💭 *विषय— विश्व दर्शन*
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⚔️ *द कॉन्क्वेस्ट ऑफ़ नेचर: अगर मैं अविचल रहूँ तो यह सब कौन करेगा?*
_क्या आप तब तक अविचल रह सकते हैं, जब तक सही कर्म स्वतः ही प्रकट न हो जाए?_
🤔 *झुन्नु:* "अगर मैं अविचल रहूँगा, तो यह सब कौन करेगा? नदियों की धारा सीधी कौन करेगा, उन पर बाँध कौन बनाएगा, जलविद्युत शक्ति का दोहन कौन करेगा, तेल कौन निकालेगा, खनन कौन करेगा, शहर कौन बसाएगा और रहने की नई जगहों का उपनिवेशीकरण कौन करेगा?"
⚙️ यहीं से जन्म लेती है *प्रकृति पर विजय* (The Conquest of Nature) की मानसिकता, अर्थात अहंकार का वहाँ भी जबरदस्ती हस्तक्षेप करना, जहाँ उसकी कोई आवश्यकता नहीं है।
📚 *डेविड ब्लैकबॉर्न* की पुस्तक _The Conquest of Nature_ बताती है कि पिछले लगभग 250 वर्षों में जर्मन समाज ने किस प्रकार अपने प्राकृतिक परिवेश को अपनी इच्छानुसार ढालने का प्रयास किया और कैसे इन बदले हुए परिदृश्यों ने जर्मन कल्पना और राष्ट्रीय चेतना पर गहरा प्रभाव डाला।
🏗️ प्रशिया के *फ़्रेडरिक द ग्रेट* से लेकर *योहान गॉटफ़्रीड टुला, ओटो इंट्से* और यहाँ तक कि नाज़ी शासन तक, अनेक शासकों और योजनाकारों ने प्रकृति को वश में करने और उस पर नियंत्रण स्थापित करने की इसी विचारधारा को आगे बढ़ाया।
🧠 ब्लैकबॉर्न दिखाते हैं कि इन परियोजनाओं के पीछे प्रबोधन काल (Enlightenment) का आशावाद और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक साम्राज्यवादी विचार काम कर रहे थे। उसमें प्रकृति को एक ऐसे प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा जाता था जिसे वश में करना और जीत लेना आवश्यक समझा गया।
⚠️ यह अध्ययन यह भी स्पष्ट करता है कि यद्यपि प्रकृति पर नियंत्रण से कुछ निर्विवाद लाभ मिले, लेकिन इसकी कीमत पर्यावरण और मानव समाज, दोनों को भारी रूप से चुकानी पड़ी।
🌍 नदियों को मोड़ने और विशाल बाँध बनाने जैसी परियोजनाओं ने जैव विविधता को क्षति पहुँचाई, तेज़ औद्योगिकीकरण ने जल और वायु प्रदूषण बढ़ाया, विकास के नाम पर अनेक समुदायों का विस्थापन हुआ, और तकनीकी प्रभुत्व की दौड़ ने बेरोज़गारी, सामाजिक विकृतियों तथा ऐसी आर्थिक जटिलताओं को जन्म दिया जिन पर मनुष्य का नियंत्रण लगातार कठिन होता गया।
❓*झुन्नु का सवाल*, "अगर मैं अविचल रहूँ तो यह सब कौन करेगा?" अहंकार की सबसे गहरी धारणा को प्रकट करता है, कि कार्य अहंकार की इच्छा से ही होते हैं और बिना अहंकार के हस्तक्षेप के कुछ भी नहीं होगा।
✅ फ्रेमवर्क का उत्तर सीधा है: यह धारणा ही गलत है।
🌱 जब अहंकार अविचल रहता है, तब भी कार्य होते हैं। शरीर काम करता है। बुद्धि काम करती है। लेकिन कार्य की गुणवत्ता बदल जाती है। वह कार्य जो "मैं यह करूँ" की इच्छा से नहीं, बल्कि "मैं हूँ" से उत्पन्न होता है, वह भिन्न होता है।
🌊 प्रकृति पर विजय की पूरी परियोजना अहंकार की एक विशेष गलतफहमी पर खड़ी है। अहंकार सोचता है, "मैं प्रकृति को नियंत्रित करूँ, तो सब ठीक होगा। मैं नदी को सीधा करूँ, तो शक्ति मिलेगी। मैं जंगल को काटूँ, तो खेत बनेगा।"
🏃 यह क्षैतिज अक्ष पर सबसे ज़ोरदार दौड़ है। और यह दौड़ जितनी तेज़ होती है, उतना ही विनाश होता है, क्योंकि अहंकार जो भी छूता है, उसे विकृत कर देता है।
🕊️ झुन्नु का अविचलता का सवाल वास्तव में यह पूछ रहा है, क्या मैं अपनी इच्छा को छोड़ सकता हूँ? और उत्तर है, हाँ। जब तुम छोड़ते हो, तब भी कार्य होते हैं। लेकिन वे कार्य प्रकृति को नष्ट नहीं करते।
🌿 Conquest of Nature की पूरी परियोजना अहंकार की एक ही गलतफहमी का विस्तार है, कि मेरी इच्छा ही सत्य है, और प्रकृति को उसी के अनुसार ढालना चाहिए।
🔗*स्रोत:*
*Ap फ्रेमवर्क:*
acharyaprashant.org/hi/ap-fr…
*The Conquest of Nature:*
penguin.co.uk/books/362178/t…
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Posted by Vidya-Avidya on Acharya Prashant's Gita Mission App.
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