न्यायाधीशों का दायित्व टीवी बहसों में प्रतिक्रिया देना नहीं, बल्कि अदालत में संविधान और कानून की कसौटी पर अपनी बात रखना होता है।
वे अपने विचार फैसलों, टिप्पणियों और कानूनी तर्कों के माध्यम से व्यक्त करते हैं।
दुर्भाग्य से आज गंभीर संवैधानिक चर्चाएं भी सोशल मीडिया की ट्रोल संस्कृति और सतही मनोरंजन का हिस्सा बनती जा रही हैं।
Justice Surya Kant के बयान को लेकर जिस तरह की गलतफहमियां फैलाई गईं और उसके आधार पर ट्रोलिंग हुई, वह अनुचित है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि वे देश के योग्य और संघर्षरत बेरोजगार युवाओं की पीड़ा को समझते हैं, और उनका वक्तव्य एक अलग संदर्भ में था।
लोकतंत्र में सवाल और आलोचना महत्वपूर्ण हैं, लेकिन संवैधानिक संस्थाओं और न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखना भी हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।