#आज_की_बात ....."हिंदुत्व की दुकान, ब्राह्मण,संतों का अपमान"
"गौमाता और सनातन: वादों से विश्वासघात तक"
कथनी और करनी में अंतर ही छल का पहला लक्षण है। 2014 और 2019 में जब देश ने ‘गौमाता’, ‘सनातन धर्म’ और ‘हिंदुत्व’ के नाम पर एक कथित हिंदूवादी सरकार को पूर्ण बहुमत दिया, तब लगा कि अब शताब्दियों की प्रतीक्षा समाप्त हुई। लगा कि अब गौहत्या बंद होगी, गौचर भूमि मुक्त होगी, मंदिर सरकारी नियंत्रण से आज़ाद होंगे, और शंकराचार्य परंपरा को उसका खोया हुआ सम्मान मिलेगा।
12 साल बाद हिसाब कीजिए, मिला क्या?
गौमाता: नारे में माता, नीति में व्यापार
गौरक्षा के नाम पर सत्ता में आई सरकार के राज में ही भारत बीफ निर्यात में दुनिया के शीर्ष देशों में बना रहा। ‘पिंक रेवोल्यूशन’ रुकने की जगह और तेज हुआ। गौचर भूमि आज भी बिल्डरों और भू-माफियाओं के कब्जे में है। करोड़ों गौवंश सड़कों पर प्लास्टिक खाने को मजबूर हैं, जबकि गौशालाओं के नाम पर आवंटित अरबों रुपए की फाइलें सरकारी दफ्तरों में धूल खा रही हैं।
गौहत्या बंदी कानून बना, पर गौहत्या बंद नहीं हुई। कानून कागज पर है, कत्लखाने जमीन पर चल रहे हैं। गौरक्षकों को ‘गुंडा’ कहा गया, लेकिन गौतस्करों पर बुलडोजर कब चला?
सनातन धर्म: वोट के लिए धर्म, सत्ता के लिए अधर्म
जिस सरकार ने ‘सनातन धर्म की रक्षा’ का वादा किया, उसी के राज में माघ मेले में बटुक ब्राह्मणों की शिखा पकड़कर पुलिस के जूते पड़े। जिस शंकराचार्य परंपरा को आदि शंकर ने स्थापित किया, उसी परंपरा के जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद: सरस्वती जी का सार्वजनिक मंच से अपमान हुआ।
चारों शंकराचार्यों को ‘राजनीतिक’ कहकर खारिज कर दिया गया*, क्योंकि उन्होंने सत्ता से सवाल पूछने का पाप कर दिया। याद रखिए, शंकराचार्य किसी दल के नहीं होते, वे धर्म के होते हैं। जब धर्माचार्य ही असुरक्षित हो जाएं, तो समझ लीजिए धर्म खतरे में है।
मंदिर आज भी सरकारी कब्जे में हैं। तमिलनाडु से लेकर उत्तराखंड तक, हिंदू मंदिरों का चढ़ावा सरकार के खजाने में जाता है, जबकि चर्च और वक्फ बोर्ड अपनी संपत्ति के खुद मालिक हैं। ये कैसा हिंदू राज है जहाँ भगवान भी सरकारी कर्मचारी बन गए?
सबसे बड़ा छल: भावना का सौदा
राम मंदिर बना, अच्छी बात है। लेकिन राम के नाम पर वोट लेकर, राम के आदर्शों को ही भूल जाना सबसे बड़ा धोखा है। रामराज्य में संवाद था, यहाँ सवाल पूछने पर देशद्रोह का मुकदमा है। रामराज्य में ऋषियों का सम्मान था, यहाँ शंकराचार्य का अपमान है। रामराज्य में गौमाता पूज्य थी, यहाँ गौमाता चुनावी पोस्टर तक सीमित है।
यह सरकार हिंदुओं की भावना को ATM समझती है—जब जरूरत हो, धर्म का कार्ड निकालो, वोट डालो, और फिर 5 साल के लिए भूल जाओ।
निष्कर्ष: अब जागने का समय है
मुगलों ने मंदिर तोड़े तो हमें पता था दुश्मन कौन है। अंग्रेजों ने गुरुकुल बंद किए तो लड़ाई साफ थी। लेकिन जब ‘अपने’ ही धर्म के नाम पर सत्ता लेकर धर्म को ही नीलाम कर दें, तो यह चोट सबसे गहरी होती है।
सनातन धर्म किसी पार्टी की बपौती नहीं है। गौमाता किसी दल का चुनाव चिह्न नहीं है। जो आज इनके नाम पर सत्ता भोग रहे हैं और इन्हीं का अपमान कर रहे हैं, इतिहास उन्हें कभी क्षमा नहीं करेगा।
सवाल सरकार से नहीं, खुद से पूछिए: क्या हमने वोट धर्म बचाने के लिए दिया था या धर्म बेचने वालों को जिताने के लिए?
अगर आज नहीं बोले, तो कल मंदिरों में घंटी नहीं, मातम की चीखें सुनाई देंगी। क्योंकि जो कौम अपने धर्माचार्यों का अपमान सह लेती है, उसका पतन निश्चित है।
॥ धर्मो रक्षति रक्षितः ॥
जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। और जो धर्म के नाम पर धोखा देता है, उसका विनाश भी धर्म ही करता है।
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जय गौमाता, जय सनातन धर्म 🚩
ब्राह्मण स्वाभिमान एकता मंच Jagadguru Shankaracharya Swami Shree Nishchalanand Saraswati Ji Jagadguru Shankaracharya Swaamishreeh Avimukteshwaraanandah Saraswatee 1008
1008.Guru Jagadguru Shankaracharya ji Maharaj Dwarka Sharada Peethadhishwar स्वामी प्रत्यक्चैतन्यमुकुन्दानन्द गिरिः जायसी पत्रिका समाचार Jaisi patrika news Jais Amethi 24 News
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