also highly contagious is kindness,patience,love, enthusiasm,and a positive attitude Don’t wait to catch it from others Be the carrier

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India enters the big 5 in manufacturing toppling South Korea. At current growth rates, even considering rupee depreciation, India will displace Japan to become the world's third largest manufacturer (> $1 trillion) by 2029. Also, 1960: $3 billion -> 2015: $328 billion 2015: $328 billion -> 2025: $781 billion So India has added as much in manufacturing in the last 10 years as it added in the last 70 years.
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"सन्तोषामृततृप्तानां यत्सुखं शान्तचेतसाम् । कुतस्तद्धनलुब्धानामितश्चेतश्च धावताम् ।।" संतोष ही शान्ति की सच्ची कुँजी है। कृतज्ञ हृदय जीवन को आनन्दमय बनाता है। जो अपने आशीर्वादों का मूल्य जानता है, वही वास्तव में समृद्ध है। संतोष में ही सुख, शान्ति और आत्मिक सम्पन्नता निहित है। आज का मनुष्य बाह्य उपलब्धियों, भौतिक साधनों और निरन्तर बढ़ती आकांक्षाओं के बीच जीवन व्यतीत कर रहा है, किन्तु इसके बावजूद उसके अन्तःकरण में शान्ति का अभाव दिखाई देता है। इसका कारण यह है कि वास्तविक सुख और शान्ति बाहरी वस्तुओं में नहीं, अपितु संतोषपूर्ण मन में निहित हैं। वस्तुतः संतोष ही शान्ति की कुँजी है और कृतज्ञता ही संतोष का आधार है। संतोष का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य पुरुषार्थ का त्याग कर दे अथवा प्रगति की इच्छा छोड़ दे। इसका वास्तविक अर्थ है - ईश्वर द्वारा प्रदत्त जीवन, परिस्थितियों, अवसरों और उपलब्धियों के प्रति कृतज्ञ रहते हुए अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करना। संतोषी व्यक्ति अभावों में भी व्याकुल नहीं होता और उपलब्धियों में अहंकारग्रस्त नहीं होता। उसका जीवन समत्व, संयम और प्रसन्नता से परिपूर्ण होता है। कृतज्ञता मनुष्य के जीवन को दिव्यता से जोड़ती है। जब हम अपने जीवन में प्राप्त प्रत्येक अनुग्रह को ईश्वर की कृपा के रूप में स्वीकार करते हैं, तब हृदय में विनम्रता, प्रसन्नता और आत्मिक सम्पन्नता का उदय होता है। जो व्यक्ति अपने जीवन के छोटे-से-छोटे सुख और अवसर के प्रति भी धन्यवाद का भाव रखता है, वह कभी दरिद्र नहीं होता; क्योंकि उसका हृदय सदैव समृद्ध रहता है। असंतोष मन में तुलना, स्पर्धा, चिन्ता और अशान्ति को जन्म देता है, जबकि संतोष मन को स्थिरता, धैर्य और आन्तरिक आनन्द प्रदान करता है। जो व्यक्ति अपने जीवन की उपलब्धियों, सम्बन्धों और ईश्वरप्रदत्त कृपाओं का सम्मान करना सीख लेता है, वह बाहरी परिस्थितियों से परे जाकर भी सुखी रह सकता है। आइए ! हम अपने जीवन में कृतज्ञता का दीप प्रज्वलित करें, संतोष का भाव विकसित करें और अपने प्राप्त आशीर्वादों का सम्मान करें। स्मरण रहे- धन, वैभव और सफलता जीवन को सुविधाएँ दे सकते हैं, किन्तु संतोष ही वह अमूल्य निधि है, जो मनुष्य को वास्तविक शान्ति, प्रसन्नता और आत्मिक समृद्धि प्रदान करती है। संतोषी हृदय ही सबसे धनी हृदय है; कृतज्ञ जीवन ही सबसे सुखी जीवन है, और शान्त मन ही मनुष्य की सबसे बड़ी सम्पत्ति है। #AvdheshanandG_Quotes #motivation
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Surya Namskar A V/s B Flow Guide #FitBharat #HealthTips
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।। "श्वेताश्वतर" उपनिषद् ।। युक्तेन मनसा वयं देवस्य सवितुः सवे । सुवर्गेयाय शक्त्या ।।२।। ("श्वेताश्वतर" उपनिषद् - द्वितीयोऽध्यायः) यह मन्त्र साधना के उस अत्यन्त सूक्ष्म और गूढ़ आयाम का उद्घाटन करता है, जहाँ साधक का मन, बुद्धि और सम्पूर्ण अन्तःकरण एक दिव्य प्रेरणा के अधीन होकर परम तत्त्व की ओर उन्मुख होता है। श्वेताश्वतर उपनिषद् का यह वाक्य, भगवद्पादाचार्य भाष्यकार भगवान आदि शंकराचार्य के भाष्य-भाव में, केवल एक वैदिक प्रार्थना नहीं, बल्कि ब्रह्मविद्या की साधना का सुसूत्रित दार्शनिक विधान है। “युक्तेन मनसा वयम्” चित्त की समाहित अवस्था ! इस मन्त्र का प्रारम्भ “युक्तेन मनसा” से होता है। “युक्त” शब्द यहाँ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। शाङ्करवेदान्त में “युक्तता” का अर्थ केवल बाह्य एकाग्रता नहीं, बल्कि अन्तःकरण की पूर्ण समाहित, संयत और विषयवासनाओं से निवृत्त अवस्था है। ऐसा मन न तो विषयों में बिखरता है, न स्मृति-कल्पनाओं के जाल में उलझता है; वह आत्मतत्त्व की ओर प्रवृत्त होता है। यह भाव श्रीमद्भगवद्गीता में प्रतिपादित “योगयुक्तो विशुद्धात्मा” तथा “समत्वं योग उच्यते” के सिद्धान्त के अनुरूप है। जब मन समत्व में प्रतिष्ठित होता है, तभी वह ज्ञान का अधिकारी बनता है। भगवद्पादाचार्य भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य के अनुसार, चित्त की शुद्धि और एकाग्रता के बिना ब्रह्मज्ञान का उदय असंभव है। अतः यह पद साधना के मूलाधार मनोनिग्रह और चित्तशुद्धि की अनिवार्यता को उद्घाटित करता है। “देवस्य सवितुः सवे” दिव्य प्रेरणा का तत्त्व ! मन्त्र का अगला पद “देवस्य सवितुः सवे” है। “सविता” वैदिक वाङ्मय में वह दिव्य चेतन शक्ति है, जो समस्त जगत् को प्रेरित करती है, गति देती है और प्रकाशमान करती है। शाङ्करभाष्य की दृष्टि से यह बाह्य सूर्य का द्योतक मात्र नहीं, बल्कि वह अन्तर्यामी चैतन्य है, जो बुद्धि को आलोकित करता है। यहाँ साधक यह स्वीकार करता है कि यद्यपि वह स्वयं प्रयास करता है, किन्तु उसकी साधना की अन्तिम सिद्धि किसी अहंकारगत पुरुषार्थ का फल नहीं, बल्कि उस दिव्य प्रेरणा का परिणाम है। भाव बृहदारण्यक उपनिषद के “तमसो मा ज्योतिर्गमय” के तथा कठोपनिषद के “नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यः…” के सिद्धान्तों से पूर्णतः संगत है। आत्मतत्त्व का प्रकाश उसी को प्राप्त होता है, जिसे वह स्वयं प्रकाशित करता है। अतः “सविता” यहाँ ईश्वर, ब्रह्म या शुद्ध चैतन्य का प्रतीक है- वह शक्ति जो साधक की बुद्धि को सत्य की ओर प्रेरित करती है और उसे अविद्या के अन्धकार से बाहर लाती है। “सुवर्गेयाय शक्त्या” यह पद विशेष दार्शनिक गहराई लिए हुए है। सामान्यतः “सुवर्ग” का अर्थ स्वर्गलोक या सुखप्रद स्थिति माना जाता है, किन्तु शाङ्करवेदान्त में इसका गूढ़ार्थ इससे कहीं अधिक उच्च है। यहाँ “सुवर्ग” का तात्पर्य उस चेतन-स्थिति से है, जहाँ साधक स्थूल और सूक्ष्म बन्धनों से ऊपर उठकर आत्मस्वरूप की ओर अग्रसर होता है। यह वही स्थिति है, जिसका संकेत मुण्डकोपनिषद में “परिक्ष्य लोकान् कर्मचितान्…” के माध्यम से किया गया है - जहाँ साधक कर्मफल के सीमित क्षेत्र से निवृत्त होकर ज्ञानमार्ग की ओर उन्मुख होता है। “शक्ति” यहाँ केवल शारीरिक या मानसिक सामर्थ्य नहीं, बल्कि साधना-समर्थता, अन्तःकरण की परिपक्वता और ईश्वरीय अनुग्रह का संयुक्त रूप है। यह वही शक्ति है, जो साधक को अधःस्थित अनुभवों से उठाकर ऊर्ध्व, सूक्ष्म और अन्ततः ब्रह्मनिष्ठ अवस्था की ओर ले जाती है। यदि इस मन्त्र को प्रस्थानत्रयी- उपनिषद्, गीता और ब्रह्मसूत्र के आलोक में देखा जाए, तो यह एक समग्र साधन-मार्ग का सूत्र बन जाता है। उपनिषद् यहाँ तत्त्व का प्रतिपादन करते हैं मन को संयमित कर उसे सत्य की ओर उन्मुख करना है । श्रीमद्भगवद्गीता मनोनिग्रह, समत्व और योगयुक्तता के माध्यम से इस साधना को व्यवहारिक रूप देती है। ब्रह्मसूत्र “अथातो ब्रह्मजिज्ञासा” के द्वारा इस आन्तरिक प्रेरणा को दार्शनिक दिशा प्रदान करते हैं। इस प्रकार यह मन्त्र साधना के तीनों आयामों पुरुषार्थ, ईश्वरीय अनुग्रह और ज्ञान का अद्वैत समन्वय प्रस्तुत करता है। भगवत्पाद भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य के भाष्य-भाव में इस मन्त्र का सार यह है कि ब्रह्मविद्या का उदय किसी आकस्मिक घटना के रूप में नहीं होता। उसके लिए आवश्यक है कि मन की युक्तता (संयम और एकाग्रता), बुद्धि की दिव्य प्रेरणा (सविता का प्रकाश) और साधक की आन्तरिक शक्ति (शक्ति) द्वारा चेतना का ऊर्ध्वगमन। जब ये तीनों तत्त्व एकत्र होते हैं, तभी साधक तत्त्वचिन्तन के योग्य बनता है और आत्मसाक्षात्कार की दिशा में अग्रसर होता है। #श्वेताश्वतर_उपनिषद् #अद्वैत_वेदान्त #AdvaitVedanta #स्वाध्याय #भगवत्पादाचार्य #AvdheshanandG_Quotes
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This is not the language of either a partner or an ally; this is the language of an adversary.
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Jun 13
India has overtaken the US in having the longest road network in the world as per Central Intelligence Agency (CIA). India is now having 6.7 million kms of roads, followed by the US at 6.6 million kms, and China 5.5 million kms. India also has the highest road density in the world. India will continue to lead as India is now adding around 7,000-10,000 kms of highways a year. And will quickly catch up to China in paved roads, where China leads India by 0.5 million kms (India, US come second & third). 10,000 kms of road addition is like laying a road from Tokyo to London every year. This is no joke because if you think post 2020 India's infra boom was spectacular, India has only doubled its investment in infra now compared to 5 years ago.
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!! “सनातन शंखनाद” !! देवाधिदेव महादेव भगवान श्रीपशुपतिनाथ के दर्शन-पूजन तथा सनातन धर्म-संस्कृति के वैश्विक जागरण के पावन संकल्प के साथ "हिन्दू धर्म आचार्य सभा" के अध्यक्ष, परम पूज्य श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर अनन्तश्रीविभूषित पूज्यपाद श्रीस्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज “पूज्य आचार्यश्री जी” 19 से 21 जून, 2026 तक त्रिदिवसीय नेपाल यात्रा पर पधार रहे हैं। इस दिव्य प्रवास के अंतर्गत "पूज्य आचार्यश्री जी" काठमांडू स्थित विश्वविख्यात एवं परम पावन श्रीपशुपतिनाथ मन्दिर में श्रद्धापूर्वक दर्शन-पूजन करेंगे, सन्त-महात्माओं, धर्माचार्यों, विद्वज्जनों एवं श्रद्धालुओं से आत्मीय भेंट करेंगे तथा सनातन धर्म के शाश्वत, सार्वभौमिक, लोककल्याणकारी और समन्वयमय संदेश का प्रसार करेंगे। "कुमारी देवी" पूजन सहित विविध धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रमों में भी उनकी गरिमामयी उपस्थिति रहेगी। नेपाल के विराटनगर में "हिन्दू स्वयं सेवक संघ", नेपाल द्वारा आयोजित विशेष कार्यक्रम में "पूज्य आचार्यश्री जी" के पावन करकमलों से सनातन धर्म-संस्कृति जागरण हेतु समर्पित संगठन के कार्यालय का भव्य लोकार्पण सम्पन्न होगा। इसी पावन अवसर पर उनके दिव्य सान्निध्य में एक विराट धर्मसभा का आयोजन होगा, जिसमें सन्त-महात्मा, धर्माचार्य, विद्वज्जन, धर्मप्रेमी एवं श्रद्धालुजन बड़ी संख्या में सहभागिता करेंगे। यह यात्रा भारत और नेपाल की प्राचीन साझा सनातन विरासत, सांस्कृतिक एकात्मता, आध्यात्मिक चेतना और आत्मीय सम्बन्धों को नई ऊर्जा प्रदान करने वाला ऐतिहासिक एवं प्रेरणादायी अवसर है। "पूज्य आचार्यश्री जी" की पावन उपस्थिति से नेपाल की पुण्यभूमि पर धर्म, संस्कृति, सेवा, करुणा, समरसता, विश्वबंधुत्व और सनातन चेतना का पुनः दिव्य एवं मंगलमय शंखनाद होगा। #पशुपतिनाथ #नेपाल #हिन्दू_स्वयंसेवक_संघ_नेपाल #AvdheshanandG_Quotes #स्वामी_अवधेशानन्द_गिरि
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Spine always grows in the back that is against the wall. America denied us crucial LOX/LH₂ cryogenic engine technology. We developed it indigenously and using it we now send American satellites into space. India can remain sovereign only if it has a sovereign AI. @narendramodi
The US government, citing national security authorities, has issued an export control directive to suspend all access to Fable 5 and Mythos 5 by any foreign national, whether inside or outside the United States, including foreign national Anthropic employees. The net effect of this order is that we must abruptly disable Fable 5 and Mythos 5 for all our customers to ensure compliance. Access to all other Claude models is not affected. We apologize for this disruption to our customers. We believe this is a misunderstanding and are working to restore access as soon as possible. Read our full statement: anthropic.com/news/fable-myt…
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IMPORTANT MESSAGE FROM DR AMBRISH MITHAL I have learnt from friends and patients that an advertisement for a drug Diofin for "curing" diabetes is being widely circulated, supposedly endorsed by me. The claim is accompanied with detailed descriptions about my research saying that I discovered and developed this drug. I wish to say that this is completely false. I do not know of this drug and I have not been involved in its development. I have never even heard of this drug prior to this episode. The post also refers to minute details of my life, education and qualifications to seem authentic. All these personal details are also false. I would like to reiterate that this advertisement is a complete fabrication. Please do not get misled. Meanwhile appropriate steps have been initiated to address this false advertising.
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।। “श्वेताश्वतर” उपनिषद् ।। युञ्जानः प्रथमं मनस्तत्त्वाय सविता धियः। अग्नेर्ज्योतिर्निचाय्य पृथिव्या अध्याभरत् ।।१।। (श्वेताश्वतर उपनिषद् – द्वितीयोऽध्यायः) यह मन्त्र साधना, ध्यानयोग और आत्मविद्या के सम्पूर्ण पथ का उद्घाटन करता है। यदि प्रथम अध्याय में उपनिषद् ने ब्रह्मतत्त्व की जिज्ञासा और उसके स्वरूप का विवेचन किया है, तो द्वितीय अध्याय में वह साधक को उस दिव्य अनुभूति तक पहुँचने की साधना-पद्धति का निर्देश देता है। यह मन्त्र वस्तुतः वेदान्त और योग के अद्भुत समन्वय का उद्घोष है। “युञ्जानः प्रथमं मनः” यह वाक्यांश सम्पूर्ण आध्यात्मिक जीवन का आधार है। ‘युञ्जानः’ धातु ‘युज्’ से बना है, जिसका अर्थ है- जोड़ना, नियोजित करना, संयमित करना और परम लक्ष्य में स्थापित करना। यही धातु आगे चलकर ‘योग’ शब्द का आधार बनती है। अतः उपनिषद् कहता है कि साधना का प्रथम चरण बाह्य जगत् का परित्याग नहीं, अपितु मन का संयमन है। मन ही बन्धन का कारण है और मन ही मोक्ष का साधन। अमृतबिन्दू उपनिषद् का प्रसिद्ध वचन है- “मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।” विषयों में आसक्त मन बन्धन का कारण बनता है और आत्मा में प्रतिष्ठित मन मुक्ति का द्वार खोल देता है। इसलिए साधक को सर्वप्रथम अपने मन को चञ्चलता, विषयासक्ति, राग-द्वेष, भय, कामना और अहंकार से मुक्त करना पड़ता है। जिस प्रकार अशान्त जल में सूर्य का प्रतिबिम्ब स्पष्ट नहीं दिखता, उसी प्रकार विक्षिप्त चित्त में आत्मतत्त्व का प्रकाश प्रतिबिम्बित नहीं हो सकता। “तत्त्वाय” यह पद अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। मन को एकाग्र करना ही पर्याप्त नहीं; वह किस लक्ष्य के लिए एकाग्र किया जा रहा है, यह अधिक महत्त्वपूर्ण है। संसार में चोर भी एकाग्र होता है, वैज्ञानिक भी एकाग्र होता है और कलाकार भी। परन्तु उपनिषद् जिस एकाग्रता की बात करता है, उसका लक्ष्य परम तत्त्व है- वह सत्य जो त्रिकालाबाधित, नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त है। वेदान्त की दृष्टि में तत्त्व का अर्थ है- वह जो वास्तव में है। उपनिषद् साधक को असत्य से सत्य की ओर, अनित्य से नित्य की ओर और मृत्यु से अमृत की ओर ले जाना चाहता है - "असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्माऽमृतं गमय।" अतः मन का संयम तभी सार्थक है, जब वह आत्मबोध और ब्रह्मसाक्षात्कार के लिए हो। “सविता धियः” यहाँ ‘सविता’ केवल दृश्य सूर्य नहीं, अपितु समस्त चेतना का दिव्य प्रेरक है। ऋग्वेद के गायत्री मन्त्र में भी यही भाव व्यक्त हुआ है- “तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्।।” सविता वह परम चेतन सत्ता है, जो बुद्धि को प्रेरित करती है, विवेक को जाग्रत करती है और अन्तःकरण को सत्य की ओर उन्मुख करती है। मनुष्य का पुरुषार्थ आवश्यक है, किन्तु ईश्वरीय अनुग्रह के बिना अन्तिम जागरण सम्भव नहीं। आत्मविद्या में साधना और कृपा दोनों का समन्वय अनिवार्य है। “अग्नेर्ज्योतिर्निचाय्य” यहाँ अग्नि बाह्य अग्नि नहीं, अपितु ज्ञानाग्नि है। भगवद्गीता में भगवान कहते हैं- "ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।" ज्ञानरूपी अग्नि अविद्या, संशय और कर्मबन्धन को दग्ध कर देती है। ‘निचाय्य’ का अर्थ है- भलीभाँति समझकर, पहचानकर, अनुभवपूर्वक ग्रहण करना। केवल शास्त्र पढ़ लेने से ज्ञान नहीं होता; ज्ञान तब होता है जब साधक उस ज्योति को अपने अन्तःकरण में अनुभव करता है। यह अग्निज्योति विवेक की ज्योति है, जो नित्य और अनित्य में भेद करना सिखाती है। यही आत्मप्रकाश है, जिसके उदय होते ही अज्ञानरूपी रात्रि समाप्त हो जाती है। मुण्डकोपनिषद् कहता है- “भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।” ज्ञान-ज्योति के उदय से हृदय की गाँठें खुल जाती हैं और संशय समाप्त हो जाते हैं। “पृथिव्या अध्याभरत्” यह पद अत्यन्त गूढ़ है। पृथ्वी स्थूलता, जड़ता और भौतिक चेतना का प्रतीक है। साधक जब केवल शरीर, इन्द्रियों और विषयों तक सीमित रहता है, तब उसकी चेतना पृथ्वी-तत्त्व में बँधी रहती है। किन्तु जब वह ध्यान, विवेक और आत्मचिन्तन के द्वारा चेतना को ऊर्ध्वगामी बनाता है, तब वह स्थूल से सूक्ष्म, सूक्ष्म से कारण और कारण से परब्रह्म की ओर आरोहण करता है। योगशास्त्र इसे चित्तवृत्ति-निरोध कहता है, वेदान्त इसे आत्मविचार कहता है और उपनिषद् इसे तत्त्वाभिमुखता कहता है। नाम भिन्न हो सकते हैं, पर लक्ष्य एक ही है - आत्मस्वरूप की अनुभूति। भगवत्पादाचार्य श्रीआदि शंकराचार्य के भाष्य-भाव के अनुसार ब्रह्म कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसे नया प्राप्त करना हो। वह तो नित्यसिद्ध है। अज्ञान केवल उसके प्रकाश को ढँक देता है। इसलिए साधना का प्रयोजन ब्रह्म को उत्पन्न करना नहीं, अपितु अन्तःकरण को इतना शुद्ध बनाना है कि उसमें नित्य विद्यमान आत्मप्रकाश प्रतिबिम्बित हो सके। #श्वेताश्वतर_उपनिषद्
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Jun 11
Our reaction to any new study is either “I don’t believe it” or “I knew it”... A NEJM trial in ICU pts w acute resp failure found that mucolytics (carbocisteine & hypertonic saline) don’t help. My ICU rounds line “mucolytics are useless” may need an update: “and possibly harmful”
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Today, I’m releasing never before seen intelligence revealing new evidence of past US government funding for more than 120 biolabs in over 30 countries, including Ukraine. In support of President Trump‘s Executive Order to end federal funding of dangerous gain of function research around the world, and increase transparency and accountability, ODNI will continue working with partners across the Administration to identify where these labs are, what pathogens they contain, and what “research” is being conducted. odni.gov/index.php/newsroom/…
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ARISE-FLUIDS has arrived and it's awesome 🥳 For over a decade, the Surviving Sepsis Guidelines recommended that septic patients get at least 30 cc/kg fluid. In the United States, these guidelines were weaponized into performance metrics, pressuring clinicians to prescribe arbitrary volumes to every patient. Evidence-based clinicians have LONG known that this guideline lacked evidentiary support. For example, I've attached a picture of a blog I wrote about this back in 2017. Despite the lack of evidentiary support and some evidence of harm, the Surviving Sepsis Guidelines INSISTED on perpetually recommending 30 cc/kg fluid resuscitation. We finally have a prospective RCT demonstrating that mandating early administration of 30 cc/kg fluid (as compared to early vasopressors) doesn't help and may actually cause harm. It's important to note that all of the hard endpoints in this trial were neutral (e.g., mortality, days free of organ support). I still think that 30 cc/kg fluid is a pretty reasonable volume of fluid for *most* patients. But the study does suggest that giving too much fluid may promote edema - so we should be *thoughtful* about this intervention rather than mandating it for every septic patient. Based on the subgroup analysis, the fluid-conservative strategy may have helped the subgroup of pneumonia patients the most. This is statistically nonsignificant but aligns with my expectation. ARDSy patients often don't respond well to fluid. (In contrast, I really doubt that a liter of fluids in either direction matters for most urosepsis patients.) This is a great example of the over-reach of guidelines and protocoled medicine. People get all upset about practice variation, so sometimes they try to stomp it out using guidelines and protocols. But these guidelines are highly fallible, so what may occur is that you standardize care in a way that harms everyone equally. 🤦‍♂️
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Indian worker Vipin Kumar has been awarded honorary citizenship by the city of Craiova, Romania, after he jumped into an icy lake and saved the life of a 5-year-old girl. 🇮🇳🇷🇴 For nearly 30 minutes, he held the child above freezing water until rescuers arrived. This is the side of Indians the world rarely sees in headlines: courage, sacrifice, compassion and humanity. Yet stories like this seldom receive the attention that anti-India narratives do. No coverage from Western media outlets. As India's envoy noted, Vipin's actions embodied the spirit of Vasudhaiva Kutumbakam "The World is One Family." ❤️
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Well said @DrSJaishankar .....
"No European country has been attacked with Indian Weapons... So Keep that in Mind"...!!! I think Europe was not expecting that answer from Minister @DrSJaishankar 👏
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Raavan was Shiva's greatest devotee. And yet he is remembered as a symbol of evil. The Gita reminds us that it is the quality of our mind and the thoughts we choose to entertain that truly define who we are. #SwamiSwaroopananda #ChinmayaMission
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A 60s year-old man with neck and shoulder pain, no chest pain. drsmithsecgblog.com/a-60s-ye… @PendellM @PMcardioApp
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Jun 12
I'm telling this again: My hunch is Air India & Indigo are being run down by the GLISCO-DS using insiders and other sabotage. It's time India takes action. First step must be to make sure the CEO and board are Indian patriots. Not foreigners and Indians with foreign interests. At a time when India's aviation sector must be growing and Indian carriers becoming top international carriers bringing revenue to India, we are seeing the reverse happening. So this rout of AI doesn't seem organic. There's no way a company like TATA can't run an airline in partnership with Singapore Airlines to at least do as well as an Ethihad or Malaysian, if not Emirates and Qatar. This is unacceptable.
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