सिर्फ एक इंसान की मौत नहीं, हमारी संवेदनहीन व्यवस्था के मुंह पर करारा तमाचा है यह घटना!*
*नीचे दी गई कड़वी हकीकत को पढ़ेंगे, तो रूह कांप उठेगी कि हम कैसे सिस्टम के भरोसे जी रहे हैं...*
*बेंच पर दम तोड़ती इंसानियत
चमकती हुई आलीशान इमारतें, 'बेहतर स्वास्थ्य सेवा' के बड़े-बड़े सरकारी विज्ञापन और आधुनिक सुविधाओं के ऊंचे-ऊंचे दावे—नोएडा के सेक्टर-39 स्थित जिला अस्पताल की भव्यता देखकर कोई भी धोखा खा जाए।
लेकिन 14 मई की उस खौफनाक रात ने यह साबित कर दिया कि इन आलीशान दीवारों के पीछे सिर्फ और सिर्फ संवेदनहीनता का सन्नाटा पसरा है।
32 साल का नीरज कुमार, जिसके सीने में शायद एक बेहिसाब दर्द था, अपनी आखिरी उम्मीद लेकर इस 'तथाकथित' जीवनदायिनी इमारत की दूसरी मंजिल पर पहुँचा था। उसके हाथ में अस्पताल की एक पर्ची थी—वही पर्ची जो सरकारी फाइलों में एक 'मरीज' की एंट्री तो दर्ज कर लेती है, लेकिन एक इंसान की सांसों की गारंटी नहीं दे पाती।
उस पर्ची पर नाम और पता तक दर्ज करने की जहमत किसी ने नहीं उठाई थी। वह सिर्फ एक कागज़ का टुकड़ा नहीं, बल्कि इस खोखले सिस्टम का एक और दस्तावेज़ था।
नीरज डॉक्टरों का इंतज़ार करता रहा।
मिनट, घंटों में बदलते रहे।
वह उसी दूसरी मंजिल की सूनी बेंच पर बैठा रहा, इस आस में कि कोई सफेद कोट पहने फरिश्ता आएगा, उसकी नब्ज़ टटोलेगा और उसे इस असहज कर देने वाले दर्द से निजात दिलाएगा।
लेकिन उस रात उस अस्पताल में डॉक्टर तो दूर, इंसानियत भी ड्यूटी से नदारद थी।
दवा और इलाज की उम्मीद में पथराई आँखों के साथ, नीरज की ज़िंदगी की डोर उसी ठंडी लोहे की बेंच पर टूट गई।
वह सो गया... हमेशा के लिए।
शर्मनाक बात यह नहीं है कि एक बीमारी ने उसकी जान ले ली। शर्मनाक और झकझोर देने वाली हकीकत यह है कि डॉक्टरों, नर्सों, वार्ड ब्वॉयज और सुरक्षाकर्मियों से पटे पड़े इस अस्पताल में घंटों तक एक लाश वीराने में पड़ी रही और किसी को भनक तक नहीं लगी।
जिस जगह पर हर पल ज़िंदगी बचाने का पहरा होना चाहिए था, वहाँ मौत घंटों तक आराम से तमाशा देखती रही।
रात के सन्नाटे में जब एक गार्ड की नज़र उस बेजान शरीर पर पड़ी, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
तब तक सिस्टम की लापरवाही नीरज को लील चुकी थी। अस्पताल प्रबंधन के पास अब जांच के खोखले आश्वासन और कागज़ी औपचारिकताएं बची हैं।
**सवाल सीधा है:*
* अगर करोड़ों की लागत से बनी इन भव्य इमारतों में एक आम इंसान इलाज के इंतज़ार में बेंच पर बैठे-बैठे दम तोड़ दे, तो इन आधुनिक सुविधाओं के झूठे दावों का जनाज़ा क्यों न निकाला जाए?
हाथ में पर्ची लिए तड़पते हुए मर जाना क्या यह नहीं दिखाता कि हमारा सिस्टम अंदर से कितना बीमार और लाचार हो चुका है?
यह एक नीरज की मौत नहीं है, यह हर उस आम नागरिक के भरोसे की हत्या है जो टैक्स भरता है और बदले में सिर्फ एक ठंडी बेंच पर लावारिस मौत पाता है।
#Noida #NoidaNews #HealthSystemFailure #GautamBuddhaNagar #SystemParTamacha #HumanityDied #JusticeForNeeraj