कुछ लोग इतिहास पढ़ते हैं कुछ इतिहास लिखते हैं कुछ इतिहास बनाते हैं।नेहरू ने इतिहास पढ़ा इतिहास लिखा और इतिहास बनाया इसलिए वो अद्वितीय थे हैं और रहेंगे।
जवाहरलाल नेहरू केवल स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नहीं थे, वे उस भारत के स्वप्नद्रष्टा थे जो सदियों की गुलामी के बाद आधुनिकता, विज्ञान, लोकतंत्र और आत्मविश्वास के साथ दुनिया के सामने खड़ा होना चाहता था।
महात्मा गांधी ने उन्हें हिन्द का जवाहर कहा था। यह संबोधन केवल स्नेह का प्रतीक नहीं था, बल्कि उस विश्वास की अभिव्यक्ति भी था जो गांधी जी को नेहरू की क्षमता, दृष्टि और नेतृत्व पर था।
गांधी समझते थे कि स्वतंत्र भारत को केवल राजनीतिक मुक्ति नहीं, बल्कि आधुनिक चेतना और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की भी आवश्यकता होगी।
उन्हें नेहरू में वह व्यक्तित्व दिखाई देता था जो परंपरा और आधुनिकता के बीच सेतु बन सकता था। हिन्द का जवाहर कहकर उन्होंने नेहरू को उस अनमोल रत्न के रूप में देखा जो राष्ट्र के मुकुट की शोभा बढ़ाता है।
रामधारी सिंह दिनकर जैसे राष्ट्रकवि ने उन्हें लोकदेव कहा। यह शब्द केवल प्रशंसा नहीं था। दिनकर जानते थे कि नेहरू की लोकप्रियता सत्ता से नहीं, जनता के विश्वास से उपजी थी।
स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों में गांवों, कस्बों और शहरों में लाखों लोग उन्हें देखने और सुनने उमड़ पड़ते थे। उनमें जनता को अपना भविष्य दिखाई देता था। वे राजनेता कम, जनआकांक्षाओं के प्रतिनिधि अधिक थे। इसलिए दिनकर ने उन्हें लोकदेव कहा जनता के हृदय में प्रतिष्ठित व्यक्तित्व।
सरदार वल्लभभाई पटेल ने भी नेहरू को जनता का प्रिय नेता माना। दोनों के बीच विचारों के मतभेद जगजाहिर थे, लेकिन राष्ट्रीय जीवन में नेहरू के महत्व को स्वयं पटेल ने स्वीकार किया।
वे जानते थे कि यह व्यक्ति भारत को केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं रखना चाहता, बल्कि उसे आधुनिक राष्ट्रों की अग्रिम पंक्ति में देखना चाहता है।
भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं, संसदीय परंपराओं और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा के निर्माण में नेहरू का योगदान एक बहुमूल्य रत्न की तरह था।
कविगुरु रवींद्रनाथ ठाकुर ने उन्हें ऋतुराज कहा। ऋतुराज नवजीवन, नवसृजन और नई चेतना का प्रतीक। कविगुरु ने नेहरू में उस नई पीढ़ी का प्रतिनिधि देखा जो अतीत का सम्मान करते हुए भविष्य की और बढ़ना चाहती थी।
नेहरू की दृष्टि केवल राजनीतिक नहीं थी उसमें संस्कृति, विज्ञान, साहित्य और मानवता का व्यापक संसार समाहित था। वे कारखानों को आधुनिक भारत के मंदिर कहते थे, लेकिन साथ ही बच्चों की मुस्कान, किताबों की दुनिया और कला की स्वतंत्रता को भी उतना ही महत्व देते थे
नेहरु ने स्वतंत्र भारत को लोकतंत्र पर विश्वास करना सिखाया। जब एशिया और अफ्रीका के अनेक नए राष्ट्र तानाशाही की और बढ़ रहे थे, तब भारत में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, स्वतंत्र चुनाव, स्वतंत्र न्यायपालिका और संसदीय व्यवस्था को मजबूती से स्थापित किया गया। यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं थी।
दुनिया के अनेक विद्वान उस समय आशंकित थे कि इतना विशाल, विविध और गरीब देश लोकतंत्र को संभाल नहीं पाएगा। लेकिन नेहरू ने लोकतंत्र को केवल शासन प्रणाली नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चरित्र का हिस्सा बनाने का प्रयास किया।
उन्होंने वैज्ञानिक सोच को राष्ट्रनिर्माण का आधार बनाया। बड़े बांध, इस्पात संयंत्र, वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थान, प्रौद्योगिकी संस्थान और विश्वविद्यालय ये सब केवल परियोजनाएं नहीं थीं। ये उस आधुनिक भारत की नींव थीं जिसकी कल्पना उन्होंने की थी। आज भारत जिस वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमता पर गर्व करता है, उसकी अनेक आधारशिलाएं नेहरू युग में रखी गईं।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी नेहरू ने भारत को एक स्वतंत्र आवाज़ दी। जब दुनिया दो गुटों में बंट रही थी, तब उन्होंने गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाकर भारत को अपनी शर्तों पर दुनिया से संवाद करने का साहस दिया। नवस्वतंत्र देशों के लिए वे आशा और आत्मसम्मान के प्रतीक बन गए।
निस्संदेह, नेहरू त्रुटिहीन नहीं थे। उनकी नीतियों, निर्णयों और राजनीतिक आकलनों पर बहस होती रही है और होती रहेगी। इतिहास का न्याय भी इसी में है कि वह किसी व्यक्ति को देवत्व नहीं देता, बल्कि उसके योगदान और सीमाओं दोनों का मूल्यांकन करता है।
परंतु यह भी उतना ही सत्य है कि नेहरू का कद केवल उनकी सफलताओं या असफलताओं से नहीं मापा जा सकता। उनका महत्व उस दृष्टि में था जिसने एक नवस्वतंत्र राष्ट्र को भविष्य की और देखने का साहस दिया।
इसलिए जब गांधी नेहरू को हिन्द का जवाहर कहते हैं, जब दिनकर उन्हें लोकदेव कहते हैं और जब रवींद्रनाथ उन्हें ऋतुराज कहते हैं, तो ये शब्द उस ऐतिहासिक स्वीकृति के प्रतीक हैं जो एक असाधारण व्यक्तित्व को मिली।
कुछ लोग अपने युग में रहते हैं, और कुछ लोग अपने युग को निर्माण करते हैं।
जवाहरलाल नेहरू उन लोगों में थे जो अपने युग का ख़ुद निर्माण करते है ।🌹