माननीय मेरे भाई रविश जी,
एक अत्यंत करीबी रिश्तेदार होने के नाते आपसे बस इतनी गुज़ारिश है कि इतना उदारवादी बनने से पहले अपने परिवार, अपने समाज और उस सामाजिक पृष्ठभूमि को भी ध्यान में रखिए, जहां रिश्ते सिर्फ “personal choice” नहीं होते, बल्कि बच्चों, परिवारों और पूरे सामाजिक ताने-बाने से जुड़े होते हैं।
जब आप सार्वजनिक मंच से यह कहते हैं कि “उसने किसी और को चुन लिया तो क्या हुआ, आगे बढ़ो”, तब आप सिर्फ एक व्यक्ति को सलाह नहीं दे रहे होते — आप समाज को एक संदेश दे रहे होते हैं।
और दुर्भाग्य से ये संदेश आज रिश्तों की जिम्मेदारी, विवाह की गरिमा और परिवार की संवेदनशीलता को कमजोर करने वाला लगता है।
अगर बिना तलाक कोई पत्नी किसी और के साथ रहने लगे, बच्चे को छोड़ दे, पति को मानसिक और सामाजिक रूप से तोड़ दे — और तब भी पुरुष से कहा जाए कि “move on”, तो यह संवेदनशीलता नहीं, बल्कि उसके दर्द का मज़ाक बन जाता है।
क्योंकि सच यही है कि अगर यही सब कोई पुरुष करे तो वही समाज, वही मीडिया और वही कानून उसे खलनायक घोषित करने में एक मिनट नहीं लगाएंगे।
तब घरेलू हिंसा, मेंटेनेंस, मुकदमे, चरित्रहनन और पूरे परिवार की सामाजिक प्रताड़ना शुरू हो जाएगी।
तब कोई यह नहीं कहेगा कि “उसने अपना विकल्प चुन लिया है।”
और यही दोहरा मापदंड लोगों को चुभता है।
फेमिनिज़्म अगर बराबरी की बात करता है तो बराबरी संवेदनाओं में भी दिखनी चाहिए।
पुरुष अगर गलत है तो उसे कठघरे में खड़ा कीजिए, लेकिन अगर महिला गलत है तो उसे सिर्फ “modern choice” बताकर महिमामंडित मत कीजिए।
आप जैसे वरिष्ठ पत्रकार से उम्मीद रहती है कि आप हर पीड़ित की आवाज बनेंगे — चाहे वह महिला हो या पुरुष।
लेकिन आज आपकी बातें सुनकर लगता है कि पुरुष का दर्द अब समाज में मज़ाक का विषय बना दिया गया है।
इससे ज़्यादा आज नहीं कहूँगा आपको कुछ।
क्योंकि बात निकलेगी ना… तो बहुत दूर तलक जाएगी।
भगवान आपको सद्बुद्धि दें, ताकि आप दर्द को जेंडर नहीं, इंसानियत के नजरिये से देख सकें।
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ये भी कांड है? एक स्त्री ने अपना दूसरा विकल्प चुन लिया तो इतना हंगामा। रिश्ते टूटते हैं। उनके बीच सौ कारण हो सकते हैं। पति को छोड़ा जैसे वाक्यों से स्त्री को ही संदिग्ध बना रहे हैं। जैसे उसका दूसरा विकल्प चुनना कोई अपराध हो। किसी रिश्ते का टूटना दुखद ख़बर है लेकिन इस तरह की हेडलाइन से लगता है कि पति को छोड़ना कोई अपराध है। पति को भी स्वीकार कर आगे बढ़ जाना चाहिए। चली गई तो चली गई। आप भी चले जाइये। ज़मीन बेचा, मकान बेचा ये सब मत कीजिए। जब रिश्ते अच्छे थे तो पति ने किया। अब उसे अहसान की तरह गिनवा रहे हैं। अहसान कोई बैंक का निवेश नहीं है कि रिर्टन फिक्स होगा। अफसर बनने और बनाने की सनक का इलाज खोजिए। घूस और किसी को फर्ज़ी फंसाने का सुख न हो तो सरकार दरवाज़ा खोल कर बैठी रह जाएगी कोई अफसर बनने नहीं जाएगा। सामंती सुख के लिए ज़मीन बेच रहे थे। सामंती सुख को डबल करने के लिए किसी ने नया रिश्ता चुन लिया। CBSE जैसा कांड हो गया उससे तो फर्क ही नहीं पड़ रहा इस देश को।