सवाल एक सेकंड का, जवाब पूरे समाज का...
जब कोई कहता है.......
"मैं हिंदू हूँ"
तो अगला सवाल लगभग तुरंत आता है: "अरे, लेकिन आप कौन सी जाति के हो?"
लेकिन...
जब कोई कहता है
"मैं मुसलमान हूँ"
"मैं सिख हूँ"
"मैं ईसाई हूँ"
तो कोई नहीं पूछताः "अरे भाई, शेख हो, सैय्यद हो, जाट सिख हो, मजहबी हो, या फिर दलित ईसाई?"
क्यों?
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर अपनी क्लासिक किताब "Annihilation of Caste" (जाति का विनाश) में इस अंतर को बहुत गहराई से समझाते हैं।
हिंदू समाज में जाति सिर्फ़ एक सामाजिक बंटवारा नहीं है- ये धार्मिक आज्ञा है।शास्त्रों ने इसे पवित्रता दे रखी है। इसलिए जब तक जाति का पता न चले, हिंदू पहचान अधूरी लगती है।
दूसरी तरफ़ मुस्लिम, सिख और ईसाई समाजों में चाहे कितनी भी बिरादरियाँ हों (शेख, पठान, जाट, अरोड़ा, खटीक, रामदासिया आदि), धर्म की एकता सबसे ऊपर है। लोग खुद को पहले मुसलमान/सिख /ईसाई मानते हैं, जाति को बहुत बाद में।
धर्म उनके लिए सामाजिक सीमेंट (social cement) का काम करता है।
हिंदू समाज में ऐसा कोई मजबूत सीमेंट नहीं है। जातियाँ लगभग स्वतंत्र द्वीपों की तरह रहती हैं।
बाबासाहेब लिखते हैं:
हिंदू समाज में जातियों के बीच घनिष्ठता बढ़ाने वाला कोई साझा भाव नहीं है। जबकि गैर-हिंदू समाजों में धर्म उन्हें एक सूत्र में बाँधे रखता है।
यही वजह है कि हिंदू समाज में जाति तोड़ना इतना कठिन है- क्योंकि यहाँ इसे धार्मिक वैधता मिली हुई है।
गैर-हिंदू समाजों में जाति ज्यादातर सामाजिक बुराई के रूप में बची है, धार्मिक आज्ञा नहीं।
निष्कर्ष बहुत साफ़ है:
जाति का असली विनाश तभी होगा, जब हम उसकी जड़ यानी धार्मिक आधार - को समझेंगे और चुनौती देंगे।
जाति का विनाश = सच्चा समाज सुधार।
Baba saheb bhimrao ambedkar 🙏