उदारवादियों के लिए आज दो उदाहरण सबके सामने हैं,
1. वसंत मोरे
2. जितेंद्र आव्हाड
जब राज ठाकरे जी ने मस्जिदों पर लगे लाउडस्पीकरों के विरोध में आंदोलन किया, तब वसंत मोरे ने उसका खुलकर विरोध किया। उनका बयान था—
“मेरे मतदारसंघ में मुस्लिम भाई हैं, इसलिए मैं उनकी मस्जिदों के सामने आंदोलन नहीं कर सकता।”
इन्हीं मतों को खुश करने के लिए उन्होंने मनसे जैसी पार्टी तक छोड़ दी। यह भी सच है कि वसंत मोरे ने अपने क्षेत्र में काफी विकास कार्य किए, लोगों की मदद की और मुस्लिम समाज भी मानता है कि वे हर मुश्किल में साथ खड़े रहते थे। उन्हें इन मतदाताओं पर पूरा भरोसा था।
लेकिन आज जब सामने MIM जैसा विकल्प आया, तो उसी समाज ने वसंत मोरे द्वारा किए गए सभी काम भुला दिए। परिणाम यह हुआ कि वसंत मोरे न सिर्फ स्वयं हारे, बल्कि उनका परिवार भी पराजित हुआ।
अब बात करें जितेंद्र आव्हाड की.!
मुंब्रा का पूरा इलाका अनधिकृत रूप से बसाने का काम किसने किया, यह किसी से छुपा नहीं है। जब गुजरात ATS ने इशरत जहाँ जैसी आतंकी को मार गिराया, तब ऐसा शोक मनाया गया जैसे कोई सगी बेटी चली गई हो।
तुष्टिकरण की राजनीति के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज के पवित्र इतिहास को तक विकृत किया गया।
और आज.?
उसी मुंब्रा क्षेत्र में, जिन लोगों को आव्हाड ने संरक्षण दिया, उन्हीं मतदाताओं ने उन्हें नकार दिया और MIM के सभी उम्मीदवारों को जिताकर आव्हाड को करारा संदेश दे दिया।
इसलिए—
“बटेंगे तो कटेंगे”
यह सिर्फ एक नारा नहीं है,
यह एक कटु लेकिन भयावह सच्चाई है।
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