संसद देश के 145 करोड़ नागरिकों की आवाज है, 3,5,7 जजों की बेंच उसे दवा नहीं
सकती।
संसद के दोनों सदनों ने सर्व सम्मति से 2014 में 99वें संविधान संशोधन अधिनियम और राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) अधिनियम के साथ राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) का गठन किया था. इस आयोग का उद्देश्य कॉलेजियम प्रणाली के स्थान पर सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए एक स्वतंत्र आयोग बनाना था,
परंतु,
2015 में, सर्वोच्च न्यायालय ने 99वें संविधान संशोधन को असंवैधानिक घोषित कर दिया और NJAC को रद्द कर दिया. न्यायालय ने माना कि NJAC भारत के संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करता है और न्यायिक स्वतंत्रता को कमज़ोर करता है.
क्या यह संसद की सार्थकता पर प्रश्न खड़ा करने वाला मुद्दा नहीं है,
क्या ऐसी स्थिति में लोकतांत्रिक ढांचा ध्वस्त नहीं हो जाएगा।
फिर सर्वोच्च न्यायालय देश को यह क्यों नहीं बताता कि, संविधान की वह कौन सी धारा है जिसके अंतर्गत आपने कॉलेजियम सिस्टम बना लिया।
क्या कॉलेजियम सिस्टम भाई भतीजा और परिवारवाद को बढ़ावा नहीं देता है।
संविधान में विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका की सीमाएं निर्धारित हैं,फिर सीमांउल्लंघन क्यों होता है।
सर्वोच्च न्यायालय में बैठे माननीय न्यायमूर्तिगण इस पर कभी विचार नहीं करते कि देश के नागरिकों को पारदर्शी, सस्ता, सरल, सुलभ और शीघ्र न्याय मिले।
मेरे विधान परिषद के चुनाव के खिलाफ हाई कोर्ट इलाहाबाद में रिट याचिका थी, मेरे दिल में हाई कोर्ट ओर सुप्रीम कोर्ट के प्रति बड़ी उच्च धारणा थी कि डिस्ट्रिक्ट कोर्ट की तरह पेशकार आदि के द्वारा जज के पास बैठ कर पेशकार चुपके से कैसे वादी प्रतिवादी से उगाही करते हैं।
मै यह देख कर दंग रह गया कि जो उगाही लोवर कोर्ट में होती है वह हाई कोर्ट v सुप्रीम कोर्ट में भी होती हैं।
सरकारें जनता से चुन कर आती हैं , उनकी जवाबदेही जनता के प्रति होती है यदि वह जन विरोधी कार्य करेंगे तो जनता स्वयं इतनी समर्थ है कि वह स्वयं 5 साल बाद अपना निर्णय दे देगी।
इसलिए सर्वोच्च न्यायालय को सरकारों को खुलकर काम करने देना चाहिए।
और यह तो परम सत्य है कि जब सारे निर्णय, नियम कानूनों को स्वीकार करने की शक्ति न्यायपालिका में है तो संसद की गरिमा क्या, संसद का औचित्य ही समाप्त हो जाएगा।
इसलिए मां0
#supremeCourtOfIndia
आम नागरिक को सस्ता, सरल,शीघ्र, पारदर्शी न्याय मिले इस पर अपनी शक्ति लगाइए, चिंतन करिए। न्यायिक प्रणाली की गरिमा आपके हाथ में है, बचा सकते हैं तो बचा लीजिए।
जनता मुकदमों की मार से कराह रही है और आप जनहित याचिकाओं में अपना सारा समय वरवाद करने में लगे हो,
संसद, विधान सभाओं को अपना काम करने दीजिए, कोई सरकार जन आकांक्षाओं पर खरी नहीं उतरेगी तो जनता जनार्दन उनसे हिसाब कर लेगी। जनता के पास अपरिमित ताकत है।