ऐसे तो मनीष का लिखा हुआ कोई व्यंग्य नहीं है। फिर भी यदि इसे व्यंग्य मान लें, मैंने इसे नहीं समझा! इस असमर्थता की स्वीकृति हो भी जाये तो एक प्रतिष्ठित प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल जी
@puru_ag की यह हँसी मुझे बहुत घटिया लगी है। संघ लोक सेवा आयोग का सदस्य रहा व्यक्ति और अपने ही शिष्य सौरभ द्विवेदी से
#doesGodExist डिबेट में डांट सुनकर चुप बैठ जाने के लिए विवश एक निरीह मानुष की यह हँसी निर्लज्जता अधिक है, हास्य अथवा विनोद कम क्योंकि यह हँसी एक गालीबाज, अधकचरे और अशिष्ट व्यक्ति के गाली भरी टिप्पणी पर है। आपका एक लेख हम अपने विद्यार्थियों को कोट करते हैं - मजबूती का नाम महात्मा गांधी जैसे शीर्षक से है। आप जैसा सिद्ध व्यक्ति, गांधी और कबीर का अनन्य प्रेमी गालीबाजों का प्रोत्साहन करता है! उन्हें बल देता है। आप प्रोफेसर रहे हैं। आपसे न्यूनतम नैतिकता की अपेक्षा रहती है हमेशा।
मैं इस बात को सदैव याद रखूंगा कि एक ट्रोल की मदद करने के लिए प्रो पुरुषोत्तम अग्रवाल ने गालीबाज के पक्ष में खड़ा होना चुना। एक जोकर और पप्पू की पक्षधरता के लिए यह अन्याय किया।
व्यंग्य समझ पाने की असामर्थ्य पर मुस्कान ऐसा अपराध भी नहीं, बस। सादर 😀🙏