#शराब_नीति से लेकर हर फैसले पर
#बहस को तैयार हूं—हर निर्णय का सच जनता के सामने रखूंगा। ✊
चुनाव आ रहे हैं। निश्चित तौर पर आरोप-प्रत्यारोप लगेंगे। मगर मैं व्यक्तिगत तू-तू, मैं-मैं में नहीं फंसना चाहता हूं। 80 की दहलीज पर हूं। मैं अपनी पार्टी और उत्तराखंड के लिए पार्टीगत और राजनीतिक उपयोगिता का बहुत गहनता से विश्लेषण कर रहा हूं। निश्चित तौर पर इस विश्लेषण में शारीरिक क्षमता का विश्लेषण भी सम्मिलित है।
मेरे मन में एक इच्छा अवश्य प्रबल है। वह है उत्तराखंडियत को सबल और सक्षम बनते देखने की। मैंने अपनी सरकार के माध्यम से, अपने गहन अध्ययन व दूसरे देशों और राज्यों की अर्थव्यवस्थाओं के तुलनात्मक विश्लेषण के बाद, उत्तराखंडियत का एक रोडमैप राज्य में आगे बढ़ाने का प्रयास किया। मैंने लाखों लोगों की आकांक्षाओं को—चाहे वह संस्कृति का क्षेत्र हो, परिवेश का क्षेत्र हो, सार्वजनिक जीवन का क्षेत्र हो, किसी भी क्षेत्र में—उनकी समग्र सोच को एक राज्य की सामूहिकता प्रदान की।
मेरी सरकार की पहलों में से कई पहलें आज की सरकार भी संचालित कर रही है, कहीं नाम बदलकर तो कहीं पूरे स्वरूप में परिवर्तन लाकर, लेकिन कर रही है। और कभी-कभी मैं आज की सरकार के प्रयासों का आलोचनात्मक समर्थन करता हूं, जिस पर कभी-कभी पार्टी में मेरे ऊपर लोग सवाल भी खड़े कर देते हैं। लेकिन मैं अपनी सोच के मूल्य को केवल पार्टी तक सीमित नहीं मान रहा हूं। मैं उसे राज्य की आवश्यकता और लाखों-लाख उत्तराखंड के भाई-बहनों की आकांक्षा से जोड़कर देखता हूं।
जब आप कुछ प्रयास या प्रयोग प्रारंभ करते हैं, तो उनमें से कुछ प्रयोग असफल भी हो सकते हैं, कुछ प्रयोगों का दुरुपयोग भी हो सकता है।
#हमने_शराब_नीति को राज्य की बागवानी नीति के साथ जोड़ने का बहुत साहसपूर्ण कदम उठाया। कुछ लोगों की स्वार्थ भावना के कारण उसका दुरुपयोग भी हुआ। मुझ पर सवाल भी उठे। मैंने उन सवालों का जवाब भी दिया और तर्कपूर्ण जवाब दिया।
लेकिन जब मैं आज देखता हूं कि कुछ शक्तियां अपने को सही सिद्ध करने के लिए मुझ पर सार्वजनिक लांछन लगा रही हैं, तो रामायण के एक महान चरित्र जामवन्त की याद आ रही है। जामवन्त बूढ़े हो गए थे, लोगों को राय-परामर्श और उत्साह भी देते थे।
#युद्ध में जिसने भी उनको ललकारा, उसे अपने प्राण खोने पड़े। ललकारने वाला जो भी रहा हो, जामवन्त के चंगुल में आया, उसका हश्र बुरा हुआ।
मैं अपनी सरकार के किसी भी फैसले पर, अपने किसी व्यक्तिगत आचरण और मुख्यमंत्री के रूप में, सार्वजनिक बहस के लिए तैयार हूं। मगर इतना प्रत्येक व्यक्ति या संस्था को साफ-साफ समझ लेना चाहिए कि सूप कहे—सो कहे, छलनी क्या कहे, जिसमें सौ छेद!
#यदि_मुझे तू तू, मैं-मैं में घसीटोगे, तो फिर छननी के सौ छेद मुझे गिनवाने पड़ेंगे।
।। जय उत्तराखंड।। ✊
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