नेहरू जी का दौर और आज का भारत — दोनों की तुलना करना ही सबसे बड़ा भ्रम है।
1950-60 के दशक में भारत एक नवस्वतंत्र, गरीब, युद्धग्रस्त और औद्योगिक रूप से कमजोर देश था। विदेशी मुद्रा भंडार सीमित था, अर्थव्यवस्था कृषि-निर्भर थी और वैश्विक व्यवस्था भी औपनिवेशिक प्रभाव से निकल रही थी। उस समय अगर प्रधानमंत्री जनता से संयम और त्याग की अपील करते थे, तो उसका ऐतिहासिक संदर्भ था।
लेकिन आज 10 साल की सत्ता, “विश्वगुरु”, “4 ट्रिलियन डॉलर GDP”, “5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था” और “अमृतकाल” के दावों के बाद भी अगर सरकार हर संकट पर जनता से बल्ब बंद करने, खर्च घटाने और त्याग की अपील करे, तो सवाल उठेंगे ही।
इतने वर्षों बाद भी अगर हर आर्थिक दबाव का जवाब “वैश्विक परिस्थितियाँ” और “जनता जिम्मेदारी निभाए” है, तो फिर इतने बड़े-बड़े दावों का अर्थ क्या था?
नेहरू का “भूत” इसलिए याद आता है क्योंकि हर असफलता के बाद भाजपा को आखिरकार उसी दौर में लौटना पड़ता है, जिसे वह रोज कोसती है
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अगर जनता से जिम्मेदारी निभाने की अपील करना “नाकामी” है, तो फिर आपके प्रिय नेहरू जी भी क्या “Compromised PM” थे?
खुद नेहरू जी ने कहा था कि जब दूसरे देशों में युद्ध होता है तो उसका असर भारत में महंगाई के रूप में पड़ता है। क्या तब भी यह “बहाना” था, या तब यह जिम्मेदार नेतृत्व माना जाता था?
सच यह है कि हर वैश्विक संकट का असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। फर्क सिर्फ इतना होता है कि एक जिम्मेदार नेतृत्व जनता को सच बताकर, साझी भागीदारी से चुनौतियों का सामना करने की अपील करता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने देशवासियों से त्याग नहीं मांगा, बल्कि राष्ट्रहित में जागरूक विकल्प चुनने की अपील की है, जैसे ऊर्जा बचत, स्वदेशी को बढ़ावा, विदेशी मुद्रा संरक्षण और आत्मनिर्भरता को मजबूत करना।
लेकिन कांग्रेस की समस्या यही है, उन्हें राष्ट्रहित में जनभागीदारी हमेशा “उपदेश” लगती है, क्योंकि उनकी राजनीति सिर्फ सत्ता तक सीमित रही, राष्ट्रनिर्माण तक नहीं।