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Carbon Copy: A broken star player tries to rebuild his life. He created clones as slaves but became their apprentice. To be human, he had to survive his own hell. Brutal drama at the intersection of sports & biopunk. Who's interested? #TVScript #PilotScript #Screenwriting
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Amazing news! The Ghost's Father and The Mystery of Su Min episode 16 was just selected by Alpine International Film Festival -Best TV or Streaming Series- #tvscript,#dramas#Alpine film festival
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And with the way things are going in the Film/TV industry I don’t think ima see my scripts come to life. But I’m still manifesting & praying that they will come to reality #BlackWriter #screenwriter #moviescript #tvscript #tvpilot #writerscommunity #writer
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Review: Candace Owens. -Miramax & Disney -I'm sorry I interrupted your fabricated reality TVscript -Carry on w/ Candace's acting role -I didn't mean to kick her off social media this week -She can come back and pretend -We'll go along with the lies now -I fixed the script for you
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I want to thank the Humro Cinema for choosing " The Mystery of Su-min" as a finalist in the Best Unproduced Script Category. #kdrama #script #TVscript
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टेलीविजन की भाषा- एक जरूरी किताब। - हरीश चंद्र बर्णवाल ( @hcburnwal ) हरीश चंद्र बर्णवाल की किताब 'टेलीविजन की भाषा' टीवी पत्रकारिता के उस अनकहे कोड को उजागर करती है, जहाँ शब्द न सिर्फ खबर बुनते हैं, बल्कि उसे जीवंत करते हैं। एक वरिष्ठ पत्रकार के रूप में बर्णवाल का अनुभव इस किताब को मात्र सैद्धांतिक ग्रंथ से ऊपर उठाकर एक व्यावहारिक मार्गदर्शक बनाता है। यह किताब उन युवाओं के लिए अनमोल है जो न्यूज रूम की तेज रफ्तार में कदम रखना चाहते हैं, और उन पेशेवरों के लिए भी जो अपनी स्क्रिप्टिंग को और निखारना चाहते हैं। किताब की संरचना सरल लेकिन गहन है। पहले खंड में हिंदी समाचार चैनलों के विकास की यात्रा का वर्णन है – दूरदर्शन के आधे घंटे के बुलेटिन से लेकर आज के 24x7 चैनलों तक का सफर। लेखक बताते हैं कि कैसे सरकारी प्रसारण से निजी चैनलों की बाढ़ ने भाषा को अधिक संक्षिप्त, प्रभावी और कभी-कभी सनसनीखेज बना दिया। यह हिस्सा न सिर्फ इतिहास बयान करता है, बल्कि टीवी की भाषा के सांस्कृतिक परिवर्तन को भी रेखांकित करता है। दूसरा चरण सबसे दिलचस्प है: लॉगिंग, स्क्रिप्टिंग और एंकरिंग की बारीकियाँ। बर्णवाल 'शब्दों का खेल' कहते हैं – जैसे 'अफरा-तफरी', 'धर दबोचा', 'अंधाधुंध' या 'भाई-भतीजावाद' जैसे शब्दों का चयन, जो विजुअल्स के साथ मिलकर बिम्ब खड़ा कर देते हैं। ये शब्द व्याकरण की किताबों में प्रतिबंधित नहीं, बल्कि पत्रकारों के अनुभव से जन्मे हैं। वे गूंज पैदा करते हैं, दर्शक को बांधते हैं। किताब में ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं, जो बताते हैं कि घटिया विजुअल्स को भी कसी हुई भाषा से रोचक कैसे बनाया जा सकता है, और लूज़ भाषा कैसे अच्छी खबर को बेदम कर देती है। तीसरा और चौथा खंड रिपोर्टिंग, इंटरव्यू और नैतिक मुद्दों पर केंद्रित हैं। यहाँ बर्णवाल टीवी की भाषा को 'सहजता और सौंदर्य' का माध्यम बताते हैं – जहाँ अतिशयोक्ति से बचना जरूरी है, लेकिन प्रभाव के लिए सटीकता अनिवार्य। उदाहरणस्वरूप, वे बताते हैं कि कैसे एक साधारण घटना को 'ट्रेजडी' या 'ड्रामा' के बजाय 'संवेदनशील मोड़' कहकर गहराई दी जा सकती है। अंतिम खंड में मीडिया की जिम्मेदारियों पर चिंतन है, जो किताब को मात्र तकनीकी गाइड से ऊपर उठा देता है। किताब की ताकत उसकी व्यावहारिकता में है। यह कोई सूखा सिद्धांत नहीं, बल्कि न्यूज रूम की जंग से निकली सीखें हैं। 2011 में भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार से सम्मानित होने के बाद यह किताब और प्रासंगिक हो गई। हालांकि, एक कमी यह लगती है कि डिजिटल मीडिया के उदय (जैसे सोशल मीडिया) पर कम चर्चा है, जो 2025 के दौर में थोड़ा पुराना महसूस करा सकती है। फिर भी, मूल सिद्धांत आज भी प्रासंगिक हैं। कुल मिलाकर, टेलीविजन की भाषा मीडिया छात्रों, पत्रकारों और भाषा प्रेमियों के लिए एक आवश्यक पढ़ाई है। यह सिखाती है कि टीवी पर शब्द सिर्फ बोले नहीं जाते, वे देखे जाते हैं। चार में से चार सितारे – क्योंकि यह किताब न सिर्फ पढ़ाई जाती है, बल्कि लागू की जाती है। हरीश चंद्र बर्णवाल की टेलीविजन की भाषा में दिए गए उदाहरण टेलीविजन पत्रकारिता की भाषा को प्रभावी बनाने की कला को व्यावहारिक रूप से समझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये उदाहरण न्यूज रूम की गतिशीलता, दर्शकों की मनोविज्ञान और भाषा के चयन की बारीकियों को रेखांकित करते हैं। शब्दों का चयन और विजुअल्स का समन्वय: बर्णवाल एक उदाहरण देते हैं जिसमें एक सड़क हादसे की खबर को स्क्रिप्ट करने का तरीका बताया गया है। मान लीजिए, विजुअल्स में एक दुर्घटनाग्रस्त कार और घायल लोग दिख रहे हैं। सामान्य स्क्रिप्ट हो सकती है: "आज एक कार दुर्घटना में कई लोग घायल हो गए।" लेकिन बर्णवाल सुझाते हैं कि इसे और प्रभावी बनाया जा सकता है: "तेज रफ्तार ने फिर छीनी सांसें – इस भीषण कार हादसे में कई लोग बुरी तरह जख्मी।" यहाँ "तेज रफ्तार", "छीनी सांसें" और "भीषण" जैसे शब्द न केवल घटना की गंभीरता को उभारते हैं, बल्कि दर्शकों को विजुअल्स के साथ भावनात्मक रूप से जोड़ते हैं। लेखक जोर देते हैं कि शब्द ऐसे हों जो दृश्यों को पूरक बनाएं, न कि उनकी नकल करें। संक्षिप्तता और प्रभाव: किताब में एक और उदाहरण है जिसमें एक बाढ़ की खबर को स्क्रिप्ट करने की बात की गई है। सामान्य वाक्य जैसे "बाढ़ ने कई गाँवों को प्रभावित किया" को बर्णवाल बदलकर लिखते हैं: "बाढ़ का कहर – दर्जनों गाँव जलमग्न, हजारों बेघर।" यहाँ "कहर", "जलमग्न" और "बेघर" जैसे शब्द खबर को तात्कालिकता और तीव्रता देते हैं। लेखक बताते हैं कि टीवी पर दर्शक का ध्यान कुछ सेकंड का होता है, इसलिए शब्दों को ऐसा चुनना चाहिए जो तुरंत असर डालें। इस उदाहरण से यह भी समझ आता है कि कैसे सीमित शब्दों में ज्यादा से ज्यादा कहानी कही जा सकती है। सनसनीखेज भाषा से बचाव: बर्णवाल एक दिलचस्प उदाहरण देते हैं जहाँ एक चोरी की घटना को चैनल सनसनीखेज बना सकते हैं: "सनसनीखेज डकैती, शहर में दहशत!" लेकिन वे सुझाते हैं कि ऐसी भाषा से बचना चाहिए, क्योंकि यह विश्वसनीयता को कम करती है। इसके बजाय, वे लिखते हैं: "चोरों ने फिर बोला धावा, मोहल्ले में सन्नाटा।" यह वाक्य न केवल घटना को जीवंत करता है, बल्कि अनावश्यक अतिशयोक्ति से भी बचता है। यह उदाहरण पत्रकारों को नैतिकता और संयम की सीख देता है। एंकरिंग और डिलीवरी: किताब में एक न्यूज एंकर के डिलीवरी स्टाइल का उदाहरण है, जहाँ एक राजनीतिक घोटाले की खबर को पेश करने का तरीका बताया गया है। सामान्य प्रस्तुति हो सकती है: "नेता पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं।" लेकिन बर्णवाल सुझाते हैं कि एंकर इसे इस तरह पेश करे: "एक और घोटाला उजागर – क्या इस बार भी बच निकलेंगे ये नेता?" यहाँ प्रश्नात्मक शैली दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती है और खबर को तुरंत आकर्षक बनाती है। लेखक बताते हैं कि एंकर की आवाज में उतार-चढ़ाव और शब्दों का चयन मिलकर खबर को जीवंत करते हैं। सांस्कृतिक संदर्भ और स्थानीयता: एक और उल्लेखनीय उदाहरण में बर्णवाल बताते हैं कि कैसे स्थानीय भाषा और मुहावरों का उपयोग खबर को दर्शकों से जोड़ता है। जैसे, एक ग्रामीण क्षेत्र में सूखे की खबर को स्क्रिप्ट करते समय वे लिखते हैं: "सूखे की मार, खेतों में दरार – किसान की आस टूटी।" यहाँ "मार", "दरार" और "आस टूटी" जैसे शब्द ग्रामीण भारत की भाषा से लिए गए हैं, जो दर्शकों के लिए परिचित और प्रभावशाली हैं। यह उदाहरण बताता है कि टीवी की भाषा को सांस्कृतिक रूप से प्रासंगिक होना चाहिए। नैतिकता का उदाहरण: किताब में एक गंभीर उदाहरण है जहाँ एक संवेदनशील घटना (जैसे बलात्कार की खबर) को स्क्रिप्ट करने की बात की गई है। बर्णवाल बताते हैं कि ऐसी खबरों में "जघन्य", "हैवानियत" जैसे शब्दों का इस्तेमाल दर्शकों को विचलित कर सकता है और पीड़ित की गरिमा को ठेस पहुँचाता है। इसके बजाय, वे सुझाते हैं: "एक और दुखद घटना ने समाज को झकझोरा।" यह उदाहरण पत्रकारों को संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के साथ भाषा चुनने की सलाह देता है। मूल्यांकन: ये उदाहरण किताब की ताकत को दर्शाते हैं – ये न केवल सैद्धांतिक हैं, बल्कि न्यूज रूम की वास्तविक चुनौतियों से उपजे हैं। बर्णवाल का जोर इस बात पर है कि भाषा सिर्फ शब्दों का समूह नहीं, बल्कि एक कहानी कहने का औजार है। हालाँकि, कुछ उदाहरण 2011 के संदर्भ में लिखे गए हैं, और डिजिटल युग में (2025 तक) सोशल मीडिया की भाषा (जैसे हैशटैग या वायरल कंटेंट) को शामिल न करना एक छोटी कमी लगती है। फिर भी, ये उदाहरण आज भी प्रासंगिक हैं, क्योंकि वे भाषा की बुनियादी कला पर केंद्रित हैं।यह किताब पत्रकारिता के छात्रों और पेशेवरों के लिए एक जीवंत गाइड है, जो उदाहरणों के जरिए यह सिखाती है कि कैसे सही शब्द खबर को यादगार बना सकते हैं। #booklovers #TelevisionKiBhahsha #HarishChandraBurnwal #journalism #TVScript
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