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TWA चैप्टर 68 📘 _आज का बोधकार्य राष्ट्रीय बेस्टसेलर पुस्तक Truth without Apology के अध्याय 68 "Love That Sets You Free" पर आधारित है।_ _कृपया इसे ध्यानपूर्वक पढ़ें और नीचे दिया गया बोधकार्य पूरा करें।_ ____________ वह प्रेम जो तुम्हें मुक्त करे "यदि तुम किसी संबंध को परखना चाहते हो, यदि तुम अपनी संगति की गुणवत्ता जाँचना चाहते हो, तो उनसे असली बातें करना शुरू करो, या बस बकवास को रोकना शुरू करो।" क्या तुम्हें लगता है कि तुम किसी व्यक्ति से प्रेम करते हो? जरा जाँचो कि उस व्यक्ति की संगति तुम्हें क्या देती है। क्या वह तुम्हें अशांत करती है, या शांत? क्या वह व्यक्ति अपनी उपस्थिति जताना चाहता है, या तुम्हें स्वतंत्र रूप से सुरक्षित बनने में सक्षम करता है? क्या उसकी संगति में तुम्हारे भीतर असुरक्षा और अधिकार-भाव जागा है, या तुम अधिक परिपक्व और सुरक्षित हुए हो? एक सच्चा प्रेमी तुम्हें सशक्त बनाएगा। वह तुम्हें तुम्हारे आश्वस्त स्वयं के करीब लाएगा। वह कहेगा, तुम तब भी पूर्ण हो जब मैं तुम्हारे साथ नहीं हूँ। यह नहीं कि मैं दूर रहना चाहता हूँ, पर यदि मैं दूर भी हूँ, तो भी तुम पूर्ण हो। झूठा प्रेमी कहेगा, मेरे बिना तुम्हारा जीवन अधूरा है, इसलिए तुम मुझसे चिपके रहो। सच्चे प्रेमी की हिस्सेदारी तुम्हारी भलाई में होगी। झूठे प्रेमी की हिस्सेदारी तुम्हारी निर्भरताओं में होगी। वह चाहेगा कि तुम निर्भर बने रहो, भावनात्मक रूप से, शारीरिक रूप से, आर्थिक रूप से, किसी न किसी तरह से। सच्चा प्रेमी चाहेगा कि तुम हर चीज़ से, यहाँ तक कि उससे भी, पूर्णतः मुक्त हो जाओ। *🧭 आपके लिए बोध कार्य* 1️⃣ इस अध्याय से आपने क्या सीखा, कृपया साझा करें। 2️⃣ क्या आप भी अपने जीवन में किसी के ऊपर निर्भर हैं? यह आपके और उनके, दोनों के लिए कैसे हानिकारक है? 3️⃣ यदि आपने यह पुस्तक Amazon से खरीदी है, तो इस लिंक amzn.in/d/61CYEr4 पर अपना रिव्यू और स्क्रीनशॉट साझा करें। #AcharyaPrashant #DailyActivity ~ PrashantAdvait Foundation, on Acharya Prashant's Gita Mission App. Download Now - app.acharyaprashant.org/?id=… @Advait_Prashant @Prashant_Advait
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शिष्य — स्मृति और श्रुति के बीच का अंतर लोकधर्म ने हमें *शिष्य* के बारे में बहुत-सी मान्यताएँ दे दी हैं - *🌱 "शिष्य को स्त्रियों से दूर रहना चाहिए और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।"* *🌱 "शिष्य को सिर पर शिखा धारण करके शुद्ध आचरण करना चाहिए।"* *🌱 "जो रात्रि में जल्दी सोता है और ब्रह्ममुहूर्त में उठता है वही शिष्य है।"* *🌱 "जो नियमित पूजा एवं मंत्रों का जप करता है वही सच्चा शिष्य है।"* लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि - *👉 स्त्रियों से दूर रहना, ब्रह्मचर्य का पालन करना, बाहरी आचरण का पालन करना आदि का संबंध शिष्य की पहचान से कैसे जुड़ गया?* *👉 जो जल्दी उठता है, कर्मकांड करता है, ब्रह्ममुहूर्त में उठता है और पूजा-पाठ आदि करता है वही शिष्य कहलाता है - आखिर यह हमें किसने सिखाया?* ➖➖➖➖ *📜 स्मृति* *🟤 अग्निपुराण* _निरुध्य शोधिते काये न्यासं कृत्वा तमर्चयेत्।_ _पूर्वाननस्य शिष्यस्य मूलमन्त्रेण मस्तके॥_ *अनुवाद:* शरीर को शुद्ध करके और प्राण आदि को नियंत्रित कर, न्यास करके उस शिष्य का अनुष्ठान करे। पूर्वमुख होकर बैठे हुए शिष्य के मस्तक पर मूल मन्त्र से पूजन करना चाहिए। ➖➖➖➖ *🕉️ श्रुति* *🟤 निरालंब उपनिषद* _शिष्य इति च विद्याध्वस्तप्रपञ्चावगाहितज्ञानावशिष्टं ब्रह्मैव शिष्यः॥_ *अनुवाद:* जिस ज्ञान में, विद्या द्वारा प्रपञ्च (जगत्) का नाश हो गया है, उसमें जो केवल ब्रह्म शेष रह जाता है—वही शिष्य है। 👉 उपनिषद (श्रुति) स्पष्ट रूप से बताते हैं कि शिष्य होने का संबंध आत्मज्ञान से है। लेकिन हमने श्रुति (उपनिषदों) की उपेक्षा कर दी और स्मृति को ही सही मान लिया। ➖➖➖➖ *आज के बोधकार्य का उद्देश्य है -* स्मृति और श्रुति के बीच के भेद को ठीक से समझना। *👉 नियम यह है कि स्मृति की जो बातें श्रुति का विरोध करती हैं, उन्हें तुरंत अस्वीकार कर देना चाहिए।* *कृपया इन प्रश्नों को ध्यानपूर्वक पढ़ें और अपने उत्तर साझा करें:* 1️⃣ आचार्य जी से जुड़ने से पहले आप "शिष्य कौन है?" इससे जुड़ी किन मान्यताओं का समर्थन करते थे? और इससे जुड़ी कौन-सी मान्यताएँ आपके आस-पास और सोशल मीडिया पर प्रचलित हैं? 2️⃣ AP फ्रेमवर्क के प्रकाश में बताइए कि वास्तव में शिष्य कौन है? बेहतर समझ के लिए *XIV. शिक्षक-छात्र संबंध : - AP फ्रेमवर्क पढ़ें* और ‘Ask AP Framework’ से पूछें: अहंकार वास्तविक शिष्य बनने से क्यों डरता है? acharyaprashant.org/hi/ap-fr… 3️⃣ आचार्य जी इन दिनों UK दौरे पर हैं और वहाँ के शीर्ष विश्वविद्यालयों के छात्रों से मिल रहे हैं। UK और भारत के विश्वविद्यालयों में, विशेषकर छात्र-शिक्षक संबंधों के संदर्भ में, आप क्या अंतर देखते हैं? #AcharyaPrashant #DailyActivity ~ PrashantAdvait Foundation, on Acharya Prashant's Gita Mission App. Download Now - app.acharyaprashant.org/?id=…
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कैम्ब्रिज में जो पूछा जाता रहा: संकट का एक केंद्र है _The Pioneer_ में प्रकाशित इस लेख में आचार्य जी कैम्ब्रिज यूनियन में हुई उस असाधारण बातचीत का वर्णन करते हैं, जहाँ अर्थशास्त्रियों, MBA छात्रों और व्यापार विद्वानों से भरा एक कमरा बार-बार एक ही प्रश्न की ओर लौटता रहा। संकट बाहर दिखता है तो हम बाहर दौड़ते हैं, नई नीतियाँ, नई तकनीक, नए समाधान। लेकिन जो प्रश्न कभी नहीं पूछा जाता वह यह है कि संकट का निर्माता कौन है? और वह निर्माता वही है जो समाधान ढूंढ रहा है, वही अहंकार जो कभी स्वयं को एजेंडे पर नहीं रखता। यह प्रश्न किसी भी पाठ्यक्रम में नहीं पूछा जाता क्योंकि यह प्रश्न पूछने वाले को ही कठघरे में खड़ा करता है। कृपया इस लेख को पढ़ें, और _The Pioneer_ की सोशल मीडिया पोस्ट को लाइक, कमेंट करें और इसे अधिक से अधिक लोगों के साथ साझा करें, ताकि सभी इस महत्वपूर्ण विमर्श को गहराई से समझ सकें। The Pioneer लेख: dailypioneer.com/news/what-c… The Pioneer X (Twitter) पोस्ट: x.com/i/status/2063139724232… (लेख का AI द्वारा किया हिंदी अनुवाद भी अंत में दिया गया है।) *📌 लेख से कुछ मुख्य बिंदु:* 1️⃣ The crises I spoke of at Cambridge are the product of a specific combination: enormous outer power meeting an almost entirely unexamined inner life. कैम्ब्रिज में मैंने जिन संकटों की बात की, वे एक विशेष संयोजन की उपज हैं: अपार बाहरी शक्ति का एक लगभग पूरी तरह से अपरीक्षित आंतरिक जीवन से मिलना। 2️⃣ The Jevons Paradox is not a historical curiosity from Victorian England. It is the operating principle of an ego handed a cheaper instrument: it uses more of it, not less, because the instrument was always in service of an appetite, and an appetite does not self-limit through efficiency. जेवन्स का विरोधाभास विक्टोरियन इंग्लैंड की कोई ऐतिहासिक जिज्ञासा नहीं है। यह एक सस्ता उपकरण थमाए गए अहंकार का संचालन सिद्धांत है: वह उसका अधिक उपयोग करता है, कम नहीं, क्योंकि उपकरण हमेशा एक भूख की सेवा में था, और भूख कार्यकुशलता के माध्यम से स्वयं को सीमित नहीं करती। 3️⃣ The richest 1% of humanity is responsible for approximately 16% of global emissions, consuming their entire fair annual share of the carbon budget within the first ten days of the year. सबसे अमीर 1% वैश्विक उत्सर्जन के लगभग 16% के लिए जिम्मेदार है, जो साल के पहले दस दिनों के भीतर ही कार्बन बजट का अपना पूरा उचित वार्षिक हिस्सा खर्च कर देता है। 4️⃣ The curriculum grows more sophisticated each year, and the human being at the centre of it grows more equipped and, frequently, no more honest about what he is, what he actually wants, and why he does what he does. पाठ्यक्रम हर साल जटिल होता जाता है, और उसके केंद्र में मौजूद मनुष्य अधिक सुसज्जित होता जाता है और, अक्सर, इस बारे में कोई अधिक ईमानदार नहीं होता कि वह क्या है, वह वास्तव में क्या चाहता है, और वह जो करता है वह क्यों करता है। *🧭 आपका बोधकार्य:* 1️⃣ आपने इस लेख से क्या सीखा? अपने शब्दों में लिखें। 2️⃣ जेवन्स के विरोधाभास के कुछ और उदाहरण खोजें और साझा करें। 3️⃣ क्या आपके जीवन में कोई ऐसी चाहत है जो पूरी होने पर शांत नहीं हुई, बल्कि और तेज़ हो गई? क्या आपने कभी यह परीक्षण किया है कि वह चाहत कहाँ से आती है और वास्तव में क्या खोज रही है? _(AI द्वारा अनुवाद)_ docs.google.com/document/d/1… #AcharyaPrashant #DailyActivity ~ PrashantAdvait Foundation, on Acharya Prashant's Gita Mission App. Download Now - app.acharyaprashant.org/?id=…
ANALYSIS What Cambridge kept asking: The crisis has a centre By Acharya Prashant Click here: dailypioneer.com/news/what-c… @Advait_Prashant #Cambridge #HigherEducation #AcademicExcellence #GlobalCrisis #ThoughtLeadership #PublicPolicy
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कैम्ब्रिज में जो पूछा जाता रहा: संकट का एक केंद्र है _The Pioneer_ में प्रकाशित इस लेख में आचार्य जी कैम्ब्रिज यूनियन में हुई उस असाधारण बातचीत का वर्णन करते हैं, जहाँ अर्थशास्त्रियों, MBA छात्रों और व्यापार विद्वानों से भरा एक कमरा बार-बार एक ही प्रश्न की ओर लौटता रहा। संकट बाहर दिखता है तो हम बाहर दौड़ते हैं, नई नीतियाँ, नई तकनीक, नए समाधान। लेकिन जो प्रश्न कभी नहीं पूछा जाता वह यह है कि संकट का निर्माता कौन है? और वह निर्माता वही है जो समाधान ढूंढ रहा है, वही अहंकार जो कभी स्वयं को एजेंडे पर नहीं रखता। यह प्रश्न किसी भी पाठ्यक्रम में नहीं पूछा जाता क्योंकि यह प्रश्न पूछने वाले को ही कठघरे में खड़ा करता है। कृपया इस लेख को पढ़ें, और _The Pioneer_ की सोशल मीडिया पोस्ट को लाइक, कमेंट करें और इसे अधिक से अधिक लोगों के साथ साझा करें, ताकि सभी इस महत्वपूर्ण विमर्श को गहराई से समझ सकें। The Pioneer लेख: dailypioneer.com/news/what-c… The Pioneer X (Twitter) पोस्ट: x.com/i/status/2063139724232… (लेख का AI द्वारा किया हिंदी अनुवाद भी अंत में दिया गया है।) *📌 लेख से कुछ मुख्य बिंदु:* 1️⃣ The crises I spoke of at Cambridge are the product of a specific combination: enormous outer power meeting an almost entirely unexamined inner life. कैम्ब्रिज में मैंने जिन संकटों की बात की, वे एक विशेष संयोजन की उपज हैं: अपार बाहरी शक्ति का एक लगभग पूरी तरह से अपरीक्षित आंतरिक जीवन से मिलना। 2️⃣ The Jevons Paradox is not a historical curiosity from Victorian England. It is the operating principle of an ego handed a cheaper instrument: it uses more of it, not less, because the instrument was always in service of an appetite, and an appetite does not self-limit through efficiency. जेवन्स का विरोधाभास विक्टोरियन इंग्लैंड की कोई ऐतिहासिक जिज्ञासा नहीं है। यह एक सस्ता उपकरण थमाए गए अहंकार का संचालन सिद्धांत है: वह उसका अधिक उपयोग करता है, कम नहीं, क्योंकि उपकरण हमेशा एक भूख की सेवा में था, और भूख कार्यकुशलता के माध्यम से स्वयं को सीमित नहीं करती। 3️⃣ The richest 1% of humanity is responsible for approximately 16% of global emissions, consuming their entire fair annual share of the carbon budget within the first ten days of the year. सबसे अमीर 1% वैश्विक उत्सर्जन के लगभग 16% के लिए जिम्मेदार है, जो साल के पहले दस दिनों के भीतर ही कार्बन बजट का अपना पूरा उचित वार्षिक हिस्सा खर्च कर देता है। 4️⃣ The curriculum grows more sophisticated each year, and the human being at the centre of it grows more equipped and, frequently, no more honest about what he is, what he actually wants, and why he does what he does. पाठ्यक्रम हर साल जटिल होता जाता है, और उसके केंद्र में मौजूद मनुष्य अधिक सुसज्जित होता जाता है और, अक्सर, इस बारे में कोई अधिक ईमानदार नहीं होता कि वह क्या है, वह वास्तव में क्या चाहता है, और वह जो करता है वह क्यों करता है। *🧭 आपका बोधकार्य:* 1️⃣ आपने इस लेख से क्या सीखा? अपने शब्दों में लिखें। 2️⃣ जेवन्स के विरोधाभास के कुछ और उदाहरण खोजें और साझा करें। 3️⃣ क्या आपके जीवन में कोई ऐसी चाहत है जो पूरी होने पर शांत नहीं हुई, बल्कि और तेज़ हो गई? क्या आपने कभी यह परीक्षण किया है कि वह चाहत कहाँ से आती है और वास्तव में क्या खोज रही है? _(AI द्वारा अनुवाद)_ docs.google.com/document/d/1… #AcharyaPrashant #DailyActivity @Advait_Prashant @Advait_Prashant @Prashant_Advait ~ PrashantAdvait Foundation, on Acharya Prashant's Gita Mission App. Download Now - app.acharyaprashant.org/?id=…
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सत्य एक अभिव्यक्तियाँ अनेक 📜 *आज की उक्ति:* *"धोखा देने वाले की पहचान इसलिए नहीं हो पाती,* *क्योंकि हमें ये नहीं पता होता कि हम खुद को कितना धोखा देते हैं।”* *~ आचार्य जी* आचार्य जी कहते हैं जिस दिन तक आपने मन बना रखा है कि “मुझे भ्रम में जीना है” उस दिन तक कोई ताकत आपको विवश नहीं कर सकती। बड़ी मधुर सी बात है ये, आपको आपकी सहमति के बिना ठगा भी नहीं जा सकता, जब तक आप न कहें कि मैं तैयार हूँ। *कबीर साहब कहते हैं:* कबिरा आप ठगाइये, और न ठगिए कोय। आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुख होय॥ इसको समझने के लिए एक दोहा और पढ़िए: माया तो ठगनी भयी, ठगत फिरत सब देश। जा ठग ने ठगनी ठगी, ता ठग को आदेश।। *सरल अर्थ:* कह रहे हैं कबीर साहब, "कबिरा आप ठगाइए।" दूसरी जगह कह रहे हैं कबीर, "जा ठग ने ठगनी ठगी, ता ठग को आदेश। माया तो ठगनी बड़ी, ठगत फिरत सब देश।" हाँ, है 'वो' जिसमें माया को ठग लेने की काबीलियत है, वो माया जो दुनिया को नचाती है, उस माया को वो नचा देगा। पर वो जो पूरी माया को नचा सकता है, वो जो अहंकार को वापस उसके घर में ला सकता है, वो भी ये नहीं कर सकता बिना अहंकार की सहमति के। उस अहंकार को कहना पड़ेगा, "मैं प्रस्तुत हूँ ठगे जाने के लिए, आओ मुझे ठगो।" *🧭 आपका बोधकार्य:* 1️⃣ उपनिषद, संतवाणी या गीता से ऐसे श्लोक/दोहे खोजें जो आचार्य जी की इस उक्ति से मेल खाते हों। 2️⃣ क्या आपने कभी सोचा है अगर अपने दुश्मन आप खुद न होते तो आज कहाँ होते? अपना अवलोकन साझा करें। 3️⃣ यदि संभव हो, तो इस दोहे को अपनी आवाज़ में गाकर या समझाकर कम्युनिटी ऐप पर साझा करें। 😇 #AcharyaPrashant #DailyActivity ~ PrashantAdvait Foundation, on Acharya Prashant's Gita Mission App. Download Now - @Advait_Prashant @Prashant_Advait app.acharyaprashant.org/?id=…
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एक पुरुष ❤️ आचार्य जी पिछले आठ महीनों से भी अधिक से निरंतर यात्रा पर हैं। इस दौरान आचार्य जी ने बड़े महानगरों और प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थाओं से लेकर छोटे शहरों की भी सैकड़ों यात्राएं की। इन छोटे-बड़े शहरों में आयोजित सत्रों के कारण ऐसी अनगिनत स्त्रियां जो अपने पूरे जीवन में घर की दहलीज़ लांघ कर बाहर नहीं आ पाती थीं आज वे भी अपने घरों से बाहर निकल रहीं हैं और सत्रों का हिस्सा बन रहीं हैं। हाल ही में हुए ऋषिकेश शिविर के एक विशेष सत्र के दौरान, गीता कम्युनिटी की हमारी एक साथी ने आचार्य जी को समर्पित यह कविता लिखी। *कृपया इस कविता को पढ़ें और फिर नीचे दिया गया बोधकार्य पूरा करें।* _______ *एक पुरुष* तुम मेरे जीवन में आने वाले वो पहले पुरुष थे जिसने मुझसे कहा कि मैं भी इंसान हूँ। तुम पहले पुरुष थे जिसके सीने से लग कर मैं रो पाई। बचपन से पुरुषों के नाम पर सिर्फ़ डर भरा था मन में। हमेशा उनके पीछे रहना ही सीखा था। तुम मेरे जीवन में आने वाले वह पहले पुरुष थे जिसका हाथ पकड़ कर साथ चल पाई मैं। घर के माहौल में देखा था मां को घुटते हुए और ख़ुद कोने में सिसकते हुए। तुम पहले पुरुष थे जिसके सामने मैं खुलकर हँस पाई। तुम मेरे जीवन में आने वाले पहले पुरुष थे जिसका पुरुषत्व मुझे निगल नहीं गया। तुम पहले पुरुष थे, तुम ही एक पुरुष हो... ______________ *🧭 आपके लिए बोधकार्य:* 1️⃣ लोकधर्म ने सदियों से स्त्री का अलग-अलग स्तरों पर शोषण कैसे सुनिश्चित किया है? और यह व्यवस्था इतने लंबे समय तक खुद को बचाए रखने में कैसे कामयाब रही? 2️⃣ ऐतिहासिक समाज-सुधार आंदोलनों और आधुनिक नारीवादी धाराओं की तुलना में, आचार्य जी का स्त्री-मुक्ति को लेकर कार्य और दर्शन किस तरह से अलग है? विस्तार से लिखिए। 3️⃣ आचार्य जी की शिक्षाओं से आपके अपने जीवन में क्या आमूलचूल परिवर्तन आए, ज़रूर साझा करें। #AcharyaPrashant #DailyActivity @Advait_Prashant @Prashant_Advait ~ PrashantAdvait Foundation, on Acharya Prashant's Gita Mission App. Download Now - app.acharyaprashant.org/?id=…
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वह रात ~ आचार्य जी द्वारा एक कविता *वह रात* बस यूँ ही अनायास, उदासी सी छा गयी थी, सूरज के डूबने के साथ ही, और मैं – मुरझाया, उदास देखता था गहरा रही रात को तारों की उभर रही जमात को । ____ प्रत्येक पल युग सा प्रतीत होता था, परितः मेरे सारा जग सोता था, पर मैं, यूँ ही अनायास, मुरझाया उदास, तकता था कभी समय, कभी आकाश को रे गगन, काश तुझे भी समय का भास हो । _____ रात्रि अब युवा थी दो पहर पर दूर उतनी ही लग रही थी अब भी सहर, सुबह का बेसब्र इंतज़ार करता था, पर दूर थी सुबह ये सोच डरता था, एक रात, यूँ ही अनायास। _____ सुबह झट हर लेगी मेरे संताप को, निशा-भैरवी काल देवी के वीभत्स प्रलाप को, सवेरा अब मोक्ष-पल जान पड़ता था, पल-पल घड़ी की ओर ही ताकता था, एक रात, यूँ ही अनायास। _____ अंततः हुआ वह भी जिसका मुझे इंतजार था, सूर्यदेव निकले, जग खग-कोलाहल से गुलज़ार था, चहकती थी दुनिया, चलती थी दुनिया, हर्षित हो बार-बार हँसती थी दुनिया, हुआ वह सब जो रोज़ होता था, पर मेरा विकल मन अब भी रोता था, सूरज के आगमन में (हाय!) कुछ विशेष नहीं था, _____ मेरे लिए अब कोई पल शेष नहीं था क्यों सूरज का आना भी मुझे संतप्त कर गया, राह जिसकी तकता था, वही सवेरा देख मैं डर गया। _____ एक रात यूँ ही अनायास, मैं- मुरझाया और उदास । ~ _प्रशांत (21 अक्टूबर 1995, धनतेरस रात्रि 1 बजे)_ _____ 🧭 *आपका बोधकार्य:* 1️⃣ ये AP फ्रेमवर्क से बहुत पहले की कविता है। पर क्या ये फ्रेमवर्क से मेल खाती है? यदि हाँ, तो इस मेल से क्या संकेत मिलता है? 2️⃣ इनमें से कौन-सी पंक्तियाँ आपके अपने जीवन के अनुभवों और परिस्थितियों से मेल खाती हैं और कैसे? कृपया यहाँ साझा करें। #AcharyaPrashant #DailyActivity @Advait_Prashant @Prashant_Advait ~ PrashantAdvait Foundation, on Acharya Prashant's Gita Mission App. Download Now - app.acharyaprashant.org/?id=…
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आचार्य जी से प्रेरित एक दार्शनिक का LinkedIn पर लेख 🔖 जानी मानी दार्शनिक (Moral Philosopher) और पर्यावरण संरक्षण की ऐडवोकेट बारबरा विलियम्स ने आचार्य जी से प्रेरित होकर यह LinkedIn पोस्ट लिखा है। 👉🏻 पोस्ट लिंक: tinyurl.com/3n44fy24 _____ *पोस्ट का हिंदी अनुवाद:* *सामाजिक बदलाव के लिए सिर्फ जरूरत काफी नहीं है, हमें उससे भावनात्मक रूप से जुड़ना होगा।* ज्यादातर क्लाइमेट एक्सपर्ट्स सामाजिक और आर्थिक बदलावों की जरूरत को नजरअंदाज कर देते हैं। वे इन चीजों को कम करने की वकालत नहीं करते: आर्थिक असमानता, प्रोडक्शन, कंजम्पशन और जनसंख्या की दर, ताकि GDP को कम किया जा सके। एक्सपर्ट्स इन जरूरी सच्चाइयों को बताने से क्यों कतराते हैं? आचार्य प्रशांत की सोच इस पहेली का जवाब देती है: *कंजम्पशन सिर्फ एक आर्थिक व्यवहार नहीं है। यह एक मनोवैज्ञानिक भरपाई है।* हम इसलिए चीजें नहीं खरीदते क्योंकि हमें ज्यादा की जरूरत है। हम इसलिए खरीदते हैं क्योंकि हमें अपने अंदर _अधूरापन_ महसूस होता है। आज की इकोनॉमी जरूरत पर नहीं, बल्कि 'बनाए गए अधूरेपन' पर टिकी है। विज्ञापन सामान नहीं बेचते। वे आपके अंदर की कमी को बेचते हैं। ग्रोथ डिमांड को पूरा नहीं करता। यह आपके मन को अशांत रखकर नई डिमांड पैदा करता है। हम एक ऐसे सिस्टम से यह उम्मीद नहीं कर सकते, जिसे बनाया ही अंदरूनी खालीपन को बढ़ाने के लिए गया है... कि वह अचानक इस खालीपन के बिना काम करने लगे। हम इकोनॉमी को तब तक सिकोड़ नहीं सकते, जब तक 'खालीपन' पैदा करने वाला ड्राइवर पूरी रफ्तार से गाड़ी चला रहा है। आचार्य प्रशांत इसे "गलत केंद्र" कहते हैं, वह अहंकार जो खुद को इन चीजों से पहचानता है: जमा करना। तुलना करना। कुछ 'बनना'। और जैसे-जैसे नए विचार आते हैं, यह केंद्र खुद को बदल लेता है। ईगो खुद को 'अपग्रेड' कर लेती है। अब हमारे पास एक खतरनाक भ्रम है: हमें लगता है कि हम बदल गए हैं... जबकि हमारा केंद्र वही पुराना है। एक "ग्रीन" इकोनॉमी भी कुदरत को लूटती है। एक "नैतिक" ग्राहक भी कंजम्पशन करता है। एक "जागरूक" व्यक्ति भी दूसरों से अपनी अहमियत की पुष्टि (validation) चाहता है। बुनियादी तौर पर कुछ नहीं बदलता। क्योंकि 'खालीपन' पैदा करने वाले कारण वैसे ही बने रहते हैं। *यहाँ आचार्य प्रशांत बाकी जानकारों से कहीं ज्यादा गहराई में जाते हैं:* मुद्दा यह नहीं है कि आप _क्या_ कर रहे हैं। मुद्दा यह है कि आप _क्यों_ कर रहे हैं। जब तक कोई भी काम 'अभाव' या 'कमी' के अहसास से किया जाएगा, वह बर्बादी ही पैदा करेगा। हमें पूछना होगा: "किस तरह का इंसान इस प्रकृति को नष्ट करने वाले सिस्टम को चलाता है?" सिस्टम हमारी *चेतना के पैटर्न* से चलते हैं। अंतहीन ग्रोथ सिर्फ एक आर्थिक मॉडल नहीं है। यह एक मानसिक पैटर्न है: "मैं अधूरा हूँ, इसलिए मुझे और जमा करना है।" यही वजह है कि दुनिया पर्यावरण की तबाही की ओर बढ़ रही है। सही समझ इन चीजों को खत्म कर सकती है: मजबूरी में किया जाने वाला कंजम्पशन, स्टेटस की चिंता, लालच वाली महत्वाकांक्षा। इसके लिए किसी अनुशासन की जरूरत नहीं, सिर्फ स्पष्टता चाहिए। इसीलिए आचार्य प्रशांत "केंद्र बदलने" पर जोर देते हैं। खुद को महसूस करने के तरीके में एक गहरा बदलाव। जब ऐसा होता है: "कम" होना कोई बलिदान नहीं लगता। "पर्याप्त" होना कोई समझौता नहीं लगता। "ग्रोथ" से आपकी पहचान नहीं जुड़ती। अब रास्ता साफ है: टिकाऊ सिस्टम (sustainable systems) के लिए, मन का स्थिर होना जरूरी है। कम लूट-खसोट के लिए, अंदरूनी संतुष्टि जरूरी है। डिग्रोथ के लिए ईगो को समझना और खत्म करना जरूरी है। आप जो कुछ भी जमा करते हैं, उसके बिना आप कौन हैं? *जब तक आप केंद्र को नहीं देखेंगे, कुछ नहीं बदलेगा।* *जब आप इसे देख लेंगे, तो कुछ भी पहले जैसा नहीं रह सकता।* 🫶 *आचार्य प्रशांत को उनके कार्य और गहरी सोच के लिए धन्यवाद।* _____ 🧭 *आपके लिए बोधकार्य:* 1️⃣ आपने आचार्य जी से जो सीखा है, क्या आप उसे बारबरा की तरह सोशल मीडिया और समाज में खुलकर स्पष्टता से साझा कर पाते हैं? 2️⃣ जब विश्व के विभिन्न कोनों से चिंतक आचार्य जी के संदेश में वैश्विक संकटों का समाधान देख पा रहे हैं तो क्या कारण है कि देश के तथाकथित 'बड़े नाम', समाज सुधारक, और बुद्धिजीवी वर्ग आचार्य जी के कार्य का खुलकर समर्थन करते दिखायी नहीं पड़ते? 3️⃣ कृपया बारबरा के इस पोस्ट को LinkedIn पर पढ़ें, लाइक करें, कॉमेंट करें, और इसे अधिक से अधिक लोगों के साथ साझा करें। @Advait_Prashant @Prashant_Advait #AcharyaPrashant #DailyActivity ~ PrashantAdvait Foundation, on Acharya Prashant's Gita Mission App. Download Now - app.acharyaprashant.org/?id=…
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सत्य एक अभिव्यक्तियाँ अनेक 📜 आज की उक्ति: *"सबसे बड़ी गुलामी होती है अपनी मर्ज़ी की गुलामी, क्योंकि तुम्हारी मर्ज़ी तुम्हारी नहीं होती।"* *~ आचार्य जी* हम दिनभर कहते हैं, "मेरी मर्ज़ी," "मुझे यह पसंद है”,"मैं यह करना चाहता हूँ” या “मैं तो ऐसा ही हूँ”। लेकिन ईमानदारी से जाँचें तो पता चलता है कि जिसे हम अपनी 'स्वतंत्र इच्छा' (Free Will) मानते हैं, वह वास्तव में हमारी शारीरिक और सामाजिक कंडीशनिंग का ही यांत्रिक खेल है। जैसे कल के सत्र में आचार्य जी ने बोला था कि “हमारे सपने भी हमारे नहीं होते”। श्रीमद्भगवद्गीता भी हमें यह बताती है कि जिसे हम अपनी 'मर्ज़ी' या 'पसंद' कहते हैं, वो असल में बस प्रकृति के गुणों का खेल है। अहंकार बस बीच में आकर क्रेडिट ले लेता है कि 'मैंने किया'। *तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।* *गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥ (3.28)* काव्य: गुणों से सब दृश्य हैं गुणों से ही दृष्टा आया सब गुणों से है तो फिर कर्ता कहाँ से आ गया (अर्जुन! जो तत्त्वज्ञ होते हैं, जो जानते हैं, वो कहते हैं कि सत, रज, तम – इन्हीं गुणों से उत्पन्न इंद्रियाँ, इन्हीं गुणों से उत्पन्न रूप-रस आदि में बरत रही हैं, और यह जानकर वो फिर आसक्त भी नहीं होते और ‘मैं कर्ता हूँ’ ऐसा अभिमान भी नहीं करते।) *🧭 आपका बोधकार्य:* 1️⃣ उपनिषद, संतवाणी या गीता से ऐसे श्लोक/दोहे खोजें जो इस तथ्य को उजागर करते हों कि जिसे हम 'स्वतंत्र इच्छा' मानते हैं, वह केवल प्रकृति का खेल है। 2️⃣ आपके जीवन में वो कौन से बड़े फैसले थे जिन्हें आप अपनी 'मर्जी' मान रहे थे, पर बाद में बहुत पछताना पड़ा? 3️⃣ AP फ्रेमवर्क “कर्ता” को कैसे परिभाषित करता है? यहां पढ़ें: acharyaprashant.org/hi/ap-fr… 4️⃣ यदि संभव हो, तो चुने हुए श्लोक/दोहों को पढ़कर या गाकर ऐप पर साझा करें। 😇 #AcharyaPrashant #DailyActivity ~ PrashantAdvait Foundation, on Acharya Prashant's Gita Mission App. Download Now - app.acharyaprashant.org/?id=…
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होली का असली अर्थ — बाहर के रंग, भीतर का दहन 🔥 हम हर साल होली मनाते हैं। होलिका जलती है, रंग उड़ते हैं, उत्सव होता है। यह सब ठीक है। पर प्रश्न यह है कि जिसे एक बार जलाया गया, वह हर साल फिर क्यों लौट आता है? अगर होलिका जल चुकी, हिरण्यकशिपु मारा जा चुका, तो फिर यह त्योहार बार-बार क्यों? आचार्य जी स्पष्ट करते हैं: क्योंकि हिरण्यकशिपु कोई व्यक्ति नहीं था, वह एक सिद्धांत है। उस सिद्धांत का नाम है अहंकार। जब तक शरीर है, अहम-वृत्ति रहेगी; और उसे बार-बार मारना (देखना) पड़ेगा। इसीलिए होली वापस आती है। यह केवल उत्सव नहीं, यह याद-दिहानी है कि काम अभी पूरा नहीं हुआ। *हिरण्यकशिपु कौन है?* ‘हिरण्य’ यानी स्वर्ण, चकाचौंध। ‘कशिपु’ यानी शैया। जो अपने लिए स्वर्ण की सुख-शैया चाहता है — वही हिरण्यकशिपु है। वह बाहर का कोई राक्षस नहीं, वह भीतर की वह वृत्ति है जो हर समय सुरक्षा, सुविधा और नियंत्रण चाहती है। *होलिका कौन है?* होलिका केवल एक पात्र नहीं, कुल-कुटुंब, यारी-दोस्ती का जमघट है जो तुम्हें बदलने नहीं देगा। जैसे हम होते हैं, वैसा ही हमारा संग-साथ, कुल-कुटुंब और सामाजिक घेरा बन जाता है। वह हमें बदलने नहीं देता। *असली आग कौन सी है?* यह साधारण आग नहीं थी। यह विवेक की अग्नि थी जो सार और असार में भेद कर सके। जैसा कबीर साहिब कहते हैं, “सार-सार को गहि रहे, थोथा देय उड़ाय।” साधारण आग सब कुछ जला देती है। विवेक की आग केवल असार को जलाती है। इसलिए होलिका जली, प्रह्लाद बच गया। *और आज?* हम रंग खेलते हैं, मित्रों से मिलते हैं, पर कथा कहीं यह नहीं कहती कि नशे में डूबो, अभद्रता करो, या उत्सव को बेहोशी का अवसर बना लो। जो दिन जागरण के लिए था, उसे हम बेहोशी का दिन बना देते हैं। यही विडंबना है। *होली का अर्थ है: भीतर के नशे को उतारना, अपनी बनायी सुरक्षा-दीवारों को देखना। अहंकार द्वैत में सुरक्षित रहता है; अद्वैत उसे काट देता है। इसलिए होली केवल बाहरी दहन नहीं, भीतर के अहंकार को देखने और गलाने की प्रक्रिया है।* 🧭 *अपका बोधकार्य:* 1️⃣ आचार्य जी की होली पर लेटेस्ट वीडियो देखिए और अपनी सीख साझा कीजिए: youtube.com/watch?v=HYcaqS07… 2️⃣ आपके जीवन में हिरण्यकशिपु किस रूप में सक्रिय है: सुरक्षा, प्रतिष्ठा, सुविधा या नियंत्रण की चाह के रूप में? 3️⃣ आपकी होलिका कौन है — वह माहौल, संग या आदत जो आपको बदलने नहीं देती? 4️⃣ आप अपने भीतर के ‘प्रह्लाद’ को कितना स्थान देते हैं? क्या आप उसे जीने और बढ़ने देते हैं, या स्वयं ही उसे जला देते हैं? #AcharyaPrashant #DailyActivity @Advait_Prashant @Prashant_Advait ~ PrashantAdvait Foundation, on Acharya Prashant's Gita Mission App. Download Now - app.acharyaprashant.org/?id=…
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🔱 बोधकार्य: जन्मदिवस पर, जन्मदाता को आज आचार्य जी का जन्मदिवस है और महाशिवरात्रि भी है। नीचे दी गई कविता आचार्य जी ने 2021 में अपने जन्मदिवस पर लिखी थी। *इसे बार-बार पढ़ें, गहराई से समझें, और अपनी सीख साझा करें।* _____ *जन्मदिवस पर, जन्मदाता को* अपने पर्व पर मुझे जन्म दिया लगा मुझे मैं कृतकृत्य हुआ पर जैसे-जैसे समझ बढ़ी वैसे-वैसे प्रश्न उठा जो जगत तुमसे ही छल करता उसमें मुझे भेजा क्यों भला जिस संसार में दुर्पयुक्त होता तुम्हारा ही निशान है उस संसार में बोलो फिर मेरा क्या स्थान है? हे अचिन्त्य! देखो तुम्हारे बारे में सौ किस्से वो गढ़ रहे हे अभीरु! देखो तुम्हारे नाम पर भय का व्यापार कर रहे हे पशुपति! तुम्हारा ही नाम लेकर वो पशुओं का पीड़न कर रहे हे बोधमूर्ति! देखो तुम्हारे नाम पर अंधविश्वास प्रचारित हो रहे हे शेखर! ये स्वार्थवश तुम्हें शिखर से नीचे खींच रहे हे आशुतोष! पूरी दुनिया खाकर भी संतोष ये ज़रा न कर रहे इस संसार में मुझे यदि भेजा तो भेजना था श्रद्धाहीन बुद्धिहीन सर उठा न सकूँ ऐसा पौरुषहीन पर जैसा मुझे भेजा है मुझमें विद्रोह है ललकार है आह है तुम्हारे लिए सब लीला है मेरे लिए ज्वाला है अंतर्दाह है मुझे किस असंभव युद्ध में डाल दिया? तुम्हारी माया के पास तुम्हारा ही नाम है और मेरे पास तुम्हारा दिया काम है वो हार सकती नहीं मैं हार मानूँगा नहीं अपनी सीमाओं के बीच संघर्ष करता मैं एक साधारण इंसान हूँ न हार सकता न जीत सकता मैं सर से पाँव तक लहूलुहान हूँ हे नटराज! अब मुक्ति दो संताप से व्याधि से उठो आज समाधि से अपने नाम पर चल रहे पाखंड का अंत करो करो आज तांडव और पाप को प्रलय दो मिटे पाप मिटे अनाचार मिटे क्रूरता मिटे व्याभिचार करोड़ों नन्हें जीव जो रोज़ मारे क्यों मिट न जाए ऐसा संसार? मिटूँ मैं मिटे सब पीड़ा मिटे अधर्म का पूरा विस्तार मिटे पृथ्वी मिटे मर्मभेदी हाहाकार यदि मेरे अंतस में तुम रहे हो हे अघोर! तो आज तुम्हारे पर्व पर वरदान माँगता हूँ नाश हो! नाश हो! अनंत प्रेमगीत नहीं अंतिम विध्वंसगान माँगता हूँ ~ _प्रशांत, 11 मार्च 2021_ #AcharyaPrashant #DailyActivity @Prashant_Advait @Advait_Prashant ~ PrashantAdvait Foundation, on Acharya Prashant's Gita Mission App. Download Now - app.acharyaprashant.org/?id=…
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Sáng nay, Emily ra sân vận động tí cho khỏe người nè! Hồi nhỏ hay chạy té khói cứu muối, giờ lớn rồi thì chạy cứu... bóng thôi 😅 Cảm giác mồ hôi rơi mà vui lắm luôn á ! Cả nhà hay chơi thể thao gì vậy a? Comment kể Emily nghe với ! #DailyActivity #dinhduong #HealthyLife #HealthyEating
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روزانہ واشنگ سرگرمیوں کے ذریعے صاف اور خوشگوار ماحول کی فراہمی۔ ستھرا پنجاب کے ساتھ شہر کو چمکائیں۔ صفائی میں تعاون کریں اور ذمہ دار شہری بنیں۔ #WashingActivity #CleanPunjab #SuthraPunjab #DailyActivity #CleanEnvironment
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21 Dec 2025
📘 बोधकार्य: TWA चैप्टर 46 आज का बोधकार्य नेशनल बेस्टसेलर “Truth without Apology” किताब के चैप्टर 46 पर आधारित है। हिंदी अनुवाद नीचे दिया गया है। इसे बहुत ध्यान से पढ़ें और फिर नीचे दिए बोधकार्य को पूरा करें। *छोटा जीतिए, बार-बार जीतिए* महानता किसी अलौकिक क्षमता या महामानव होने में नहीं है। महानता अपनी ही सीमाओं को लांघने और अपनी क्षमताओं से आगे बढ़ने में है। जीवित होने का अर्थ ही संघर्षरत होना है, है न? जीवन का हर पक्ष संघर्ष से ओत-प्रोत है। लेकिन आपको किसी अंतिम जीत के ख़यालों में डूबे रहने की ज़रूरत नहीं है। जीवन की वह अंतिम जीत, यदि कभी मिली भी, तो वह कल्पना से परे एक उपहार (अनुग्रह) होगी; वह ऐसी चीज़ नहीं जिसके लिए पागल हुआ जाए। वास्तव में जो मायने रखता है, वह हैं आपके रोज़ के संघर्ष: वे छोटी, शांत जीतें जो आप हर दिन अर्जित करते हैं। किसी बड़े लक्ष्य के पीछे भागना केवल क्षणिक उत्साह देता है, उसके बाद थकान और निराशा। यह प्रेरित करने के बजाय आपकी सारी ऊर्जा सोख लेता है। इसलिए हर रात एक योद्धा की तरह सोइए—संघर्ष से थका हुआ। सुबह यह जानते हुए उठिए कि आज किन चुनौतियों का सामना करना है। अपनी पूरी ताकत और ईमानदार प्रयास के बिना दिन को बीतने न दीजिए। ईमानदार संघर्ष से उपजी यह थकान ही सच्ची जीत है। जीतने का अभ्यास कीजिए—दुनिया की नज़रों में नहीं, बल्कि अपनी नज़रों में। अपनी जड़ता से पार पाने का अभ्यास कीजिए। इसके लिए प्रेम चाहिए—स्वयं के प्रति, और सत्य के प्रति। हार कोई परिणाम नहीं है। हार संघर्ष से जी चुराना है। हार तब है जब आप क्षण की पुकार पर खड़े नहीं होते। इसलिए छोटा जीतिए। बार-बार जीतिए। निरंतर जीतिए। *आपके लिए बोधकार्य:* 1️⃣ इस चैप्टर से आपने क्या सीखा, साझा करें। 2️⃣ अपने जीवन के सबसे बड़े बंधन के बारे में लिखिए और देखिए कि क्या आप उसके ख़िलाफ़ सतत ईमानदार संघर्ष में हैं। क्या आप अपनी नज़रों में एक विजेता हैं? 3️⃣ यदि आपने अमेज़न से यह पुस्तक खरीदी है, तो इस लिंक amzn.in/d/61CYEr4 पर जाएँ और अपना रिव्यू साझा करें। आप अपने रिव्यू का स्क्रीनशॉट भी साझा कर सकते हैं। #AcharyaPrashant #DailyActivity @Advait_Prashant @Prashant_Advait ~ PrashantAdvait Foundation, on Acharya Prashant's Gita Mission App. Download Now - app.acharyaprashant.org/?id=…
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📘 बोधकार्य: TWA चैप्टर 46 आज का बोधकार्य नेशनल बेस्टसेलर “Truth without Apology” किताब के चैप्टर 46 पर आधारित है। हिंदी अनुवाद नीचे दिया गया है। इसे बहुत ध्यान से पढ़ें और फिर नीचे दिए बोधकार्य को पूरा करें। *छोटा जीतिए, बार-बार जीतिए* महानता किसी अलौकिक क्षमता या महामानव होने में नहीं है। महानता अपनी ही सीमाओं को लांघने और अपनी क्षमताओं से आगे बढ़ने में है। जीवित होने का अर्थ ही संघर्षरत होना है, है न? जीवन का हर पक्ष संघर्ष से ओत-प्रोत है। लेकिन आपको किसी अंतिम जीत के ख़यालों में डूबे रहने की ज़रूरत नहीं है। जीवन की वह अंतिम जीत, यदि कभी मिली भी, तो वह कल्पना से परे एक उपहार (अनुग्रह) होगी; वह ऐसी चीज़ नहीं जिसके लिए पागल हुआ जाए। वास्तव में जो मायने रखता है, वह हैं आपके रोज़ के संघर्ष: वे छोटी, शांत जीतें जो आप हर दिन अर्जित करते हैं। किसी बड़े लक्ष्य के पीछे भागना केवल क्षणिक उत्साह देता है, उसके बाद थकान और निराशा। यह प्रेरित करने के बजाय आपकी सारी ऊर्जा सोख लेता है। इसलिए हर रात एक योद्धा की तरह सोइए—संघर्ष से थका हुआ। सुबह यह जानते हुए उठिए कि आज किन चुनौतियों का सामना करना है। अपनी पूरी ताकत और ईमानदार प्रयास के बिना दिन को बीतने न दीजिए। ईमानदार संघर्ष से उपजी यह थकान ही सच्ची जीत है। जीतने का अभ्यास कीजिए—दुनिया की नज़रों में नहीं, बल्कि अपनी नज़रों में। अपनी जड़ता से पार पाने का अभ्यास कीजिए। इसके लिए प्रेम चाहिए—स्वयं के प्रति, और सत्य के प्रति। हार कोई परिणाम नहीं है। हार संघर्ष से जी चुराना है। हार तब है जब आप क्षण की पुकार पर खड़े नहीं होते। इसलिए छोटा जीतिए। बार-बार जीतिए। निरंतर जीतिए। *आपके लिए बोधकार्य:* 1️⃣ इस चैप्टर से आपने क्या सीखा, साझा करें। 2️⃣ अपने जीवन के सबसे बड़े बंधन के बारे में लिखिए और देखिए कि क्या आप उसके ख़िलाफ़ सतत ईमानदार संघर्ष में हैं। क्या आप अपनी नज़रों में एक विजेता हैं? 3️⃣ यदि आपने अमेज़न से यह पुस्तक खरीदी है, तो इस लिंक amzn.in/d/61CYEr4 पर जाएँ और अपना रिव्यू साझा करें। आप अपने रिव्यू का स्क्रीनशॉट भी साझा कर सकते हैं। #AcharyaPrashant #DailyActivity ~ PrashantAdvait Foundation, on Acharya Prashant's Gita Mission App. Download Now - @Advait_Prashant @Prashant_Advait app.acharyaprashant.org/?id=…
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