वक्त तेज़ है। विचार दौड़ते हैं, सरपट। चाहकर पकड़ना, फंदे में फांसना नामुमकिन सा लगता है।
जब कुछ नहीं होता, तो भी कुछ होता है।
जब मुझे लगता है कि सर्दी के लिए कंबल की ज़रुरत है, तब उसे ओढ़ना ज़रुरी है। खाना-पीना-जीना सब भी ज़रुरी है।
ज़रुरी वह सब है जिसकी ज़रुरत है। (1)