बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री, भारत के पूर्व रेल मंत्री, सामाजिक न्याय की राजनीति के प्रमुख स्तंभ, गरीबों, शोषितों, पिछड़ों, दलितों एवं वंचितों की बुलंद आवाज़ लालू प्रसाद यादव को सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता, गंगा-जमुनी तहज़ीब और संविधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए उनके संघर्ष को देश हमेशा याद रखेगा।
थॉमस पेन, मार्टिन लूथर किंग और लालू प्रसाद यादव इन तीनों क्रांतिकारियों का एक मूल भावना न्याय और समानता की लड़ाई है!
थॉमस पेन ने "Rights of Man" में राजशाही और विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग का विरोध किया उन्होंने कहा "If there must be trouble, let it be in my day, that my child may have peace." यानी संघर्ष की कीमत खुद चुकानी है ताकि आने वाली पीढ़ियाँ चैन से जी सकें!
मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने अमेरिका में अश्वेतों के हक़ के लिए लड़ाई लड़ी उन्होंने कहा "Injustice anywhere is a threat to justice everywhere." यानी जब तक एक भी कोना अन्याय से भरा है, न्याय कहीं भी सुरक्षित नहीं हो सकता!
लालू प्रसाद यादव ने भारत में मंडल आंदोलन से लेकर सामाजिक न्याय की राजनीति तक शोषित, वंचित, पिछड़ों, दलितों आदिवासी समाज की आवाज़ को संसद से लेकर सड़क बुलंद किया जब हजारों वर्षो के इतिहास में राष्ट्र के संसाधनों पर मुट्ठी भर कुछ सवर्ण पूजीपतियों का वर्चस्व है, तब लालू ने कहा कि :-
"हे भेड़ चराने वालों, भैंस चराने वालों, सूअर चराने वालों, ताड़ी उतारने वाले, मैंला ढोने वालों, पढ़ना-लिखना सीखो!"
यह नारा उन्हीं हरवाहा-चरवाहा कृषक समुदायों को संबोधित करता है जिन्हें ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने "नीच कामों" में झोंक रखा था यह नारा कहता है कि तुम्हारे श्रम ने समाज चलाया, लेकिन तुम्हें शिक्षा और सत्ता से वंचित रखा गया लालू प्रसाद यादव ने हजारों वर्षो से स्थापित वर्ण अव्यवस्था आधारित ब्राह्मण, बनिया, राजपूत और लाला के सामाजिक वर्चस्व को चुनौती दिया!
थॉमस पेन ने इंग्लैंड के अभिजात्यों को ललकारा तो मार्टिन लूथर किंग ने अमेरिका की नस्लवादी व्यवस्था को झकझोरा दिया और लालू प्रसाद यादव ने भारत की जातिवादी सत्ता को आईना दिखाया उस व्यवस्था को, जहाँ सदियों से मेहनत करने वाली जातियों को "अशुद्ध" और "नीच" कहकर हाशिये पर धकेल दिया गया था।
लालू प्रसाद की राजनीति ने उन आवाज़ों को ज़ुबान दिया जिन्हें सदियों तक दबाया गया था और जिनकी पीठ पर इस देश की अर्थव्यवस्था और संस्कृति खड़ी रही इन वर्गों को उनकी पहचान पर गर्व करना ही नहीं सिखाया, बल्कि उन्हें पढ़ने, समझने और सवाल उठाने की ताक़त दिया कि "अब हरवाहा-चरवाहा कृषक परिवार का बेटा-बेटी अपने हक, हिस्सेदारी और अपने ऊपर हो रहे अन्याय व अत्याचार पर खामोश नहीं रहेगा!"
जब हरवाहा-चरवाहा पशुपालक-कृषक समाज अपने हक, अधिकार और सम्मान की बात करता है, तो बीजेपी और आरएसएस में बेचैनी दिखती है क्योंकि जिस समाज ने सभ्यता की नींव रखी, वही समाज न्याय और समानता की नींव रखने की क्षमता रखता है पशुपालक चरवाहे केवल झुंडों के ही रक्षक नहीं थे, बल्कि मानव सभ्यता के मूल निर्माता और शाश्वत पथप्रदर्शक रहे है नेतृत्व की शक्ति इनको शासकीय विलासिता और महलों में नहीं, बल्कि झुंड की सेवा, सुरक्षा और न्याय के साहसिक दायित्व में प्रकृति से मिली है, जननायक लालू प्रसाद यादव जी को जन्मदिन की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।
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