चीज को जानते-बूझते दिखाना ना चाहा हो, पर जब से मैंने इसे इस नजरिए से देखा तब से इसमें उजागर हो रही कृतघ्नता को नजरअंदाज करना मुश्किल हो गया है। @Advait_Prashant @Prashant_Advait #AcharyaPrashant #EnvironmentAndClimate #Operation2030 Posted by Adarsh on Acharya Prashant's Gita Mission App. Download Now - app.acharyaprashant.org/?id=…
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💭 विषय – इंडियन करेंट अफेयर्स ____________ *गैलेथिया बे की मूंगा चट्टानें* 🪸 ग्रेट निकोबार द्वीप पर बनने वाले ट्रांसशिपमेंट पोर्ट के कारण जो मूंगा कॉलोनियाँ और विशाल क्लैम प्रभावित होंगे, उन्हें द्वीप के पश्चिमी तट पर चार नई जगहों पर ले जाया जाएगा। यह जानकारी ज़ूलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (ZSI) ने जैव विविधता निगरानी समिति को 7 नवंबर 2024 की बैठक में दी। इस बैठक का विवरण ANIIDCO ने 10 जून 2026 को सार्वजनिक किया। 🐠 पर्यावरण स्वीकृति के समय ZSI ने बताया था कि गैलेथिया बे के एक हिस्से में 10 हेक्टेयर क्षेत्र में कुल 20,668 मूंगा कॉलोनियाँ हैं। इनमें से 16,150 को स्थानांतरित किया जाएगा, बाकी 4,518 को देखकर फ़ैसला होगा। ये मूंगा कॉलोनियाँ और विशाल क्लैम वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I के तहत आते हैं, यानी इन्हें सबसे ऊँचा कानूनी संरक्षण मिला हुआ है। ZSI ने कहा है कि इन्हें हाथ लगाने से पहले ज़रूरी अनुमतियाँ ली जाएंगी। ⚖️ राष्ट्रीय हरित अधिकरण में पर्यावरण कार्यकर्ता ने सरकारी मानचित्रों और तटीय विनियमन क्षेत्र योजना की रिपोर्टों के आधार पर तर्क दिया कि पोर्ट निर्माण-स्थल पर मूंगा मौजूद है और कानून के तहत उसका स्थानांतरण एक अनुमत गतिविधि नहीं है। 🐢 गैलेथिया बे दुनिया में लेदरबैक समुद्री कछुए के सबसे अहम घोंसला बनाने वाले स्थलों में से एक है। भारतीय वन्यजीव संस्थान ने बताया कि सर्वेक्षण में 141 लेदरबैक कछुए के घोंसले मिले हैं। जैव विविधता विशेषज्ञ दीपक आप्टे ने सुझाव दिया कि काम शुरू होने से पहले कछुओं की उपग्रह-टैगिंग को प्राथमिकता दी जाए ताकि उनकी आवाजाही ट्रैक हो सके। 📋 यह निगरानी समिति पर्यावरण मंत्रालय की विशेष शर्तों के तहत बनाई गई है। यह मूंगा स्थानांतरण के साथ-साथ निकोबार मेगापोड, खारे पानी के मगरमच्छ, निकोबार मकाक और रॉबर क्रैब जैसी स्थानिक प्रजातियों के संरक्षण की भी निगरानी करती है। सालिम अली पक्षी विज्ञान केंद्र ने बताया कि स्थानिक पक्षियों पर शुरुआती सर्वेक्षण पूरा हो चुका है और रॉबर क्रैब पर काम जारी है। *मूंगा भित्तियाँ, जिन्हें "समुद्र का वर्षावन" कहा जाता है, लाखों वर्षों में बनती हैं। ये केवल जीव नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र हैं जिनमें हज़ारों प्रजातियाँ, जल-धाराएँ और जैव-रासायनिक चक्र एक-दूसरे से गुंथे होते हैं। वैज्ञानिक बताते हैं कि बड़े पैमाने पर मूंगा स्थानांतरण के सफल होने के प्रमाण अत्यंत सीमित हैं। जो पूरा पारिस्थितिकी तंत्र है, उसे किसी नई जगह रख देना संभव नहीं होता।* यह पहली बार नहीं है। दुनिया भर में जब भी बड़े बुनियादी ढाँचे के लिए प्रकृति को हटाया गया है, तर्क हमेशा एक जैसे रहे हैं। अमेज़न में सड़कें, अफ्रीका में खदानें, चीन में बाँध। हर बार वादा था कि यह आखिरी बार है। हर बार अगली परियोजना आ गई। इंसान के भीतर एक स्थायी रिक्तता बैठी है। वह रिक्तता जो हर उपलब्धि के बाद भी नहीं भरती। जो हर निर्मित चीज़ में तृप्ति ढूंढती है और हर बार निराश होती है। यही वह इंजन है जो हर गैलेथिया बे की गहराई में एक नई परियोजना देखता है। और यही इंजन कभी बंद नहीं होता, क्योंकि यह रिक्तता बाहर से भरने वाली नहीं है। गैलेथिया बे में जो हो रहा है वह केवल एक बंदरगाह का निर्माण नहीं है। यह उस रिक्तता की एक और अभिव्यक्ति है जो हर बनाई हुई चीज़ के बाद अगली चीज़ माँगती है। मूंगा हटाओ, बंदरगाह बनाओ, फिर अगली परियोजना की तलाश करो। स्थानांतरण की प्रक्रिया, पर्यावरण स्वीकृति, ज़ूलॉजिकल सर्वे की निगरानी, ये सब ज़रूरी हैं। इनके बिना नुकसान और बड़ा होगा। लेकिन ये उस मूल प्रश्न का उत्तर नहीं देते: यह भूख कहाँ से आती है? और क्या यह कभी मिटती है? जब तक वह रिक्तता बाहर से भरने की कोशिश जारी रहेगी, गैलेथिया बे अकेला नहीं रहेगा। न वो पहला है, न आखिरी। *📌 स्रोत:* AP Framework: acharyaprashant.org/hi/ap-fr… The Indian Express: indianexpress.com/article/in… #AcharyaPrashant #IndianCurrentAffairs #EnvironmentAndClimate #Operation2030 Posted by Vidya-Avidya on Acharya Prashant's Gita Mission App. Download Now - app.acharyaprashant.org/?id=…
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*💭 Topic - Environment & Climate* *──────────* ⛈️ *मानसून और असहनीय गर्मी!* 🥵 एक किलोग्राम हवा में नमी की एक सीमा होती है। जब वह सीमा पार हो जाए तो पसीना नहीं सूखता। पसीना न सूखे तो शरीर ठंडा नहीं होता। शरीर ठंडा न हो तो अंग काम करना बंद कर देते हैं। यह केवल गर्मी नहीं है। यह असहनीय हीट स्ट्रेस है। *इसे वेट-बल्ब टेम्परेचर कहते हैं।* 🌡️ IIT गांधीनगर, Stanford और Purdue के शोधकर्ताओं का अध्ययन AGU Advances में प्रकाशित हुआ है। निष्कर्ष: जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून के महीनों (जुलाई-अक्टूबर) में असहनीय हीट स्ट्रेस तेज़ी से बढ़ रही है। 1979 से 2021 के बीच प्रभावित क्षेत्र 0.1 से बढ़कर 0.4 लाख वर्ग किमी हो गया। अभी मानसून में केवल 1% भारत प्रभावित होता है। 2°C तापमान वृद्धि पर यह 53% तक पहुँच सकता है। 1.2 अरब भारतीय इसकी चपेट में आ सकते हैं। गंगा के मैदान और तटीय इलाके सबसे संवेदनशील हैं। इससे सबसे ज़्यादा वे लोग प्रभावित होंगे जिनके पास बचने का विकल्प नहीं है। खेतों में काम करने वाले कृषि मज़दूर, निर्माण स्थलों पर काम करने वाले श्रमिक, समुद्र में जाने वाले मछुआरे। एयर-कंडीशनिंग इनके लिए विकल्प नहीं है। मानसून ही इनकी एकमात्र राहत थी। वह राहत अब सिकुड़ रही है। 🌧️ *मानसून को राहत का मौसम माना जाता था। यह अध्ययन उस धारणा को तोड़ता है।* 🥵 *AP Framework's Take* शरीर कोई विचारधारा नहीं जानता। वह 37°C पर काम करता है। वायुमंडल की नमी यह नहीं पूछती कि आप किस विचारधारा के समर्थक हैं। वह बस उस सीमा को पार करती है, जिसके बाद शरीर हार जाता है। अहंकार एक बग है, वह संरचना जो स्वयं को पूर्ण मानकर चलती है और इसीलिए 2°C की वृद्धि को संख्या और 1.2 अरब को आँकड़ा बनाकर टालती रहती है। वास्तव में वह बग (अहंकार) स्वयं अधूरा है। यह अधूरापन केवल व्यक्ति में नहीं है। जीवाश्म ईंधन लॉबी, औद्योगिक नीतियाँ, और हर जलवायु सम्मेलन के बाद की निष्क्रियता, यह सब उसी अहंकार की संस्थागत अभिव्यक्ति है। हर वह निर्णय जो सुविधा को पर्यावरण से ऊपर रखता है, उस 0.4 लाख वर्ग किमी को थोड़ा और बड़ा करता है। और यह सब हो रहा है उस अहंकार की कमी को भरने के चक्कर में। हमें यह देखना होगा कि इस बदलते मौसम पैटर्न और तपती पृथ्वी के लिए ज़िम्मेदार उस अधूरेपन की बड़ी माँ (प्रकृति) को भोग करने की प्रवृत्ति है। लेकिन देखने के साथ वह ईमानदार इरादा भी चाहिए कि इस संकट में मेरी भागीदारी है, और जब गैरज़रूरी उपभोग करने की इच्छा हो तब मैं 'ना' कहने से बचूँ नहीं। तब कोई महानता नहीं आती, केवल उस खोखलेपन की अनुपस्थिति होती है जो 'अभी तो ठीक है' कहकर कल को टालता रहता है। *🔗 Source* thehindu.com/sci-tech/health… *🔗 AP Framework:* acharyaprashant.org/en/ap-fr… #AcharyaPrashant #EnvironmentAndClimate #Operation2030 #APF #Science Posted by Vidya-Avidya on Acharya Prashant's Gita Mission App. Download Now - app.acharyaprashant.org/?id=…
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*💭 Topic - Global Current Affairs* *──────────* *गैंडे के सींग का व्यापार फिर शुरू करना चाहता है दक्षिण अफ्रीका:* 🦏 दक्षिण अफ्रीका अब गैंडे के सींग और ट्रॉफी हंटिंग के अंतरराष्ट्रीय निर्यात को फिर से शुरू करना चाहता है। इसके लिए वह CITES, वन्यजीव व्यापार की अंतरराष्ट्रीय संधि, के तहत एक छूट प्रावधान का उपयोग करना चाहता है। सरकार का तर्क है कि 1977 से चला आ रहा प्रतिबंध उल्टा पड़ा है। इसने अवैध शिकार और काले बाज़ार की कीमतें दोनों बढ़ाई हैं। 🦏 दक्षिण अफ्रीका में गैंडों के सबसे बड़े निजी मालिक के पास 2,000 से अधिक गैंडे थे, जिनके सींग पशुधन की तरह काटे जाते थे। वह व्यापार पुनः खोलने के लिए वर्षों तक लड़ता रहा। अंततः वह दिवालिया हो गया और उसके झुंड को एक पुनर्वन्यीकरण संस्था ने बचाया। अब उस पर 964 गैंडे के सींग दक्षिण-पूर्व एशिया में निर्यात करने के आरोप में जाँच चल रही है। 🦏 नवंबर 2025 में नामीबिया ने CITES से गैंडे के सींग पर वैश्विक प्रतिबंध हटाने की माँग की। 120 मतों के विरुद्ध केवल 30 मतों से यह प्रस्ताव हार गया। 2008 में हाथी दाँत की एक बार की कानूनी बिक्री के बाद हाथियों का अवैध शिकार तेज़ी से बढ़ा था। यही पैटर्न गैंडे पर दोहराए जाने की आशंका है। 🦏 भारत में एक सींग वाला गैंडा, _Rhinoceros unicornis_, असम के काजीरंगा में संरक्षित है। 20वीं सदी की शुरुआत में यह प्रजाति विलुप्ति के कगार पर थी। आज लगभग 4,000 गैंडे हैं। यह संख्या दशकों की सख्त सुरक्षा का परिणाम है, व्यापार का नहीं। *✨ AP Framework’s Take* 🦏 गैंडे के सींग में केराटिन है, वही पदार्थ जो हमारे नाखूनों में होता है। पारंपरिक एशियाई चिकित्सा में इसे बुखार और अन्य बीमारियों के उपचार के रूप में देखा गया है। वैज्ञानिक प्रमाण इसके विपरीत हैं। लेकिन यह तथ्य उस माँग को कम नहीं करता जो दशकों से गैंडों को मरवा रही है। क्योंकि यह माँग तथ्य से नहीं, अहंकार की खोखली पहचान से उठती है। यहाँ वह संरचना समझनी होगी जो इस पूरे विवाद के नीचे है। अहंकार हमेशा किसी बाहरी वस्तु में अपनी पूर्णता खोजता है, क्योंकि वह अपूर्ण है। गैंडे का सींग उस खोज का एक प्रतीक है। दुर्लभ, महँगा, और इसीलिए “शक्ति” का प्रतीक। जितना दुर्लभ, उतनी ऊँची कीमत। उतनी ऊँची पहचान। उतना सुरक्षित सहारा (स्कैफोल्डिंग)। दक्षिण अफ्रीका का तर्क है कि कानूनी व्यापार से संरक्षण के लिए धन आएगा। यह क्षैतिज स्तर पर एक व्यावहारिक तर्क लगता है। लेकिन 2008 के हाथी दाँत प्रयोग ने दिखाया कि कानूनी आपूर्ति माँग को संतुष्ट नहीं करती। वह माँग को वैध बना सकती है और एक वैध माँग, अवैध बाज़ार को खत्म नहीं करती, उसे एक ढाल देती है। यह तर्क की वही विफलता है, जो तब होती है जब अहंकार की माँग को पूरा करके उसे शांत करने की कोशिश की जाती है। अहंकार की माँग पूरी होने से नहीं मिटती। वह और गहरी होती है। इसीलिए “demand reduction”, यानी माँग को कम करना, वही एकमात्र रास्ता है जो इस चक्र को तोड़ सकता है। लेकिन माँग कम करना कठिन है क्योंकि उसके लिए उस पहचान को देखना होगा जो सींग खरीदने में निवेशित है। और जब हम यह देख पाएँगे कि वह निवेशक और कोई नहीं, वही खोखला अहंकार है जिसकी माँग उसी काली अज्ञात गुफा से उठ रही है, तब देखने के साथ-साथ संकल्पित इरादा और दृढ़ निर्णय भी होना चाहिए कि यह प्राणी ‘मेरी पहचान’ के लिए नहीं मरेगा। 📌 *Source:* *DTE*: downtoearth.org.in/africa/rh… *AP FRAMEWORK:* acharyaprashant.org/hi/ap-fr… #AcharyaPrashant #EnvironmentAndClimate #Operation2030 #APF Posted by Vidya-Avidya on Acharya Prashant's Gita Mission App. Download Now - app.acharyaprashant.org/?id=… @Advait_Prashant @Prashant_Advait
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*आचार्य जी जब कहते हैं कि मैं सर से लेकर पाँव तक लहूलुहान हूँ*, तो आज मैं उसी अवस्था में धरती को भी देखता हूँ। यह व्याख्यान इस कविता के माध्यम से किया गया है। *धरती की पुकार* हे पार्थ, ये तुमने क्या किया? तुमने मुझे हर तरफ से लहूलुहान कर दिया। मेरे दिए हुए अमूल्य विरासत को, तुमने स्वयं ही विनष्ट कर दिया। मैंने तुम्हें प्यास बुझाने को निर्मल जल दिया था, तुमने उसे गंदा कर विष में बदल दिया। मैंने तुम्हें शुद्ध ताज़ी हवा दी थी, पर तुमने उसे प्रदूषित कर गंदा बना दिया। मैंने तुम्हें अपनी वादियों में खेलने को दिया था, लेकिन तुमने मेरी ही वादियों को बंजर बना दिया। मैंने पशु-पक्षियों को आश्रय दिए थे, तुमने उन्हें उनके ही घरों से बेघर कर दिया। मैंने तुम्हारी सुरक्षा हेतु पर्वत खड़े किए थे, पर तुमने उनका ही अस्तित्व मिटा दिया । मैंने तुम्हें जीने के लिए एक अनुकूल तापमान दिया था, तुमने उसे बिगाड़, जीवन को ही संकट बना दिया। मैंने तुम्हें अपने गर्भ से ऊर्जा के भंडार दिए थे, पर तुम्हारे अति-लोभ ने मुझे भीतर से खोखला कर दिया। हे पार्थ, ये तुमने क्या किया? तुमने जीते-जी मेरा चीरहरण कर दिया। तुम्हारे अतृप्त उपभोग की लालसा ने, मुझे झकझोर कर लहूलुहान कर दिया। अब मैं कैसे करूँगी रक्षा तुम्हारी इस महाविनाश से— सुनामी, बाढ़, तूफान और भूकंप जैसे प्रकोपों से? जब तुमने स्वयं को मुझसे ही अलग कर लिया, और मेरी सारी ख़ूबसूरती और शक्तियों को छीन, मुझे एक वीरान, बंजर धरती बना दिया। #APF #EnvironmentAndClimate #Poems @Advait_Prashant @Prashant_Advait #AcharyaPrashant #Poems #EnvironmentAndClimate #Operation2030 Posted by sidhartha kumar on Acharya Prashant's Gita Mission App. Download Now - app.acharyaprashant.org/?id=…
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5 th extinction was natural and for 6th one human kind is responsible. #AcharyaPrashant #EnvironmentAndClimate #Operation2030 Posted by ASHU GAUTAM on Acharya Prashant's Gita Mission App. Download Now - app.acharyaprashant.org/?id=…
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🌻शुरुआत में मुझे भी लगता था कि मैं आचार्य जी से कुछ नया सीखने आई हूँ। मैंने न दर्शनशास्त्र पढ़ा था, न फिलॉसफी, इसलिए सोचती थी कि आचार्य जी मुझे जीने की कोई नई कला, कोई नया तरीका बताएँगे। लेकिन धीरे-धीरे समझ में आया कि बात नई जानकारियाँ जोड़ने की नहीं है, बल्कि देखने का ढंग बदलने की है। 🌻जो skill पहले केवल competition जीतने या प्रशंसा पाने का माध्यम लगती थी, उसी का उपयोग एक सार्थक संदेश पहुँचाने के लिए भी किया जा सकता है— यह दृष्टि आपसे मिली। 🌻कुछ दिन पहले मेरे institute में पोस्टर competition हुई। मैंने उसमें भाग लिया और आपकी शिक्षाओं से मिली समझ को एक संदेश के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया। "plastic pollution is not just in oceans, it is in our consciousness" #शायद इसी कारण आप कहते हैं— 📌मुझे मत परखिये, मेरे पास अपना कुछ नहीं है, मै आईना हूँ मुझमें आप ख़ुद को देख रहे हो। धन्यवाद आचार्य जी सही दिशा देने के लिए 🕊️📚✨🙏🕊️ #AcharyaPrashant #EnvironmentAndClimate #Operation2030 @Advait_Prashant @Prashant_Advait Posted by rajni gupta on Acharya Prashant's Gita Mission App. Download Now - app.acharyaprashant.org/?id=…
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💭 *Topic — Environment & Climate * ────────── 🌡️ *जलवायु संकट जंगलों तक पहुँचा: गिर के जंगल में गर्मी से 8 शेर शावकों की मौत* 🦁 गुजरात के *गिर जंगल में 8 एशियाई शेर शावकों की मौत ने बढ़ते तापमान और बदलती जलवायु परिस्थितियों से जुड़े खतरों को सामने रखा है।* जाँच में पाया गया कि इन मौतों का कारण कोई बीमारी नहीं, बल्कि अत्यधिक गर्मी और हीट स्ट्रेस था। 🌡️ अत्यधिक तापमान छोटे शावकों के लिए ज्यादा खतरनाक होता है क्योंकि उनका शरीर वयस्क शेरों की तुलना में तापमान नियंत्रित करने में कमजोर होता है। *हीट स्ट्रेस से डिहाइड्रेशन, अंगों पर दबाव और जीवन का खतरा बढ़ सकता है।* 🌍 एशियाई शेर दुनिया में प्राकृतिक रूप से केवल गुजरात के गिर क्षेत्र में पाए जाते हैं। ऐसे में पूरी आबादी का एक ही क्षेत्र में होना बढ़ती गर्मी, बीमारियों और प्राकृतिक आपदाओं के सामने बड़ा खतरा बन सकता है। 🌳जो जंगल कभी शेरों की रक्षा करते थे, आज वही जंगल बदलते मौसम और बढ़ती गर्मी के सामने संघर्ष कर रहे हैं। यह दिखाता है कि पर्यावरण संकट अब वन्यजीवों के अस्तित्व से भी जुड़ चुका है। *तथ्य और आँकड़े* • 🦁 गिर में एशियाई शेरों की संख्या 2015 में 523 से बढ़कर 2020 में 674 हो गई थी, लेकिन बढ़ती आबादी के साथ आवास पर दबाव और मानव-वन्यजीव संघर्ष भी बढ़ रहे हैं। • 🌱 गिर क्षेत्र में 300 से ज्यादा शेर शावक मौजूद होने का अनुमान रहा है। भविष्य में अत्यधिक गर्मी जैसी घटनाएँ उनके अस्तित्व के लिए बड़ी चुनौती बन सकती हैं। • 🌡️ वैज्ञानिकों के अनुसार बढ़ती हीटवेव और मौसम की अनिश्चितता वन्यजीवों और उनके प्राकृतिक आवास पर नया दबाव बना रही है। *AP Framework's Take* ☘️ गिर के शेर शावकों की मौत केवल वन्यजीव संरक्षण का मुद्दा नहीं है। यह उस मानव-केंद्रित व्यवस्था की ओर भी संकेत करती है जिसमें बाकी जीवों का जीवन हमारी सुविधा, विस्तार और विकास मॉडल के परिणाम झेलता है। ⚖️ जंगल घटते हैं, तापमान बदलता है और जीवों के प्राकृतिक घर असुरक्षित होते जाते हैं, लेकिन मनुष्य की सुविधा की माँग कम नहीं होती। तेज यात्रा, अधिक उत्पादन और लगातार बढ़ता उपभोग धीरे-धीरे हमारी पहचान का हिस्सा बन जाते हैं। यही स्कैफोल्डिंग हमें उस व्यवस्था से बाँधे रखती है जो संकट पैदा कर रही है। ☘️ अहंकार स्वयं अधूरापन है। इसी अधूरेपन से इच्छा-चलित कर्म का आईसी इंजन चलता है, जो अधिक सुविधा, नियंत्रण और विस्तार खोजता रहता है। सेल्फ-प्रिजर्वेशन में अहंकार अपनी बनी हुई पहचान और जीवनशैली को बचाना चाहता है, भले ही उसकी कीमत बाकी जीवन को चुकानी पड़े। 🪞 हॉरिजॉन्टल एक्सिस पर वन संरक्षण, वैज्ञानिक प्रयास और जलवायु नीतियाँ आवश्यक हैं। लेकिन केवल बाहरी समाधान पर्याप्त नहीं हैं। देखना जरूरी है कि समस्या के पीछे हमारी अपनी दिशा क्या है, और सही इंटेंट के बिना, अहंकार नए रूपों में वही संकट दोहराता रहता है। 🔗 *AP फ्रेमवर्क:* acharyaprashant.org/hi/ap-fr… 🔗 *Source:* thehindu.com/news/national/g… #AcharyaPrashant #EnvironmentAndClimate #Operation2030 #APF Posted by Vidya-Avidya on Acharya Prashant's Gita Mission App. Download Now - app.acharyaprashant.org/?id=…
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*✍🏻 Post 4 | 8 June'26* *💭 Topic: Environment & Climate* *──────────* *🐗 एक ही ज़िले में: कुछ किसान जानवर को भगाते हैं, कुछ ने ज़मीन दे दी* ओडिशा के गंजाम ज़िले में K Bhimaya Reddy ने पिछले पाँच साल से अपनी 2.02 हेक्टेयर ज़मीन पर धान की खेती छोड़ दी है। कारण: जंगली सूअरों के झुंड। जैसे ही फसल उगती है, वे चट कर जाते हैं। कई बार लागत भी नहीं निकलती। Rangeilunda ब्लॉक के पाँच-छह गाँवों के किसानों ने "crop holiday" घोषित कर दिया है। कई परिवार रोज़गार की तलाश में दूसरे राज्यों में चले गए हैं। कुछ किसान धान की जगह kewra यानी screw pine उगा रहे हैं - एक ऐसी फसल जो लगाने के पाँच से सात साल बाद फूलती है। यह विकल्प नहीं है, यह हार है। फसल बचाने के लिए कुछ किसान बिजली के खंभों से तार खींचकर खेतों में live wire बिछाते हैं। यह तार जंगली सूअर को मारता है। हाथी को भी। तेंदुए को भी। और कभी-कभी इंसान को भी। गंजाम ज़िले में पिछले पाँच वर्षों में कम से कम 7-10 लोग इस तरह मारे जा चुके हैं। राज्य के आँकड़े बताते हैं कि 2015-16 से 2024-25 के बीच 10 वर्षों में वन्यजीवों से फसल नुकसान के लिए ₹25,086 लाख का मुआवज़ा दिया गया। 63,273 हेक्टेयर की फसल नष्ट हुई। 4,71,460 किसान प्रभावित हुए। 🦌 लेकिन उसी ज़िले में एक और कहानी है। गंजाम में blackbuck यानी काला हिरण भी फसल नष्ट करता है। लेकिन किसान उसे नुकसान नहीं पहुँचाते। Bhetanai गाँव के निवासियों ने स्वेच्छा से 30 हेक्टेयर से अधिक ज़मीन blackbuck की चराई के लिए छोड़ दी है। "हमारे पूर्वजों ने पहले यहाँ खेती की थी। बाद में उन्होंने यह ज़मीन blackbuck के लिए छोड़ दी।" किसानों ने blackbuck से नुकसान का कोई मुआवज़ा नहीं माँगा — न तब, न अब। *🌟AP Framework's Take:* एक ही ज़िले में दो कहानियाँ हैं। एक किसान live wire बिछाता है - सूअर को, हाथी को, और कभी-कभी खुद अपने पड़ोसी को मारता है। दूसरा किसान 30 हेक्टेयर ज़मीन बिना मुआवज़े के छोड़ देता है। बाहर से देखने पर यह दो आर्थिक निर्णय लगते हैं। लेकिन यह दो अलग-अलग खातों की कहानी है - एक खुला खाता, एक बंद। जो किसान live wire बिछाता है, वह गलत नहीं है। वह उसी दबाव में है जिसमें सूअर है। सूअर का जंगल सिकुड़ा है - किसी ने काटा, किसी ने बसाया, किसी ने बाँध बनाया। वह सूअर खेत में इसलिए नहीं आया कि उसे किसान से दुश्मनी है। वह इसलिए आया क्योंकि जो उसका था, वह जा चुका है। यह conflict दो प्राणियों के बीच नहीं है। यह उस अहंकार की गति का परिणाम है जो "पर्याप्त" नहीं जानती - जिसने जंगल को खेत में बदला, खेत को कारखाने में, और अब हम हैरान हैं कि जानवर कहाँ से आ रहे हैं। जब habitat सिकुड़ता है तो conflict नहीं बढ़ता conflict तो पहले से था, अब वह दिखने लगा है। और वह live wire जो सात-दस लोगों को मार चुकी है, वह अहंकार के उस ledger का चित्र है जो इतना बड़ा हो जाता है कि उसे दिखना बंद हो जाता है कि औज़ार अब किसे मार रहा है। Bhetanai के किसानों ने ledger बंद किया। यह कोई spiritual उपलब्धि नहीं है, लेकिन यह उस दिशा में एक कदम है जहाँ जगह बनती है। Fencing और compensation ज़रूरी हैं, लेकिन जो इस संकट को जन्म देता है, वह IC engine की वह गति है जो रुकना नहीं जानती। वह उपाय बाहर से नहीं आएगा। AP Framework: acharyaprashant.org/en/ap-fr… Source: downtoearth.org.in/wildlife-… #AcharyaPrashant #EnvironmentAndClimate #Operation2030 Posted by Vidya-Avidya on Acharya Prashant's Gita Mission App. Download Now - app.acharyaprashant.org/?id=… @Advait_Prashant @Prashant_Advait
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*💭 Topic — Environment and Climate* *──────────* *🌳 3,000 हेक्टेयर वन भूमि: विकास की कीमत* केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की वन सलाहकार समिति (FAC) ने अरुणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, गोवा और ओडिशा में जलविद्युत, कोयला तथा लौह अयस्क परियोजनाओं के लिए 3,000 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि के डायवर्जन को सैद्धांतिक मंजूरी दी है। ⚡ अरुणाचल प्रदेश की दिबांग घाटी में 680 मेगावाट अट्टुनली परियोजना के लिए 261.53 हेक्टेयर, लोहित नदी पर 1,200 मेगावाट कलाई परियोजना के लिए 869.35 हेक्टेयर जिसमें अत्यधिक सघन वन शामिल हैं तथा छत्तीसगढ़ में केंटे एक्सटेंशन कोल माइन के लिए 1,742.6 हेक्टेयर वन भूमि को मंजूरी मिली है। कोल माइन क्षेत्र लेमरू हाथी अभ्यारण्य के निकट है। सभी परियोजनाओं पर वन्यजीव प्रबंधन योजना और क्षतिपूरक वृक्षारोपण की शर्तें अनिवार्य हैं। 🔬 विशेषज्ञों की चिंता केवल पेड़ों की संख्या तक सीमित नहीं है। CSE की निदेशक सुनीता नारायण के अनुसार अत्यधिक सघन वन जो देश के भूभाग का मात्र 3% हैं, जैव विविधता और कार्बन संग्रहण के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं, और इनकी क्षति को वृक्षारोपण से नहीं भरा जा सकता। 🐘Wildlife Institute of India के शोधकर्ताओं के अनुसार लेमरू जैसे क्षेत्रों में खनन हाथियों के प्रवास गलियारों को बाधित करता है। जल विज्ञानियों का मानना है कि दिबांग जैसी घाटियों में बाँध निर्माण नदी तंत्र और निचले क्षेत्रों की पारिस्थितिकी को दीर्घकाल तक प्रभावित कर सकता है। 🌳_वन पारिस्थितिकीविदों के अनुसार परिपक्व सघन वन लाखों वर्षों में विकसित होने वाले जटिल तंत्र हैं;क्षतिपूरक वृक्षारोपण उनकी भरपाई नहीं कर सकता।_ 📋 इन विशेषज्ञों की सामूहिक चिंता एक बिंदु पर आकर ठहरती है: मंजूरी की शर्तें उन नुकसानों की भाषा में नहीं लिखी गईं जो वास्तव में होंगे। वन्यजीव प्रबंधन योजना हाथी के खोए हुए गलियारे को वापस नहीं लाती। क्षतिपूरक वृक्षारोपण उस जैव विविधता को पुनः नहीं बना सकता जो लाखों वर्षों में बनी थी। जो तंत्र नुकसान को संख्या में बदलकर उसे "संतुलित" घोषित कर देता है, वह तंत्र नुकसान को स्वीकार नहीं कर रहा। वह केवल उसे प्रबंधित करने का नाम दे रहा है। *🌟AP फ्रेमवर्क का दृष्टिकोण* 🌍3,000 हेक्टेयर एक संख्या नहीं है। लेकिन इससे भी पहले एक प्रश्न है - यह बिजली किसके लिए, यह कोयला किसके लिए? FAC की मंजूरी एक श्रृंखला का अंतिम छोर है; पहला छोर वह माँग है जो हम सब मिलकर बनाते हैं। ⚙️ अहंकार ही अधूरापन है - यह उसका गुण नहीं, यही उसका स्वरूप है। जो संरचना स्वयं अपूर्णता है, वह भरने से नहीं भरती। यही IC engine का स्वभाव है - वह रुकना नहीं जानती। हर मंजूरी अगली मंजूरी के लिए मिसाल बन जाती है। क्षैतिज उपाय - बेहतर शर्तें, कड़ी निगरानी - सहायक हैं, लेकिन पर्याप्त नहीं। 📒 यही अहंकार का बही-खाता है। परियोजना अधिकारी कहता है - "शर्तें लगाई हैं।" उपभोक्ता कहता है - "मैं तो बस बिजली इस्तेमाल कर रहा हूँ।" नीति निर्माता कहता है - "GDP बढ़ानी है।" हर कड़ी अपने छोटे खाते में संतुलित है - पूरी श्रृंखला का हिसाब कोई नहीं रखता। और इस श्रृंखला का पहला छोर वे नहीं हैं जो मंजूरी देते हैं। पहला छोर वे हैं जिन्होंने यह माँग की संरचना बनाई, उसे लाभदायक बनाया, और उसे चलाए रखने में अपना हित देखते हैं। 🌑 जो वन नहीं काटा गया - जो नदी बाधित नहीं हुई, जो प्रजाति विस्थापित नहीं हुई - वह किसी खाते में दर्ज नहीं होता। यही via negativa है जो इस पूरे तंत्र से अनुपस्थित है: जो नष्ट नहीं हुआ, वही असली संपदा थी। और यह संपदा तब तक अदृश्य रहेगी जब तक देखने वाला भी उसी व्यवस्था का हिस्सा बना रहेगा जो उसे मिटा रही है। _👁️ जब तक यह देखना बाहर की ओर है - FAC पर, सरकार पर, कॉर्पोरेट पर - तब तक वह भी अहंकार की कहानी का एक और अध्याय है। जब तक अहंकार अपने घुलने का इरादा नहीं चुनता, देखना भी उसे बचाए रखने का एक और तरीका बन जाता है।_ *🔗 स्रोत* *AP FRAMEWORK* acharyaprashant.org/en/ap-fr… *CSE* cseindia.org/the-case-of-ind… #AcharyaPrashant #EnvironmentAndClimate #Operation2030 #APF Posted by Vidya-Avidya on Acharya Prashant's Gita Mission App. Download Now - app.acharyaprashant.org/?id=…
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*✨जब कैम्ब्रिज यूनियन में गूँजी भारत की आवाज़, आचार्य जी का संदेश कैंब्रिज से*✨ ✨30 मई 2025 को कैम्ब्रिज यूनियन के उस हॉल में, जहाँ विन्स्टन चर्चिल और स्टीफन हॉकिंग जैसे नाम बोल चुके हैं, आचार्य प्रशांत ने एक सोल्ड-आउट सेशन को संबोधित किया। वे इकलौते फिलॉसफर थे और उन्हें सबसे लंबा स्पीकिंग स्लॉट दिया गया। ✨सेशन को कैम्ब्रिज जज बिज़नेस स्कूल के प्रोफेसर जयदीप प्रभु ने मॉडरेट किया। यूके मिनिस्टर कनिष्क नारायण, लॉर्ड करण बिलिमोरिया और भारत के हाई कमिश्नर एच.ई. पेरियासामी कुमारन भी मौजूद थे। ✨*क्या कहा उन्होंने?* उन्होंने कहा कि क्लाइमेट चेंज और वैश्विक संकट की जड़ टेक्नोलॉजी की कमी या पॉलिसी की विफलता में नहीं, बल्कि मनुष्य के उस अपरीक्षित आंतरिक जीवन में है। मानवता ने विज्ञान, तकनीक, आर्थिक विकास सब आज़माया - लेकिन "मास एजुकेशन ऑफ द सेल्फ" कभी नहीं। यही वो वेरिएबल है जो हर ग्लोबल समिट की एजेंडा से गायब रहा। ✨क्लाइमेट चेंज पर उन्होंने दक्षता के उस ट्रैप को उघाड़ा जिसे हम प्रोग्रेस समझते हैं - इलेक्ट्रिक व्हीकल्स को जवाब बताया जा रहा है, लेकिन कोबाल्ट-लिथियम माइनिंग और इकोसिस्टम की तबाही अलग से जारी है। *✨उपनिषदों की वो पुरानी पहचान* उपनिषदिक अविद्या और विद्या के अंतर को उन्होंने आधुनिक सभ्यता के असंतुलन का सबसे पुराना और सटीक निदान बताया। ✨*विस्तार जारी है* हमारी संस्था (प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन) की पहुँच आज 100 से अधिक देशों और 100 मिलियन से ज़्यादा लोगों तक है। कैम्ब्रिज के बाद ऑक्सफोर्ड, LSE और किंग्स कॉलेज लंदन में भी सेशन तय हैं। ✨यह सिर्फ एक टूर नहीं, यह संकेत है कि वो बातें अब दुनिया के सबसे बड़े अकेडमिक मंचों पर गंभीरता से सुनी जा रही हैं। 🙏एक स्टूडेंट के तौर पर, बस कृतज्ञता। *Source:* edexlive.com/news/acharya-pr… #AcharyaPrashant #EnvironmentAndClimate #Operation2030 Posted by Ramesh Singh Rajpurohit on Acharya Prashant's Gita Mission App. Download Now - app.acharyaprashant.org/?id=…
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The climate crisis is not a crisis of technology or policy. It belongs to the EGO the force of separation that creates otherness. - Acharya ji, London Session @Advait_Prashant @Prashant_Advait #AcharyaPrashant #EnvironmentAndClimate #Operation2030 #Quotes #APinUK
May 31
Cambridge, UK: Addressing at the Cambridge Union, philosopher and author Acharya Prashant said humanity has made enormous progress in science, technology, and economic growth over the last 200 years, yet continues moving toward crisis and possible extinction. He said that what humanity has not seriously attempted is mass education of the self. The real questions that need to be asked, he argued, are about one's own identity, one's desires, and whether accumulation can ever bring lasting satisfaction.
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The climate crisis is not a crisis of technology or policy. It belongs to the EGO the force of separation that creates otherness. - Acharya ji, London Session @Advait_Prashant @Prashant_Advait #AcharyaPrashant #EnvironmentAndClimate #Operation2030 #Quotes Posted by Jagat Shahi on Acharya Prashant's Gita Mission App. Download Now - app.acharyaprashant.org/?id=…
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🔥 जंगलों की आग से निकलने वाला "भूरा कार्बन" जलवायु संकट को और बढ़ा सकता है इस लेख में बताया गया है कि जंगलों की आग से निकलने वाले धुएँ में मौजूद "भूरा कार्बन" वैज्ञानिकों की पहले की धारणा से कहीं अधिक शक्तिशाली रूप से पृथ्वी को गर्म कर सकता है। नए शोध के अनुसार, यह कण सूर्य के प्रकाश को अवशोषित करके वातावरण को गर्म करते हैं, जिससे जलवायु परिवर्तन की गति और तेज़ हो सकती है। शोधकर्ताओं ने पाया कि जंगलों की आग के दौरान बनने वाला भूरा कार्बन वातावरण में पहुँचने के बाद रासायनिक रूप से बदलता रहता है और कई दिनों तक अपनी ऊष्मा-अवशोषण क्षमता बनाए रख सकता है। पहले माना जाता था कि इसका प्रभाव अपेक्षाकृत कम समय तक रहता है, लेकिन नए अध्ययन से संकेत मिलता है कि इसका जलवायु प्रभाव अधिक गंभीर हो सकता है। लेख के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया के कई क्षेत्रों में जंगलों की आग की घटनाएँ बढ़ रही हैं। इससे वातावरण में अधिक मात्रा में भूरा कार्बन पहुँच रहा है, जो एक खतरनाक चक्र बना सकता है: बढ़ता तापमान अधिक आग को जन्म देता है और अधिक आग वातावरण को और गर्म करती है। 📊 महत्वपूर्ण आँकड़े 🔸️भूरा कार्बन सूर्य के प्रकाश को अवशोषित करने में पहले के अनुमानों से कहीं अधिक प्रभावशाली हो सकता है। 🔸️जंगलों की आग से उत्पन्न कण वातावरण में कई दिनों से लेकर हफ्तों तक सक्रिय रह सकते हैं। 🔸️दुनिया के कई क्षेत्रों में जंगलों की आग की आवृत्ति और तीव्रता में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। 📑 प्रमुख संस्थाएँ और संदर्भ ▪️इस शोध में जंगलों की आग से उत्पन्न भूरे कार्बन के जलवायु प्रभावों का अध्ययन किया गया। ▪️IPCC ने एरोसोल और कार्बन कणों के जलवायु प्रभावों को समझने के महत्व पर ज़ोर दिया है। 🌟 AP Framework's Take जंगलों की आग का यह चक्र केवल प्राकृतिक घटना नहीं है। जीवाश्म ईंधन पर टिकी अर्थव्यवस्थाएँ, औद्योगिक कृषि की विस्तारवादी नीतियाँ, और उन नीतियों को बनाए रखने वाले विशिष्ट आर्थिक हित, इन्होंने वे परिस्थितियाँ बनाई हैं जिनमें यह फीडबैक लूप इतना विकराल हुआ है। इस संरचनात्मक वास्तविकता को बदले बिना, उत्सर्जन में कटौती, नीति-सुधार, और जवाबदेही के बिना, केवल धुएँ को मापते रहना पर्याप्त नहीं होगा। लेकिन यह प्रश्न भी उतना ही ज़रूरी है: वे संरचनाएँ टिकी किस पर हैं? जो व्यक्ति इस पोस्ट को पढ़ रहा है, वह बिजली का उपयोग करता है, उत्पाद खरीदता है, उस अर्थव्यवस्था में भाग लेता है जो इन आगों की पृष्ठभूमि है। वह कभी नहीं कहता कि "पर्याप्त है।" हर उपलब्धि अगली की माँग बन जाती है, हर संतुष्टि अगली भूख की भूमिका। यही अधूरापन जब सामूहिक रूप में संस्थाओं और बाज़ारों में ढल जाता है, तो "और अधिक उत्पादन, और अधिक उपभोग, और अधिक विकास" का वह तर्क बनता है जिसने इन जंगलों को ईंधन बना दिया। इस चक्र की एक विशेष विडंबना यह है कि शोधकर्ता बार-बार पाते हैं कि नुकसान उनके पिछले अनुमानों से अधिक है। भूरा कार्बन पहले से ज़्यादा गर्म करता है, फीडबैक लूप पहले से ज़्यादा तेज़ है। यह व्यवस्थित रूप से कम आँकना भी कुछ कहता है, जो चेतना अपनी भूख के परिणामों को देखना नहीं चाहती, वह उन्हें मापने में भी देर करती है। 🌐 Source: phys.org/news/2026-05-wildfi… 🔗 AP Framework: acharyaprashant.org/hi/ap-fr… #AcharyaPrashant #EnvironmentAndClimate #Operation2030 #Science Posted by Vidya-Avidya on Acharya Prashant's Gita Mission App. Download Now - app.acharyaprashant.org/?id=…
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🔥बांदा क्यों जलता है - और किसकी वजह से? बांदा (बुंदेलखंड) मई 2026 में दुनिया के सबसे गर्म स्थानों में शामिल रहा, जहाँ 21 मई को 48.2°C तापमान दर्ज किया गया। विशेषज्ञों के अनुसार यह केवल गर्मी की लहर नहीं, बल्कि भूगोल, मौसम और मानवीय गतिविधियों से बना एक "मानव-निर्मित ताप द्वीप" है। बांदा की गर्मी के पीछे मुख्य रूप से तीन कारण हैं: 1️⃣ भौगोलिक बनावट: अर्ध-शुष्क पठार पर स्थित होने के कारण यहाँ की ग्रेनाइट और बेसाल्ट चट्टानें दिन में गर्मी सोखकर रात में धीरे-धीरे छोड़ती हैं, जिससे रातें ठंडी नहीं हो पातीं। कर्क रेखा के नजदीक होने से सूर्य का विकिरण भी यहाँ अधिक मिलता है। 2️⃣ मौसमी परिस्थितियाँ: गर्मियों में मध्य भारत के ऊपर बनने वाला प्रतिचक्रवाती परिसंचरण (Anticyclonic Circulation) बादलों को बनने नहीं देता। साफ आसमान और थार मरुस्थल से आने वाली गर्म, शुष्क हवाएँ तापमान को बढ़ा देती हैं। 3️⃣ मानवीय हस्तक्षेप (सबसे बड़ा कारण): बांदा में हरित आवरण घटकर केवल 3% रह गया है (जबकि चित्रकूट में 18% और झाँसी में 6% है)। पेड़ों की कमी से प्राकृतिक शीतलन खत्म हो गया है। केन नदी में भारी रेत खनन से भूजल स्तर गिर गया है और पत्थर खनन व ईंट भट्टी अतिरिक्त मानव-जनित ताप पैदा कर रहे हैं। आँकड़ों के अनुसार, बांदा हर वर्ष अपनी 13.72% वार्षिक जल उपलब्धता खो रहा है। घटता भूजल, सूखते तालाब और कम होती वनस्पति मिलकर एक ऐसा "ताप दुश्चक्र" बना रहे हैं जहाँ अधिक गर्मी से नमी घटती है और कम नमी तापमान को और बढ़ा देती है। 🌟 AP फ्रेमवर्क का दृष्टिकोण: बांदा जल रहा है। लेकिन आग किसने लगाई? 48 डिग्री तापमान को "प्राकृतिक आपदा" कहना सबसे सुविधाजनक झूठ है जो अहंकार बोलता है। प्रकृति ने बांदा को नहीं जलाया। अहंकार ने जलाया। वह अहंकार जो हर चीज़ को केवल अपने उपयोग की वस्तु मानता है। 🌳 13% हरित आवरण से 3% तक का सफर किसी तूफान ने तय नहीं किया। यह मानवीय लालच की धीमी और सुनियोजित यात्रा है। केन नदी की रेत किसने खोदी? पत्थर की खानें किसने चलाईं? ईंट भट्टियाँ किसने जलाईं? वही लोग जो आज जलवायु परिवर्तन की चर्चा करते हुए स्वयं को पीड़ित बताते हैं। प्रकृति का दोहन करने वाले ज़रूर बड़े-बड़े सेठ और नेता हैं, जो विकास के नाम पर आम आदमी को सपने दिखा रहे हैं। लेकिन विडंबना यह है कि जो आम आदमी आज इसकी कीमत चुकाते हुए रो रहा है, वही अब भी इन सेठों और नेताओं को अपना आदर्श मानता है। यही अहंकार की सबसे घातक चाल है। अपराध करना और फिर उसे स्मृति से मिटा देना। 🏝️ विशेषज्ञ इसे "ताप द्वीप" (Heat Island) कहते हैं। फ्रेमवर्क इसे "अहंकार द्वीप" बताता है। एक ऐसी जगह जहाँ इंसान ने अपनी तात्कालिक इच्छाओं के लिए पूरी पारिस्थितिकी को बंधक बना लिया है। 🏛️ और अब वही अहंकार सरकार को दोष देता है, नीतियों को कोसता है और जलवायु सम्मेलनों पर उँगली उठाता है। यह देखना नहीं है, यह भागना है। 🪞 सच्चा देखना वह है जो रुककर पूछे, "इस जलते हुए बांदा में मेरी भूमिका क्या है?" जब तक "मैं" और "मेरा लाभ" केंद्र में रहेंगे, तब तक बांदा जलता रहेगा। बाहर का तापमान तब तक नहीं गिरेगा, जब तक भीतर का लालच कम नहीं होता। 🌱 यह केवल बाहर पर्यावरण की समस्या नहीं है। यह अहंकार की समस्या है। और अहंकार की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह हमेशा बाहर देखता है, भीतर कभी नहीं। 🔗स्त्रोत: "Indian Express" indianexpress.com/article/ex… "AP Framework" acharyaprashant.org/en/ap-fr… #AcharyaPrashant #EnvironmentAndClimate #Operation2030 Posted by Vidya-Avidya on Acharya Prashant's Gita Mission App. Download Now - app.acharyaprashant.org/?id=…
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