🔥 वर्टिकल प्रणाली ने तोड़ी कमर, फिर भी मोर्चे पर डटे इंजीनियर!
“नोटिस लिखें या जनता को बिजली दें?” — मैदान में जूझ रहे अभियंताओं का बड़ा सवाल
उत्तर प्रदेश की विद्युत व्यवस्था इस समय भीषण दबाव में है, लेकिन सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि जमीन पर 24 घंटे लड़ रहे अभियंताओं और ईमानदार संविदा कर्मियों को सहयोग देने के बजाय विभागीय तंत्र उन्हें कागजी जाल में उलझाने में व्यस्त है।
जिस “वर्टिकल प्रणाली” को सुधार का मॉडल बताया गया था, वही आज विद्युत व्यवस्था को अंदर से खोखला करती नजर आ रही है।
पहले जहां एक अवर अभियंता (JE) एक पावर हाउस को संभालने में ही पूरी ताकत लगा देता था, वहीं अब एक-एक JE के ऊपर चार-चार और पांच-पांच पावर हाउस का बोझ डाल दिया गया है। हर पावर हाउस में कई फीडर, सैकड़ों ट्रांसफार्मर और हजारों उपभोक्ता — ऐसे में एक व्यक्ति आखिर कितनी जगह भागे?
स्थिति तब और भयावह हो जाती है जब आंधी-पानी या ओवरलोड के दौरान एक साथ कई फीडर ब्रेकडाउन पर चले जाते हैं।
एक तरफ जनता का दबाव, दूसरी तरफ संसाधनों की भारी कमी और ऊपर से विभागीय नोटिसों की मार!
संविदा कर्मियों को हटाकर व्यवस्था को किया अपंग?
सबसे बड़ा सवाल उन संविदा कर्मियों को लेकर उठ रहा है जिन्हें भारी संख्या में बाहर कर दिया गया।
यही कर्मचारी वर्षों से फील्ड की नस-नस पहचानते थे — किस ट्रांसफार्मर की सप्लाई कहां से है, कौन सा फीडर किस लाइन से जुड़ा है, किस इलाके में क्या तकनीकी समस्या आती है।
अब हालत यह है कि कई जगह JE को यह पता करने में ही आधा-आधा घंटा लग जाता है कि खराब ट्रांसफार्मर की सप्लाई आखिर किस लाइन से आ रही है!
जो संविदा कर्मी बचे हैं, उनमें भी बड़े पैमाने पर आरोप लग रहे हैं कि कुछ लोग अधिकारियों के “चहेते” बनकर फर्जी सर्वे, अवैध बिजली संचालन और दलाली जैसे खेलों में लगे हैं।
इसके बावजूद जो 30% ईमानदार संविदा कर्मी दिन-रात पोल पर चढ़कर जनता को बिजली देने में लगे हैं, असल में आज की व्यवस्था उन्हीं के भरोसे सांस ले रही है।
“मैदान में इंजीनियर, एसी में नोटिस!”
भीषण गर्मी में जहां अधिशासी अभियंता, SDO और JE रात-दिन फील्ड में दौड़ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ “नियम-10” के नोटिसों की बौछार ने अधिकारियों को दुविधा में डाल दिया है।
बड़ा सवाल यही है—
जनता को निर्बाध बिजली दें
या
बैठकर नियम-10 के जवाब लिखें?
क्या मुख्यालय में बैठे अधिकारी यह समझना चाहते हैं कि फील्ड की वास्तविक स्थिति क्या है?
पत्रकारिता सिर्फ आलोचना नहीं, हौसला भी
अक्सर खबरें बनती हैं—
“6 घंटे से बिजली गुल”,
“इलाके में अंधेरा”,
“जनता परेशान”…
लेकिन क्या कभी किसी ने उस JE की स्थिति समझने की कोशिश की जो एक साथ पांच पावर हाउस और दर्जनों ब्रेकडाउन संभाल रहा है?
क्या किसी ने उस लाइनमैन और संविदा कर्मी की पीड़ा देखी जो 11 हजार लाइन पर जान जोखिम में डालकर काम कर रहा है?
गर्मी शुरू होते ही कई संविदा कर्मी शहीद हो चुके हैं, कई गंभीर रूप से घायल हैं।
यदि व्यवस्था नहीं सुधरी तो आने वाले समय में यह आंकड़ा और भयावह हो सकता है।
सवाल उन अधिकारियों से…
जो “वर्टिकल प्रणाली” लागू करने और उसका समर्थन करने में लगे हैं—
- क्या बिना पर्याप्त स्टाफ के व्यवस्था चल सकती है?
- क्या सिर्फ कागजी प्रबंधन से बिजली आपूर्ति सुधर जाएगी?
- क्या फील्ड इंजीनियर मशीन हैं?
- और सबसे बड़ा सवाल—
क्या जनता की बिजली ज्यादा जरूरी है या नोटिसों का जवाब?
आज जरूरत अभियंताओं और ईमानदार फील्ड स्टाफ का मनोबल बढ़ाने की है, न कि उन्हें कागजी कार्रवाई में उलझाकर व्यवस्था को और ध्वस्त करने की।
⚡ क्योंकि सच यही है —
व्यवस्था अभी भी उन्हीं लोगों के कंधों पर टिकी है, जो मैदान में पसीना बहा रहे हैं।
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