जानिए क्या है क्लाउड सीडिंग जो बारिश कराती है और उससे जुड़े दिलचस्प पहलू
क्लाउड सीडिंग एक वैज्ञानिक तकनीक है जिसके माध्यम से कृत्रिम रूप से वर्षा (बारिश या बर्फबारी) कराई जाती है।
इसमें विमान या रॉकेट के माध्यम से सिल्वर आयोडाइड, सोडियम क्लोराइड, पोटेशियम आयोडाइड या ड्राई आइस जैसे पदार्थ बादलों में छोड़े जाते हैं।
ये पदार्थ संघनन केंद्र (Condensation Nuclei) बनाते हैं जिन पर जलवाष्प संघनित होकर वर्षा बूंदों में परिवर्तित होती है और जब बूंदें भारी हो जाती हैं, तो वे वर्षा के रूप में गिरती हैं।
फायदे:
सूखे से राहत: जिन क्षेत्रों में वर्षा कम होती है, वहाँ कृत्रिम रूप से बारिश कराई जा सकती है।
कृषि को सहायता: फसलों को आवश्यक नमी प्राप्त होती है।
जल स्रोतों की पूर्ति: झीलों, बाँधों और नदियों का जलस्तर बढ़ाया जा सकता है।
वायु प्रदूषण में कमी: वर्षा से वातावरण के प्रदूषक कण नीचे बैठ जाते हैं।
नुकसान:
सीमित सफलता: यह तकनीक तभी कारगर होती है जब बादलों में पर्याप्त नमी हो।
पर्यावरणीय हानि: सिल्वर आयोडाइड जैसे रसायन दीर्घकाल में मिट्टी और जल के लिए हानिकारक हो सकते हैं।
उच्च लागत: विमानों, उपकरणों और रसायनों की वजह से यह अत्यंत महँगी प्रक्रिया है।
क्षेत्रीय असमानता: एक स्थान पर वर्षा कराने से आसपास के क्षेत्रों में बादल कम हो सकते हैं।
अस्थायी प्रभाव: यह केवल तात्कालिक राहत देता है, स्थायी समाधान नहीं।
दिल्ली, नोएडा और ग्रेटर नोएडा में कल यानि 28 अक्टूबर 2025को क्लाउड सीडिंग का प्रयोग
यह IIT कानपुर की वैज्ञानिक टीम ने दिल्ली-एनसीआर (दिल्ली, नोएडा और ग्रेटर नोएडा) क्षेत्र में क्लाउड सीडिंग का पहला बड़ा प्रयोग था।
इसका उद्देश्य था—भारी प्रदूषण से राहत दिलाने के लिए कृत्रिम वर्षा कराना, ताकि हवा में मौजूद धूल और प्रदूषक कण नीचे बैठ जाएँ।
टीम ने विमान के माध्यम से सिल्वर आयोडाइड और नमक के फ्लेयर्स छोड़े।
यह प्रयोग दिल्ली, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, बुराड़ी, करोल बाग और मयूर विहार जैसे क्षेत्रों के ऊपर किया गया।
कुछ इलाकों में वायु गुणवत्ता (PM2.5 और PM10) में थोड़ी गिरावट दर्ज की गई, लेकिन वास्तविक वर्षा नहीं हुई, क्योंकि उस समय बादलों में नमी पर्याप्त नहीं थी (लगभग 20% जबकि 50% या अधिक आवश्यक होती है)।
IIT कानपुर के निदेशक मनीन्द्र अग्रवाल ने कहा कि यह एक “SOS उपाय” (आपातकालीन राहत) था, स्थायी समाधान नहीं।
सरकार ने इसे प्रायोगिक सफलता बताया और आने वाले महीनों में मौसम अनुकूल होने पर दोबारा प्रयास करने की बात कही।
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अंत में
क्लाउड सीडिंग एक आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक है जो सूखा और प्रदूषण जैसी समस्याओं से अस्थायी राहत दे सकती है।
दिल्ली, नोएडा और ग्रेटर नोएडा में इसका प्रयोग प्रदूषण घटाने के उद्देश्य से किया गया, परंतु सीमित सफलता मिली।
इसलिए इसे केवल पूरक उपाय माना जा सकता है।
दीर्घकालीन समाधान के लिए स्वच्छ ऊर्जा, हरित परिवहन और प्रदूषण नियंत्रण नीतियों को सख्ती से लागू करना आवश्यक है।