एक महीने में 5 बड़ी घटनाएं, लेकिन चुप्पी क्यों?
रामपुर, मुक्तसर, कुरुक्षेत्र, हांसी और देवरिया की घटनाओं का हवाला देकर सामाजिक कार्यकर्ता
@SurajKrBauddh ने दलित नेताओं की भूमिका पर उठाए प्रश्न।
दलित अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता सूरज कुमार बौद्ध ने हाल में विभिन्न राज्यों में सामने आई दलित उत्पीड़न की घटनाओं को लेकर दलित नेतृत्व की चुप्पी पर सवाल उठाए हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर किए गए एक पोस्ट में उन्होंने कहा कि एक महीने के भीतर दलित समाज के खिलाफ कई गंभीर घटनाएं सामने आईं, लेकिन इन मामलों में समुदाय के प्रमुख नेताओं की ओर से अपेक्षित प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली।
अपने पोस्ट में सूरज बौद्ध ने उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा की उन घटनाओं का जिक्र किया जिनमें दलित समुदाय के लोगों के साथ कथित तौर पर दुष्कर्म, मारपीट और सार्वजनिक अपमान जैसी घटनाएं सामने आईं। उन्होंने रामपुर, मुक्तसर, कुरुक्षेत्र, हांसी और देवरिया की घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि ये मामले केवल आपराधिक घटनाएं नहीं हैं, बल्कि समाज में मौजूद जातिगत भेदभाव और हिंसा की गंभीर तस्वीर भी पेश करते हैं।
सूरज बौद्ध ने आरोप लगाया कि इन मामलों में दलित समुदाय के किसी भी प्रमुख नेता ने खुलकर आवाज नहीं उठाई। उन्होंने लिखा कि समाज के अधिकांश नेताओं को लगता है कि दलित समाज उनके साथ बना रहेगा, इसलिए वे ऐसे मामलों पर सक्रिय हस्तक्षेप की आवश्यकता महसूस नहीं करते।
अपने पोस्ट में उन्होंने यह भी कहा कि कई नेता अन्य समुदायों से जुड़े मुद्दों पर लगातार बयान देते हैं, लेकिन जब दलित समाज के लोगों के साथ अत्याचार की घटनाएं होती हैं तो उनकी प्रतिक्रिया दिखाई नहीं देती। इसी संदर्भ में उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर इन घटनाओं पर व्यापक राजनीतिक और सामाजिक आवाज क्यों नहीं सुनाई दी।
सूरज बौद्ध का यह पोस्ट दलित समाज के नेतृत्व, उसकी प्राथमिकताओं और अत्याचार के मामलों में उसकी भूमिका को लेकर नए सवाल खड़े करता है।
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