अगर आपको लगता है कि इस देश के लिए सबसे बड़ा खतरा 'न्यूक्लियर बम' है, तो शायद आपने चंदे की राजनीति को करीब से नहीं देखा है।
एक कंपनी पर रेड पड़ती है, फिर करोड़ों के इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदे जाते हैं। इसके बाद बड़े-बड़े सरकारी प्रोजेक्ट मिलते हैं। जब इन रिकॉर्ड्स पर सवाल उठाए जाते हैं, तो भी (कंपनियों को) इनाम मिलता रहता है।
सवाल सिर्फ एक कंपनी का नहीं है, बल्कि उस सिस्टम का है जहाँ 'चंदा' और 'धंधा' अक्सर एक ही रास्ते पर चलते दिखाई देते हैं।
अगर जनता की जान से ज्यादा कीमत चंदे की रसीद की है, तो फिर लोकतंत्र और ठेकेदारी में फर्क क्या रह गया?
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क्या आपको लगता है कि राजनीतिक चंदे और सरकारी ठेकों के बीच अधिक पारदर्शिता होनी चाहिए?
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@sun_na_tushar
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