" अब कोई मोहन यादव लौटकर भैंस नहीं चरायेगा "
साहब, जमाना बदल गया है, लेकिन कुछ लोगों के दिमाग का 'सॉफ्टवेयर' अभी भी आठवीं सदी में अटका हुआ है।
उन्हें लगता है कि इस देश का ढांचा उनके बनाए हुए पुराने नियमों से चलेगा।
तो कान खोलकर सुन लीजिए... अब इतिहास दोहराया नहीं जाएगा, बल्कि इतिहास बदला जाएगा।
मोहन यादव अब सिर्फ भैंस नहीं चराएगा!
वो दौर बीत गया जब किसी खास जाति में जन्म लेने का मतलब सिर्फ एक तयशुदा काम करना होता था।
अगर किसी को लगता है कि मोहन यादव लौटकर फिर से सिर्फ भैंस चराएगा, कोई लोहार सिर्फ लोहा पीटेगा, या कोई कुम्हार सिर्फ चाक पर मिट्टी ही गूंथेगा... तो आप बहुत बड़े भ्रम में जी रहे हैं।
ये हाथ अब सिर्फ मिट्टी और औजारों से नहीं खेलेंगे, ये हाथ अब देश की सत्ता के स्टेयरिंग को संभालेंगे।
अब तेली सिर्फ तेल नहीं बेचेगा, वह देश की आर्थिक नीतियों में अपनी बराबर की हिस्सेदारी मांगेगा।
अब बढ़ई सिर्फ लकड़ी नहीं काटेगा, वह सिस्टम की उन जड़ों को काटेगा जिन्होंने सदियों से उसे पीछे धकेला है।
कुछ 'ज्ञानी' लोग, जो शायद खुद स्कूल की दहलीज पार नहीं कर पाए, आज भी इस जातीय पागलपन में जी रहे हैं कि फलां आदमी को तो यही काम करना चाहिए।
उनके लिए संविधान महज एक किताब होगी, लेकिन हमारे लिए वह जीने का अधिकार है।
"यह देश बाबा साहेब के संविधान से चलेगा, किसी आठवीं फेल बेहुदे के जातीय अहंकार से नहीं। जो लोग सत्ता और संसाधनों को अपनी बपौती समझते हैं, उन्हें अब अपनी कुर्सी की चिंता करनी चाहिए।"
अक्सर ये लोग 'मेरिट' का रोना रोते हैं। ठीक है, अब मेरिट पर ही बात होगी!
अब काम जाति तय नहीं करेगी, बल्कि काबिलियत तय करेगी।
गंदगी साफ करने का ठेका सिर्फ किसी जाति का क्यों होगा ?
अगर काम की गरिमा बराबर है, तो अब तुम्हारे बच्चे भी नाले में उतरेंगे।
अब हम सिर्फ तालियां बजाने के लिए नहीं, बल्कि मंच पर बैठकर फैसले लेने के लिए पैदा हुए हैं।
ब्यूरोक्रेसी से लेकर न्यायपालिका तक, हर जगह हमारी मौजूदगी अब खैरात नहीं, हमारा हक है।
जो आज भी इस मुगालते में हैं कि वे श्रेष्ठ हैं और बाकी सब उनके सेवादार-वे सुन लें संविधान ने सबको एक कतार में खड़ा कर दिया है।
अब कोई ऊँचा नहीं, कोई नीचा नहीं।
जो इस बराबरी को स्वीकार नहीं कर पा रहा, उसे अपनी मानसिक चिकित्सा करवानी चाहिए।
हमारे बच्चे अब सिर्फ पसीना नहीं बहाएंगे, वे इस देश का भविष्य लिखेंगे।
हम संसद भी जाएंगे, हम सिस्टम का हिस्सा भी बनेंगे और हम नीति निर्माता भी बनेंगे।
वक्त बदल चुका है... अब हम लौटकर पीछे नहीं जाएंगे, अब हम आगे बढ़ेंगे और सबको साथ लेकर (या फिर सबको हटाकर) अपना हक लेंगे!
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