क्या आपका जीवन बदल रहा है?
अक्सर हम गुरु के पास जाते हैं, उनकी बातें सुनते हैं और उन्हें अपनी डायरी में लिख लेते हैं। लेकिन विचार कीजिए, क्या वह ज्ञान आपके आचरण में उतरा?
गुरु केवल सूचना (Information) देने वाला शिक्षक नहीं है। गुरु वह 'अग्नि' है जो शिष्य के पुराने और व्यर्थ संस्कारों को जलाकर उसे एक नया जन्म देती है। यदि गुरु का सान्निध्य पाकर भी हमारे क्रोध, लोभ और अहंकार में रत्ती भर भी कमी नहीं आई, तो हमने गुरु को केवल सुना है, उन्हें जिया नहीं है।
'यत्सत्येन जगत्सत्यं यत्प्रकाशेन भाति तत्' — अर्थात् जिनके होने से सत्य का बोध होता है। गुरु का अर्थ ही है वह रूपांतरण, जो आपको 'आप' से मुक्त करके 'परमात्मा' की ओर ले जाए। ज्ञान बोझ न बने, बल्कि वह आपके भीतर का प्रकाश बन जाए, यही गुरु-शिष्य परंपरा का वास्तविक उद्देश्य है।
आज स्वयं से पूछें: क्या मैं बदल रहा हूँ?
— जगद्गगुरु स्वामी सतीशाचार्य जी महाराज
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