सरकार जब भी कर्मचारियों की मेहनत की बात करती है, तो सबसे पहले “सम्मान” शब्द का इस्तेमाल करती है — लेकिन वही सरकार वर्षों से पुरानी पेंशन बहाली जैसे मूल अधिकार को नजरअंदाज कर रही है। यह सिर्फ आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि लाखों कर्मचारियों के भविष्य से जुड़ा विश्वासघात है।
कर्मचारी सड़क पर उतर रहे हैं, सम्मेलन कर रहे हैं, ज्ञापन दे रहे हैं — लेकिन सत्ता के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही। लोकतंत्र में जब आवाज़ उठाने पर भी सुनवाई न हो, तो यह व्यवस्था की असंवेदनशीलता का सबसे बड़ा प्रमाण होता है।
नई पेंशन योजना को सुधार कहा गया, लेकिन सच्चाई यह है कि इसने रिटायरमेंट को सुरक्षा से ज्यादा अनिश्चितता में बदल दिया है। जिसने जीवन भर सिस्टम को दिया, वही बुढ़ापे में सिस्टम की बेरुखी झेल रहा है — यह कैसा न्याय है?
सरकार विकास की बड़ी-बड़ी बातें करती है, लेकिन अपने ही कर्मचारियों के भविष्य को सुरक्षित करने से पीछे हटती है। अगर शिक्षक, डॉक्टर, कर्मचारी ही असुरक्षित रहेंगे, तो देश की प्रगति खोखली ही रहेगी।
अब सवाल सिर्फ पेंशन का नहीं, भरोसे का है। अगर आज भी सरकार ने चेतना नहीं दिखाई, तो यह आंदोलन सिर्फ अधिकार की मांग नहीं रहेगा — यह व्यवस्था की संवेदनहीनता के खिलाफ जनआक्रोश बन जाएगा।