गुरु की गोलक को ड्रिल से तोड़ने की तस्वीरों ने कई सवाल खड़े कर दिए है…
माया अगर मुफ्त में दूसरे के हाथ लग जाए तो उसे छोड़ना आसान नहीं होता, और फिर कोई न कोई ताकतवर व्यक्ति उस पर कब्ज़ा जमाने की कोशिश करता है…
आज
#पंजाब में छोटे-बड़े हजारो डेरे हैं… लगभग धर्म स्थल के पीछे राजनीतिक पहुंच, पुलिस से संबंध और सत्ता का सहारा दिखाई देता है… सच यह है कि बिना ताकत और संरक्षण के कई डेरे एक दिन भी नहीं चल सकते..
दूसरों की नजर हमेशा डेरे की जमीन, गोलक और प्रभाव पर रहती है… इसी लालच में कई बार विवाद, हिंसा और यहां तक कि गोलियां तक चल जाती हैं.. जब धर्मस्थल सेवा और आध्यात्मिकता की जगह शक्ति, पैसे और वर्चस्व की लड़ाई का केंद्र बन जाए, तो वह धीरे-धीरे निजी साम्राज्य जैसा बन जाता है…
विदेशों में भी कई निजी गुरुघरों की कमेटियों और प्रधानगी के लिए गुटबाजी, जोड़-तोड़ और ताकत का खेल देखने को मिलता है… अफसोस की बात यह है कि कई जगह धर्म पीछे छूट जाता है और कुर्सी, पैसा और प्रभाव सबसे आगे आ जाते हैं…
जहां धर्म से ज्यादा गोलक, कुर्सी और पावर की चिंता हो, वहां श्रद्धा नहीं, स्वार्थ राज करता है…
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