नमस्कार साथियों,
कभी-कभी कोई वर्ष केवल तीन सौ पैंसठ दिनों का नहीं होता, वह जीवन का एक नया अध्याय लगने लगते है। बीता हुआ यह वर्ष भी ऐसा ही रहा। पिछले वर्ष इसी दिन (22 October) मैंने राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्षा का दायित्व संभाला था। उस दिन मन में एक ही भाव था कि यह सिर्फ़ एक पद नहीं, यह एक उत्तरदायित्व है। भारत की हर बेटी, हर बहन, हर माँ की आवाज़ को सशक्त बनाने का दायित्व। मैंने स्वयं से कहा था कि “यह सफ़र मात्र आँकड़ों का नहीं, संवेदना का होगा; यह यात्रा सिर्फ योजनाओं की नहीं, विश्वास की भी होगी।"
पिछले एक वर्ष से मैं देश के विभिन्न प्रांतो की महिलाओं से मिली और उनसे मिलने के बाद मैंने एक बड़ा परिवर्तन महसूस किया है। भारत की महिलाएँ अब पहले से कहीं अधिक आत्मविश्वासी, शिक्षित, सजग और सशक्त हो गई हैं। अब वे अपने अधिकारों के लिए संघर्ष नहीं करतीं, बल्कि उन्हें आत्मविश्वास के साथ जीती हैं। उनके भीतर का यह विश्वास भारत के बदलते सामाजिक चरित्र का प्रतीक है हालांकि हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि यह यात्रा अभी पूरी नहीं हुई है। अब भी समाज के कई कोनों में ऐसी महिलाएं हैं जिन्हें न्याय, समान अवसर और सम्मान के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। बदलाव का यह मार्ग लंबा है, मगर हमारी दिशा सही है।
जब मैं पहली बार आयोग की एक महिला जन सुनवाई में पहुँची, तो एक बुज़ुर्ग महिला आई और बोली, “बेटी, बस कोई मेरी बात सुन ले, यही बहुत है।” उसकी आँखों में दर्द और उम्मीद दोनों थे। जब उसकी समस्या का समाधान हुआ, उसकी मुस्कान ने मुझे यह सिखाया कि न्याय केवल कानूनों से नहीं, संवेदनाओं से भी लिखा जाता है। उसी क्षण मेरा यह विश्वास और अधिक दृढ़ हो गया कि महिला आयोग का कार्य केवल शिकायतें सुलझाना ही नहीं, बल्कि जीवन में नया विश्वास जगाना भी है।
इस एक वर्ष में राष्ट्रीय महिला आयोग ने न्याय, संवाद और सशक्तिकरण को हर महिला की पहुँच तक ले जाने का संकल्प निभाया। “राष्ट्रीय महिला आयोग आके द्वार” महिला जन सुनवाई को हमने देश के हर कोने तक पहुँचाया, ताकि किसी महिला को न्याय पाने के लिए लंबी दूरी तय न करनी पड़े।
पिछले एक वर्ष में राष्ट्रीय महिला आयोग की यात्रा केवल कार्यक्रमों की नहीं, अनुभवों की रही। मैंने स्वयं 21 राज्यों के 55 ज़िलों का प्रवास किया। एक साल में 65 से अधिक महिला जन सुनवाइयाँ आयोजित की गईं। मैंने 200 से अधिक कार्यक्रमों, बैठकों और सम्मेलनों में भाग लिया। यह केवल यात्राएँ नहीं थीं, यह संवाद थे, संवेदनाएँ थीं, संकल्प थे। हर राज्य, हर ज़िले में अलग कहानी, अलग संघर्ष और एक ही विश्वास मिला कि नारी अब रुकने वाली नहीं है। हर बैठक, हर कार्यक्रम ने यह सिखाया कि नारी सशक्तिकरण किसी एक विभाग या योजना का विषय नहीं, बल्कि पूरे समाज का आंदोलन है।
युवाओं के बीच संवेदनशीलता और लैंगिक समानता का संदेश पहुँचाने के लिए
#CampusCalling , आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्रशिक्षण के लिए
#Yashoda_AI अभियान, विवाह पूर्व संवाद के लिए
#TereMereSapne प्री-मैरिटल कम्युनिकेशन सेंटर की स्थापना, महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण के लिए
#PanchayatSeParliament एवं
#SheisaChangemaker कार्यक्रम, राज्य महिला आयोगों के साथ नियमित
#शक्ति_संवाद, DM -SP के लिए
#catalystforchange प्रशिक्षण, कार्यस्थल पर उत्पीड़न रोकने के लिए स्थानिक समितियों (LC) को
#PowerofPOSHAct का प्रशिक्षण ऐसे आयोजनों के माध्यम से कोशिश की गई कि भारत की नारी अब केवल प्रेरणा नहीं, परिवर्तन की वाहक बन चुकी है।
यह एक वर्ष किसी पद का गौरव नहीं, बल्कि एक संवेदनशील यात्रा रहा है। मैंने देखा कि जब नारी को अवसर मिलता है, तो वह केवल अपना नहीं, समाज का भविष्य भी गढ़ती है।
हमारा आने वाला समय उस नारी को समर्पित है जो केवल बदलाव की गवाह नहीं, स्वयं बदलाव बन रही है। क्योंकि जब नारी सशक्त होती है, तो राष्ट्र उन्नत होता है। राष्ट्रीय महिला आयोग इस दिशा में निरंतर प्रयासरत रहेगा, ताकि हर नारी के सम्मान, स्वाभिमान और योगदान से भारत एक सशक्त और विकसित राष्ट्र बन सके।
मेरे सभी मार्गदर्शकों को नमस्कार और सभी साथियों के प्रति दिल की गहराइयों से आभार व्यक्त करती हूं।
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