।। “श्वेताश्वतर” उपनिषद् ।।
युञ्जानः प्रथमं मनस्तत्त्वाय सविता धियः।
अग्नेर्ज्योतिर्निचाय्य पृथिव्या अध्याभरत् ।।१।।
(श्वेताश्वतर उपनिषद् – द्वितीयोऽध्यायः)
यह मन्त्र साधना, ध्यानयोग और आत्मविद्या के सम्पूर्ण पथ का उद्घाटन करता है। यदि प्रथम अध्याय में उपनिषद् ने ब्रह्मतत्त्व की जिज्ञासा और उसके स्वरूप का विवेचन किया है, तो द्वितीय अध्याय में वह साधक को उस दिव्य अनुभूति तक पहुँचने की साधना-पद्धति का निर्देश देता है। यह मन्त्र वस्तुतः वेदान्त और योग के अद्भुत समन्वय का उद्घोष है।
“युञ्जानः प्रथमं मनः” यह वाक्यांश सम्पूर्ण आध्यात्मिक जीवन का आधार है। ‘युञ्जानः’ धातु ‘युज्’ से बना है, जिसका अर्थ है- जोड़ना, नियोजित करना, संयमित करना और परम लक्ष्य में स्थापित करना। यही धातु आगे चलकर ‘योग’ शब्द का आधार बनती है। अतः उपनिषद् कहता है कि साधना का प्रथम चरण बाह्य जगत् का परित्याग नहीं, अपितु मन का संयमन है।
मन ही बन्धन का कारण है और मन ही मोक्ष का साधन। अमृतबिन्दू उपनिषद् का प्रसिद्ध वचन है- “मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।”
विषयों में आसक्त मन बन्धन का कारण बनता है और आत्मा में प्रतिष्ठित मन मुक्ति का द्वार खोल देता है। इसलिए साधक को सर्वप्रथम अपने मन को चञ्चलता, विषयासक्ति, राग-द्वेष, भय, कामना और अहंकार से मुक्त करना पड़ता है। जिस प्रकार अशान्त जल में सूर्य का प्रतिबिम्ब स्पष्ट नहीं दिखता, उसी प्रकार विक्षिप्त चित्त में आत्मतत्त्व का प्रकाश प्रतिबिम्बित नहीं हो सकता।
“तत्त्वाय” यह पद अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। मन को एकाग्र करना ही पर्याप्त नहीं; वह किस लक्ष्य के लिए एकाग्र किया जा रहा है, यह अधिक महत्त्वपूर्ण है। संसार में चोर भी एकाग्र होता है, वैज्ञानिक भी एकाग्र होता है और कलाकार भी। परन्तु उपनिषद् जिस एकाग्रता की बात करता है, उसका लक्ष्य परम तत्त्व है- वह सत्य जो त्रिकालाबाधित, नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त है।
वेदान्त की दृष्टि में तत्त्व का अर्थ है- वह जो वास्तव में है। उपनिषद् साधक को असत्य से सत्य की ओर, अनित्य से नित्य की ओर और मृत्यु से अमृत की ओर ले जाना चाहता है - "असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्माऽमृतं गमय।"
अतः मन का संयम तभी सार्थक है, जब वह आत्मबोध और ब्रह्मसाक्षात्कार के लिए हो।
“सविता धियः” यहाँ ‘सविता’ केवल दृश्य सूर्य नहीं, अपितु समस्त चेतना का दिव्य प्रेरक है। ऋग्वेद के गायत्री मन्त्र में भी यही भाव व्यक्त हुआ है- “तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्।।”
सविता वह परम चेतन सत्ता है, जो बुद्धि को प्रेरित करती है, विवेक को जाग्रत करती है और अन्तःकरण को सत्य की ओर उन्मुख करती है। मनुष्य का पुरुषार्थ आवश्यक है, किन्तु ईश्वरीय अनुग्रह के बिना अन्तिम जागरण सम्भव नहीं। आत्मविद्या में साधना और कृपा दोनों का समन्वय अनिवार्य है।
“अग्नेर्ज्योतिर्निचाय्य” यहाँ अग्नि बाह्य अग्नि नहीं, अपितु ज्ञानाग्नि है। भगवद्गीता में भगवान कहते हैं- "ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।"
ज्ञानरूपी अग्नि अविद्या, संशय और कर्मबन्धन को दग्ध कर देती है। ‘निचाय्य’ का अर्थ है- भलीभाँति समझकर, पहचानकर, अनुभवपूर्वक ग्रहण करना। केवल शास्त्र पढ़ लेने से ज्ञान नहीं होता; ज्ञान तब होता है जब साधक उस ज्योति को अपने अन्तःकरण में अनुभव करता है।
यह अग्निज्योति विवेक की ज्योति है, जो नित्य और अनित्य में भेद करना सिखाती है। यही आत्मप्रकाश है, जिसके उदय होते ही अज्ञानरूपी रात्रि समाप्त हो जाती है। मुण्डकोपनिषद् कहता है- “भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।”
ज्ञान-ज्योति के उदय से हृदय की गाँठें खुल जाती हैं और संशय समाप्त हो जाते हैं।
“पृथिव्या अध्याभरत्” यह पद अत्यन्त गूढ़ है। पृथ्वी स्थूलता, जड़ता और भौतिक चेतना का प्रतीक है। साधक जब केवल शरीर, इन्द्रियों और विषयों तक सीमित रहता है, तब उसकी चेतना पृथ्वी-तत्त्व में बँधी रहती है। किन्तु जब वह ध्यान, विवेक और आत्मचिन्तन के द्वारा चेतना को ऊर्ध्वगामी बनाता है, तब वह स्थूल से सूक्ष्म, सूक्ष्म से कारण और कारण से परब्रह्म की ओर आरोहण करता है। योगशास्त्र इसे चित्तवृत्ति-निरोध कहता है, वेदान्त इसे आत्मविचार कहता है और उपनिषद् इसे तत्त्वाभिमुखता कहता है। नाम भिन्न हो सकते हैं, पर लक्ष्य एक ही है - आत्मस्वरूप की अनुभूति।
भगवत्पादाचार्य श्रीआदि शंकराचार्य के भाष्य-भाव के अनुसार ब्रह्म कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसे नया प्राप्त करना हो। वह तो नित्यसिद्ध है। अज्ञान केवल उसके प्रकाश को ढँक देता है। इसलिए साधना का प्रयोजन ब्रह्म को उत्पन्न करना नहीं, अपितु अन्तःकरण को इतना शुद्ध बनाना है कि उसमें नित्य विद्यमान आत्मप्रकाश प्रतिबिम्बित हो सके।
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