यूं ही दिल ने चाहा था रोना रुलाना
तेरी याद तो बन गई एक बहाना
#सुमन #स्मृतियोंमें
*सुमन कल्याणपुर होने के मायने*:
सुमन कल्याणपुर का देहावसान भारतीय संस्कृति,.संगीत, सिनेमा जगत, और उसके चाहने वालों के लिए एक बेहद दुखद घटना है। सुमन कल्याणपुर हिंदी फिल्म और गैर फिल्मी संगीत के इतिहास में एक अविस्मरणीय हस्ताक्षर की तरह से याद की जाएंगी।
पर हिंदी फिल्म संगीत में सुमन कल्याणपुर होना एक किस्म से त्रासदी भी रहा।
1954 में सुमन कल्याणपुर ने तलत महमूद के साथ जब अपना पहला गीत रिकॉर्ड किया था, उस समय लता मंगेशकर गायकी के संगीत शिखर पर स्थापित हो गई थीं और आशा भोसले की कीर्ति यात्रा भी प्रारंभ हो चुकी थी, ऐसे में सुमन कल्याणपुर के लिए उस शिखर पर पहुंचना लगभग असंभव रहा लेकिन उससे बड़ी त्रासदी ये थी कि उनके अधिकतर गीत आम सुनने वालों को लता मंगेशकर के गाए लगते थे और उनके गाए बहुत से लोकप्रिय गीतों में अभी तक लोग आश्चर्य करते हैं की क्या यह लता की आवाज नहीं है। सिनेमाई राजनीति और सीमित अवसरों की बात छोड़ भी दी जाए तो भी अपने ही लोकप्रिय गीतों के लिए पहचान ना मिल पाना सुमन कल्याणपुर जैसी कलाकार के लिए एक बहुत बड़ी त्रासदी है। नियति की बात देखिये, सुमन कल्याणपुर ने जब अपना पहला गीत रिकॉर्ड किया था तो लता जी स्टूडियो में आई थी और इस नई लड़की की गायकी की बहुत प्रशंसा की थी।
लेकिन सुमन कल्याणपुर का होना हिंदी फिल्म संगीत के इतिहास की एक सुखद घटना भी है। लता, शमशाद, गीता दत्त और आशा भोसले जैसी मधुर और लोकप्रिय आवाजों के बीच अपनी एक जगह बना पाना कोई आसान बात नहीं है। सुमन ने अपनी गायकी, मधुरता और कौशल से फिल्म संगीत में एक विकल्प दिया और खासकर जिस दौर में लता और रफी अपनी अनबन की वजह से साथ गा नहीं रहे थे, उस दौर में सुमन के रूप में निर्माताओं को, कलाकारों को, और हम सुनने वालों को, गायकी में लता का एक खूबसूरत विकल्प मिला। आज भी कितने ही ऐसे गीत हैं जिसमें अमूमन सुनने वाले गच्चा खा जाते हैं, और सुमन के स्वरों को पहचान नहीं पाते। जैसे बाद मुद्दत की ये घड़ी आई (जहां आरा), जूही की कली मेरी लाडली (दिल एक मंदिर), आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे (ब्रह्मचारी), मेरा प्यार भी तू है (साथी), मनमोहन मन में हो तुम्हीं (कैसे कहूं), या यूं ही दिल ने चाहा था (दिल ही तो है) जैसे गीत शामिल किया जा सकते हैं|
मुख्य धारा में मिले अवसरों के बावजूद हिंदी फिल्म संगीत में सुमन कल्याणपुर का शिखर पर ना हो पाना एक और महत्वपूर्ण आयाम की ओर इशारा करता है। यह बात मुझे फिल्म संगीत के एक बड़े संगीतकार ने बताई थी की सुमन कल्याणपुर, लता और आशा की तरह गायकी के लिए कमिटेड नहीं थीं, परिवार और प्रोफेशन में बैलेंस बनाने में भी थोड़ी मुश्किल हो रही थी और एक दो बार ऐसा हुआ जब उन्होंने साथी गायकों, संगत वाले वाद्य कलाकारों और संगीतकारों को पूरे दिन इंतजार कराया और नहीं आईं। उस दिन के बाद उन संगीतकार ने सुमन कल्याणपुर को कभी नहीं गवाया। फिल्म संगीत में जिस तरह की नेटवर्किंग और कमिटमेंट की जरूरत होती है शायद सुमन वहां कमजोर थीं , जिसका नुकसान उनके पेशेवर करियर पर पड़ा।
भारतीय संगीत और खासकर फिल्म संगीत के इतिहास में सुमन कल्याणपुर हो पाना आसान नहीं था। सुमन कल्याणपुर ने पूरी गरिमा से, स्वयं बिना विवादों में आए, इस सांगीतिक यात्रा में अपनी हिस्सेदारी से फिल्म संगीत को समृद्ध बनाया, और अपनी एक विशिष्ट जगह बनाई।
एक सुखद पक्ष ये है कि जिस आवाज़ और सुरीली गायकी से हमने उन्हें जाना, वो वह रिकॉर्ड्स , रेडियो और प्लेटफॉर्म्स के साथ हमारी यादों में संरक्षित और सुरक्षित हैं, सदियों के लिए, और जब तक वे सुरक्षित हैं तब तक सुमन कल्याणपुर हिंदी मराठी, बंगाली, अंग्रेजी और अन्य भाषाओं में गाए अपने गीतों में, उन सुरों में, सांस लेती रहेंगी, और जिंदा रहेंगी, और हम सब की मधुर स्मृतियों में भी।
नियति ने लता जी के साथ उन्हें भी ये कालजई गीत दिया था।
यूं ही इस चमन की ज़ीनत रहेंगे
रहे ना रहे हम, महका करेंगे
बन के कली बनके सबा,
बाग़े वफ़ा में