एआई के दौर में ज्ञान का पतन या दिखावे का जुनून?
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) ज्ञान, अनुसंधान, सृजनशीलता और बौद्धिक विकास का एक महत्वपूर्ण माध्यम है, लेकिन दुर्भाग्यवश सोशल मीडिया पर इसका एक बड़ा हिस्सा अज्ञानता और आत्म-प्रचार का मंच बनता जा रहा है।
आज ऐसे लोग भी AI के क्षेत्र में सक्रिय हो गए हैं जिन्हें न भाषा का पर्याप्त ज्ञान है, न वर्तनी की समझ, न लेखन की गुणवत्ता का बोध और न ही यह एहसास कि वे क्या लिख रहे हैं। केवल अपनी तस्वीर लगाकर कुछ पंक्तियाँ जोड़ देना और स्वयं को विचारक, बुद्धिजीवी या मार्गदर्शक समझ लेना एक चिंताजनक प्रवृत्ति बन चुकी है।
स्थिति यह है कि कई लोगों को यह भी ज्ञात नहीं होता कि पोस्टर पर शीर्षक कहाँ है, मुख्य पाठ कहाँ है, कौन-सा शब्द किस स्थान पर दिखाई दे रहा है, पृष्ठभूमि क्या संदेश दे रही है और संपूर्ण प्रस्तुति का स्तर क्या है। महंगे मोबाइल फोन, कुछ एप्लिकेशन और आकर्षक प्रभाव ज्ञान, अध्ययन और बौद्धिक क्षमता का विकल्प नहीं हो सकते।
AI ने ज्ञान तक पहुँच को सरल बनाया है, किंतु ज्ञान अर्जित करने की प्रक्रिया को नहीं। ज्ञान के लिए अध्ययन, प्रशिक्षण, समझ, भाषा पर पकड़ और विद्वानों का मार्गदर्शन आवश्यक है। जो लोग बिना किसी बौद्धिक आधार के केवल आत्म-प्रचार, लोकप्रियता और त्वरित प्रसिद्धि के लिए इस तकनीक का उपयोग कर रहे हैं, वे न केवल अपनी सीमित समझ का परिचय दे रहे हैं बल्कि नई पीढ़ी को भी सतही सोच, नकल और बौद्धिक शून्यता की ओर धकेल रहे हैं।
राष्ट्र तब आगे बढ़ते हैं जब उनके युवा अध्ययन, अनुसंधान, चरित्र निर्माण और रचनात्मक चिंतन को अपनाते हैं। किंतु जब प्रत्येक व्यक्ति केवल अपनी छवि, प्रशंसा और प्रचार में व्यस्त हो जाए, तब समाज ज्ञान से नहीं बल्कि शोर से भर जाता है।
AI का उपयोग करने से पहले भाषा सीखिए, लेखन की समझ विकसित कीजिए, योग्य लोगों से मार्गदर्शन प्राप्त कीजिए और यह समझिए कि शब्दों की भी एक जिम्मेदारी होती है। अन्यथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस युग में भी मनुष्य अपनी वास्तविक अज्ञानता का प्रदर्शन करता रहेगा।
वासिली अमेठवी भारती
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